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उतना ही वह गाफिल है
प्रकाश पुरोहित
Updated Thu, 21 Feb 2013 10:51 PM IST
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लोग-बाग भी आश्चर्य करने को उधार ही बैठे रहते हैं। कई तो मुंह में उंगली इसी उम्मीद में डाले रहते हैं कि न जाने कब दांतों तले दबानी पड़ जाए। ऐसे लोगों का कुछ नहीं किया जा सकता, जो आश्चर्य करने के लिए हर वक्त उपलब्ध ही नहीं, तैयार भी रहते हैं।
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कई बार लगता है कि जैसे सिवाय आश्चर्य करने के उनके पास कोई काम नहीं। उन्हें जानने वाला उनकी आश्चर्य करने वाली मारक क्षमता से इतना भयभीत रहता है कि हर वह बात खा जाता है, जिससे इन्हें आश्चर्य करने लायक प्लेटफॉर्म मिले। ये फिराक में हैं कि अब मौका धरा और वे इस कोशिश में कि हाथ तो धरने नहीं दूंगा। अंत में जीत उसी चेहरे की होती है, जो आश्चर्य का जीता-जागता सुबूत है।
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आज ठंड ज्यादा है? आश्चर्य के लिए लालायित चेहरा सामने वाले पर दाना डालता है।
हां, है तो। फुलटॉस को वह धीरे से पुश कर देता है।
रात को भी अच्छी ठंड थी? वह हिम्मत नहीं हारता।
हां, थी तो। इसकी हिम्मत भी जीत रही है।
कर्फ्यू हट गया? ज्वलंत मुद्दे की राख हटाता है वह।
हां, हट तो गया है। वह राख पर राख डाल देता है।
और क्या हालचाल हैं? व्यक्तिगत नब्ज पर दबाव बढ़ाता है।
ठीक है। वह अनजाने में बोल जाता है।
अरे ठीक? क्यों भई? ठीक कैसे? अच्छे क्यों नहीं? आश्चर्य है, ठंड भी है, कर्फ्यू भी हट गया है और तुम ठीक ही हो। अच्छा होना चाहिए इस वक्त तो। वह आश्चर्य की एक किस्त हासिल कर लेता है और वह डिफेंसिव बल्लेबाज रन आउट हो जाता है।
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ऐसे लोगों से यदि यह कहा जाए कि सूरज पूरब में निकला, तो अरे, कमाल है...ऐसा कब हो गया, पता ही नहीं चला, कहने से बाज न आएं। कई बार तो समझ में नहीं आता कि इनका मकसद अपनी अज्ञानता का नमूना पेश करना होता है या मन से वे आश्चर्य ही प्रकट कर रहे हैं।
मुझे तो कई बार यह आश्चर्य होने लगता है कि बंदे को जरा-जरा सी बात पर आखिर आश्चर्य हो कैसे जाता है, मगर जब एक घनघोर आश्चर्य ‘जनक’ से मैं अनजाने में कह बैठा कि शहर में दंगा हो गया, तो वह आश्चर्यरहित चेहरे से बोल पड़ा-पता था, यह तो होना ही था। और यकीन मानिए, मेरा मुंह खुला का खुला रह गया। तो ऐसे होते हैं ये आश्चर्यातुर! दूसरों को भी छूत की बीमारी लगा देते हैं।