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शेयर बाजार में खुशहाली के दिन

Mon, 13 Feb 2017 08:46 PM IST
मधुरेंद्र सिन्हा, वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार
मधुरेंद्र सिन्हा, वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार Updated Mon, 13 Feb 2017 08:46 PM IST
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happy days of share market
मधुरेंद्र सिन्हा - फोटो : AU
शेयर बाजारों में  इस समय खुशहाली के दिन हैं और सूचकांक लगातार ऊपर की ओर जा रहा है। ऐसी धारणा बन रही है कि यह फिर 30,000 के जादुई आंकड़े को छू लेगा। निवेशकों के लिए यह अनुमान खुश करने वाला है और वे अच्छे रिटर्न की उम्मीद लगाए बैठे हैं। सच तो यह है कि शेयर बाजार के निवेशक 2014 से ही जबर्दस्त तेजी की उम्मीद लगाए बैठे थे और ऐसा नरेंद्र मोदी के धुआंधार प्रचार और आशान्वित करने वाले वायदों से हो रहा था। निवेशकों को लग रहा था कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बन जाते हैं, तो एक कारोबारी माहौल तैयार होगा, जिसमें आर्थिक तेजी आएगी। जनवरी, 2014 के शुरुआती दिनों में तो मुंबई शेयर बाजार का सूचकांक गिरकर 21,000 पर जा पहुंचा था। ऐसे में निवेशक हताश थे और सत्ता परिवर्तन की बात कर रहे थे। बाजार में कारोबार का अभाव था और निवेश करने वालों की भारी कमी थी। लेकिन जैसे-जैसे नरेंद्र मोदी के प्रचार में तेजी आई, बाजार ऊपर जाने लगा।
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केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के कुछ ही दिनों बाद सूचकांक ने 30,000 का ऐतिहासिक आंकड़ा छू लिया। लेकिन यह इस स्तर पर ज्यादा दिनों तक नहीं रहा। इसमें गिरावट आई, बेशक इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय कारण रहे, लेकिन निवेशकों को झटका लगा। 30,000 एक बार फिर सपना हो गया। लेकिन, वर्ष 2017 की शुरुआत से ही शेयर बाजार में तेजी आई और बजट के दिन तो यह 485.68 अंक बढ़कर 28,141.64 पर जा पहुंचा। निफ्टी फिफ्टी भी 155.10 अंक बढ़ गया और 8,716.40 पर जा पहुंचा। कहा जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अभी मजबूत है और सरकार के कदम सही दिशा में हैं। कंपनियों के लाभ में भी कोई कमी नहीं आई है और बंपर फसल की भी संभावना है। ये सब शेयर बाजार के हित में है। दरअसल शेयर बाजारों की एक खासियत है कि वे यथार्थ से ज्यादा सेंटीमेंट पर चलते हैं और इस समय यह प्रचुर मात्रा में है।  लेकिन लाख टके का सवाल है कि निवेशकों का तो इससे भला होगा ही, आम आदमी को क्या मिलेगा। नब्बे के दशक में भारत में जब शेयर कल्चर आया, तो उसका श्रेय धीरूभाई अंबानी को मिला, जिन्होंने लोगों को यह दिखाया कि शेयर बाजार निवेश का अच्छा जरिया है और यहां से भी पैसे कमाए जा सकते हैं। इस कारण बड़ी तादाद में लोग तेजी से शेयर बाजार से जुड़ने लगे। हालत यह थी कि जयपुर स्टॉक एक्सचेंज मुंबई को भी टक्कर देने लगा। छोटे-छोटे शहरों में भी शेयरों की खरीद-बिक्री होने लगी। आम आदमी का इससे जुड़ाव होने लगा। लेकिन हर्षद मेहता कांड के बाद शेयर बाजार में गिरावट आई, तो फिर हालात बदलने लगे।
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बाजार नियामक सेबी ने शेयर बाजारों में सुधार लाने के लिए कड़े नियम बनाए और डीमैट अनिवार्य कर दिया। इससे बाजार को बहुत धक्का लगा और आम आदमी बाजार से दूर चला गया। जितनी बड़ी तादाद में लोग उस समय शेयर बाजार से जुड़े थे, उतने तो आज भी नहीं हैं। सेबी की सख्ती और धोखेबाज कंपनियों की हेराफेरी, दोनों ने बाजार को गिरा दिया और आम निवेशक उससे दूर चला गया। इस तरह निवेश के एक बड़े जरिये से लोग दूर हो गए। शेयर बाजार जो निवेश का एक अच्छा जरिया बनता, नहीं बन सका और लोग पहले की तरह सोना और संपत्ति में निवेश करने लगे।
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शेयर बाजार ने समझदार निवेशकों को हमेशा रिटर्न दिया है, बावजूद इसके कि इसमें उठापटक होती रहती है। बाजार की यह फितरत है कि यह चढ़ता है और फिर गिरता है। इसमें कुछ अस्वाभाविक नहीं है। जरूरत है कि आम आदमी इसे समझे, क्योंकि यह भी निवेश और अंततः लाभ कमाने का अच्छा साधन है। निवेश के दूसरे माध्यमों से इसमें फर्क यह है कि इसमें निवेशक अपनी दूरदर्शिता, समझ और धैर्य से धन कमा सकता है। उन्हें यह समझना जरूरी है कि शेयर बाजार कोई जुआ-घर नहीं है और यहां से झटपट पैसे कमाने की मंशा नहीं रखनी चाहिए। यह लंबी रेस का घोड़ा है, जहां निवेशकों ने काफी कुछ कमाया है। अमेरिकी अरबपति वारेन बफेट हों या भारतीय निवेशक राकेश झुनझनवाला, सभी ने यहां से अकूत दौलत कमाई है, क्योंकि उन्होंने इस बाजार को पूरी गंभीरता से लिया। उन्होंने चुनकर शेयरों में पैसा लगाया और धैर्यपूर्वक अपने रिटर्न का इंतजार किया। यह भी एक कला है और इसमें पूरी समझदारी की जरूरत है। यहां यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि शेयर बाजार ही एकमात्र जगह है, जहां से निवेशकों ने कई गुना पैसे कमाए हैं। लेकिन यहां ज्यादा कमाने की चाहत रखना जोखिम भरा भी हो सकता है।

शेयर बाजारों में निवेश के कई तरीके हो सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ा फॉर्मूला है कि उन्हीं कंपनियों में पैसे लगाएं, जो रोजमर्रा के कारोबार में हों या जिनकी चर्चा होती हो। सिर्फ किसी कंपनी के नाम पर न जाएं। उसकी बैलेंस शीट भी देखें कि उसे कितना लाभ होता रहा है और वह कैसा काम कर रही है। ऐसी कंपनियों में पैसे लगाने से तो बचना ही चाहिए, जिनके बारे में पता न हो कि वे करती क्या हैं। सबसे आसान तरीका है कि उनमें ही पैसे लगाए जाएं, जो निवेशकों को अपने लाभ में हिस्सा यानी डिविडेंड देती रही हों। इससे कंपनी की मंशा का पता चलता है। लेकिन ध्यान यह रखना पड़ता है कि उन कंपनियों के शेयरों के दाम उनकी संभावित वास्तविक कीमत से ज्यादा तो नहीं हैं। अगर ऐसा है, तो उनसे दूर ही रहें। एक और बात है कि हर किसी के कहने पर शेयर बाजार में पैसे लगाना घाटे का सौदा साबित हो सकता है।

शेयर बाजार देश की अर्थव्यवस्था का आईना माना जाता है और जब इसमें तेजी आती है, तो यह बाजार भी स्वाभाविक रूप से ऊपर जाता है। अब चूंकि दुनिया एक छोटे से गांव में तब्दील हो गई है, तो दूसरी जगहों पर आए उतार-चढ़ाव का इस पर भी असर पड़ना लाजिमी है। फिर भी समझदारी से उठाया गया कदम लंबी अवधि में लाभ देगा ही। सोने की कीमतें काफी ऊंचाई पर हैं और संपत्ति में मंदी है, तो ऐसे में निवेशकों के सामने यह भी एक अच्छा विकल्प है।
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