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स्वास्थ्य: ताकि हर शिशु की किलकारी गूंजे, एकीकृत रणनीति की दरकार

Mon, 29 Sep 2025 07:18 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Mon, 29 Sep 2025 07:18 AM IST
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सार
भू-राजनीतिक उथल-पुथल व अमेरिकी टैरिफ से जुड़ी खबरों के बीच शिशु मृत्यु दर से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि इस दिशा में बहुत सुधार की जरूरत है।
 
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Health: An integrated strategy is needed to ensure every baby's laughter resonates
शिशु(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इस महीने जारी नवीनतम शिशु मृत्यु दर के आंकड़ों ने भारत के राज्यों के बीच एक अलग ही स्थिति को उजागर किया है। केरल में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) प्रति 1,000 जीवित जन्म पर पांच है। यह राष्ट्रीय औसत 25 से पांच गुना कम है, और पिछले साल के अमेरिकी आंकड़े 5.6 से भी आगे निकल गई है। भू-राजनीतिक उथल-पुथल, अमेरिकी टैरिफ, व्यापार और भारत व भारतीयों पर पड़ने वाले प्रभावों से जुड़ी खबरों के बीच देश की शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) के बारे में ताजा जानकारी कोई मामूली बात नहीं है।



शिशु मृत्यु दर या प्रति 1,000 जीवित जन्म पर शिशु मृत्यु की संख्या किसी भी आबादी के समग्र स्वास्थ्य और कल्याण का एक स्पष्ट संकेतक है। दवाओं, कुशल स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं, स्वच्छ जल और पौष्टिक भोजन तक असमान पहुंच सभी के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, लेकिन ये सभी मिलकर शिशु मृत्यु दर को नाटकीय ढंग से प्रभावित कर सकते हैं। केरल में शिशु मृत्यु दर पांच तक पहुंच गई है, तो कई राज्यों में यह दर 35 से ऊपर बनी हुई है, जो बताती है कि भारत को अभी इस दिशा में बहुत सुधार करने की जरूरत है। कई राज्यों में, सार्वजनिक सुविधाओं के लिए धन और कर्मचारियों की कमी है, जबकि शहरी केंद्रों में निजी अस्पतालों का दबदबा है, लेकिन वे गरीबों की पहुंच से बाहर हैं। यही वजह है कि ग्रामीण और हाशिये के समुदायों में टाली जा सकने वाली मृत्यु को भी नहीं रोका जा पा रहा है।  केरल में शिशु मृत्यु दर अचानक कम नहीं हुई है, बल्कि यह दशकों की नीतिगत निरंतरता का परिणाम है। 1990 और 2000 के दशक में भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में आए निजीकरण की लहर का एक के बाद एक सरकारों ने विरोध किया है। जहां अन्य राज्यों ने स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने की अपनी जिम्मेदारी से हाथ खींच लिए, वहीं केरल ने अपने प्रयासों को और तेज कर दिया। केरल की शिशु मृत्यु दर में आई कमी इस बात की पुष्टि करती है कि स्वास्थ्य में सार्वजनिक निवेश परोपकार नहीं, बल्कि कर्तव्य है। केरल में लंबे समय तक शिशु मृत्यु दर 12 के आसपास रही। शुरुआती 28 दिनों में होने वाली मौतों पर ज्यादा ध्यान देने से यह बदलाव आया, क्योंकि इन दिनों में ही शिशु मृत्यु सबसे ज्यादा होती है।


केरल में मूल कारणों और कमियों का पता लगाने के लिए प्रशासन ने शिशु मृत्यु की ऑडिट शुरू की। नवजात शिशुओं के लिए आईसीयू बनाए गए, विशेषज्ञ नर्सों की भर्ती की गई और प्रसूति विशेषज्ञों को गहन प्रशिक्षण दिया गया। सिर्फ शहरी केंद्रों में ही नहीं, बल्कि राज्य भर में प्रसव सुविधाओं में वृद्धि की गई। इन कदमों से जच्चा और बच्चा, दोनों के अनुकूल अस्पतालों का जन्म हुआ, जिन्हें उन महत्वपूर्ण शुरुआती दिनों में खतरों को कम करने के लिए सुविधाओं और कर्मियों से लैस किया गया है। इसका जबर्दस्त असर हुआ-2018 तक शिशु मृत्यु दर घटकर 7, 2019 में 6 और 2023 में 5 हो गई। इसके अलावा, केरल ने दूरदर्शी योजनाएं शुरू की हैं, जिन्हें दूसरी जगहों पर भी अपनाया जा सकता है। 2017 की हृदयम परियोजना को ही लीजिए, जो नवजात शिशुओं में जन्मजात हृदय संबंधी समस्याओं की जांच करती है। शीघ्र पहचान और हस्तक्षेप के जरिये इन बीमारियों से होने वाली मौतों में दो साल के भीतर 41 प्रतिशत की कमी आई। ऐसी पहल के लिए ठोस क्रियान्वयन क्षमता की और ऐसे लोकाचार की आवश्यकता होती है, जो हर बच्चे के जीवन को अमूल्य माने, चाहे उसकी कीमत कुछ भी हो।

केरल में प्रति 10,000 निवासियों पर 114 स्वास्थ्य कर्मी हैं, जो देश में सर्वोच्च है। ये लोग केवल चिकित्सकीय केंद्रों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा), नर्सों और दाइयों के माध्यम से प्रसवपूर्व जांच, नवजात शिशु की देखभाल और माताओं को मार्गदर्शन देने का काम करते हैं। हालांकि, उत्तरी राज्य कुशल कर्मचारियों की लगातार कमी से जूझ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर 40 प्रतिशत से ज्यादा पद खाली रहते हैं। भारत के कई हिस्सों में एकीकृत रणनीति का घोर अभाव है, जहां अपर्याप्त शिक्षा, लैंगिक असमानताएं और कुपोषण, कमजोर स्वास्थ्य ढांचों को और बदतर बना रहे हैं। निष्कर्ष यह है कि स्वास्थ्य संबंधी प्रगति सामाजिक प्रगति से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है।

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