इस कट्टरपंथ को रोकना होगा
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जेहादी हिंसा के इस दौर में याद करना मुश्किल है कि कभी इस देश के शायरों ने खुलकर अपने मजहब की पाबंदियों पर सवाल उठाए थे। गालिब के शब्द थे, खुदा के वास्ते पर्दा न काबे से उठा जालिम, कहीं ऐसा न हो यहां भी वही काफिर सनम निकले। मीर तकी मीर ने अपने साथियों से कहा था, उनके मजहब के बारे में पूछना बंद कर दे, क्योंकि कब से इस्लाम को त्यागकर माथे पे टीका लगाए वो मंदिर में बैठ चुके हैं।
आज अगर देश का कोई शायर इस तरह के शेर लिखने की हिम्मत भी करेगा, तो उसे गोली मारने पहुंच जाएंगे जेहादी। बिल्कुल वैसे, जैसे पिछले सप्ताह पेरिस में शार्ली एबदो के दफ्तर पहुंच कर उस पत्रिका के संपादक और पत्रकारों को मार डाला गया। उन पत्रकारों को यह सजा इसलिए दी गई, क्योंकि मजहब को लेकर व्यंग्य करने की उनकी आदत थी। फ्रांस जैसे स्वतंत्र विचारों वाले देश में उन्होंने सोचा ही न होगा कि इस व्यंग्य की यह सजा होगी। कट्टरपंथी इस्लाम की वैसे भी आज कोई सीमाएं नहीं रही हैं। सीरिया के रेगिस्तान में पत्रकार, फोटोग्राफर और समाज सेवक के गले काटे गए हैं। उनका गुनाह यह था कि वे सीरिया गए थे वहां के लोगों का दर्द दुनिया के सामने रखने।
इस आधुनिक जेहाद का असर अपने देश में भी दिखने लग गया है। हमें मानना पड़ेगा कि हर जेहादी घटना में पाकिस्तानी आतंकियों का हाथ नहीं है। इन घटनाओं में हमारे जेहादी भी शामिल हैं। हम यह कहना पसंद नहीं करते, क्योंकि एक अजीब किस्म की 'सेक्यूलर' विचारधारा के शिकार हो गए हैं हम। हम स्वीकार नहीं कर सकते हैं कि भारतीय इस्लाम की विरासत में जेहादी जहर फैलने लग गया है। राजस्थान में मैंने खुद कुछ ऐसे गांव देखे हैं, जहां पहुंच कर लगता है कि हम गलती से किसी कट्टरपंथी इस्लामी मुल्क में पहुंच गए हैं। वहां हर महिला हिजाब में होती है, हर बच्चा मदरसे में पढ़ता है और हर मर्द का भेष इस्लामी होता है।
खुलकर हम ये बातें कहने से डरते हैं 'सेक्यूलरिज्म' के नाम पर। इस सेक्यूलरिज्म को जिंदा रखते हैं वामपंथी राजनीतिक दल, जिनका नेतृत्व करती आई है दशकों से कांग्रेस। पिछले दशक में इस किस्म की सेक्यूलरिज्म का हाल यह था कि 26/11 वाले हमले के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सरेआम कहा कि इस घटना के पीछे पाकिस्तानी जेहादी नहीं, कट्टरपंथी हिंदू संस्थाएं थीं। इसका कितना लाभ पाकिस्तान ने उठाया, मुझे अंदाजा हुआ जब मैं पिछले वर्ष पाकिस्तान गई थी। वहां मुझे कई पाकिस्तानी मिले, जिन्होंने कहा कि 26/11 के पीछे रॉ का हाथ था। सुबूत के तौर पर वे दोहराते थे भारतीय राजनेताओं और पत्रकारों के बयान।
मेरी समझ में यह कभी नहीं आया कि हमारे सेक्यूलर राजनीतिज्ञ क्यों नहीं कभी गालिब और मीर जैसे शायरों का जिक्र करते हैं? क्यों नहीं याद दिलाते हैं भारतीय इस्लाम की महान विरासत का? क्यों हमेशा अहमियत देते हैं मौलवियों को? शायरों को क्यों नहीं? क्या उनका असली मकसद है, मुसलमानों को अलग रखकर झूठे सेक्यूलरिज्म के नाम पर नुकसान पहुंचाना?
भारत में मुसलमान अपनी सभ्यता को सदियों से सुरक्षित रख सके हैं बिना किसी दखल के। अब अगर यह विरासत खतरे में है, तो सिर्फ इसलिए कि कहीं बाहर से एक गर्म हवा आ गई है, इस देश में पिछले कुछ वर्षों से, जिसमें कट्टपंथी इस्लाम की बदबू है। इसको रोकना मुश्किल होगा, लेकिन रोकना पड़ेगा।