संत के सत्संग से हृदय परिवर्तन

शिवकुमार गोयल Updated Tue, 18 Dec 2012 01:14 AM IST
heart change from satsang
हमारे नीतिग्रंथों में कई ऐसी घटनाओं का विवरण है, जिसमें बताया गया है कि किस तरह संत के सत्संग से मानव जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है। इसी से जुड़ा एक प्रसंग है। महान संत उड़िया बाबा कानपुर के पास गंगा तट पर ठहरे हुए थे। अचानक एक खूंखार शक्ल का व्यक्ति उनके पास पहुंचा।

अपनी बंदूक पेड़ के सहारे रखी और बाबा को प्रणाम कर बैठ गया। बाबा ने पूछा, क्या काम करते हो बेटा? उस व्यक्ति ने कहा कि वह डाका डालता है। यह सुनकर उड़िया बाबा ने फिर पूछा, एक बात मानेगा? उसने कहा, बाबा, आप जो कहेंगे, मानूंगा। बाबा बोले, एक तो महिला का अपमान न करना। दूसरे, आज रात को यह सोचना कि क्या किसी की संपत्ति लूटना ठीक है।

डाकू उनके चरण स्पर्श कर लौट गया। उस रात उसकी नींद काफूर हो गई। एक रात पहले ही उसने डाका डालते समय एक महिला के कानों से आभूषण जबर्दस्ती छीने थे, तो उसके कानों से खून बह निकला था। वह दृश्य याद करके वह कांप उठा। वह सोचने लगा, वास्तव में वह दूसरों के खून-पसीने की कमाई लूट कर घोर पाप कर्म ही कर रहा है।

अगले दिन डाकू फिर से बाबा के पास पहुंचा। लूटे गए जेवरों से भरा थैला तथा बंदूक उसने बाबा के सामने गंगा में फेंक दी और अपना तमाम जीवन भगवान के भजन में लगाने का संकल्प ले लिया।

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