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किसानों की बढ़ती नाउम्मीदी

Fri, 09 Jan 2015 07:29 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Fri, 09 Jan 2015 07:29 PM IST
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growing helplessness in farmers

श के किसान समुदाय के लिए नए वर्ष की सुबह एक दुःस्वप्न की तरह आई। दिसंबर, 2014 के आखिरी हफ्ते में महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के एक दर्जन किसानों ने फसल बर्बाद होने के कारण आत्महत्या कर ली। इतने ज्यादा किसानों की हत्या ने भाजपा के एक हताश लोकसभा सांसद को यह कहने के लिए उकसाया कि 'किसानों को मरने दो। यदि वे खेती से अपना गुजारा नहीं कर सकते, तो उन्हें मरने दो।' भाजपा सांसद संजय धोत्रे की यह असंवेदनशील टिप्पणी कई राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर बार-बार दिखाई गई। बाद में धोत्रे ने कहा कि उन्होंने केवल अपनी लाचारी की भावना को अभिव्यक्त किया था।

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खैर, कृषक समुदायों के बीच लाचारी की यह मनोदशा और भी गहराने की आशंका है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों में वैश्विक कृषि उत्पादों की कीमत में 30 फीसदी तक की गिरावट आई है और स्थानीय किसानों को घरेलू स्तर पर उपज की ऊंची कीमत मिलने की संभावना नहीं है। मोदी सरकार ने किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में जो बढ़ोतरी की है, वह पिछले कुछ वर्षों की तुलना में काफी कम है। यह तब है, जब मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान किसानों से स्पष्ट वायदा किया था कि उन्हें कृषि लागत के ऊपर 50 फीसदी का मुनाफा दिया जाएगा। यह वायदा अब तक पूरा नहीं हुआ है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब वैश्विक कृषि उत्पादों की कीमत में गिरावट के कारण कृषक समुदायों का संकट बढ़ रहा है।
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दिसंबर में जारी एनएसएसओ के सर्वे में खुलासा हुआ है कि देश के नौ करोड़ कृषक परिवारों में से करीब 50 फीसदी या तो बैंक से या साहूकारों से कर्ज लेते हैं। सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश के 69 लाख किसान परिवार कर्जग्रस्त हैं, जबकि आंध्र प्रदेश दूसरे नंबर है, जहां 49 लाख किसान परिवार कर्जग्रस्त हैं और महाराष्ट्र में 36 लाख किसान परिवारों ने खेती के लिए कर्ज लिया है। पचास फीसदी से अधिक ऋण खेती के लिए पूंजी व अन्य खर्चों के लिए लिया गया।
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राजग सरकार के पहले पू्र्ण बजट में इस बात पर गंभीरता से ध्यान देना होगा कि देश के कृषि क्षेत्र में क्या हो रहा है। आम तौर पर बजट में औद्योगिक क्षेत्र की चिंताओं का प्रभुत्व रहता है, जिसे हाई प्रोफाइल उद्योग संघों के माध्यम से सरकार से जरूरत से ज्यादा तवज्जो मिलती है। अगर कोई सरकार की बजट संबंधी सार्वजनिक बातचीत पर ध्यान दे, तो उसे पता चल जाएगा कि उद्योग एवं बड़े व्यवसाय बजट पर हावी रहते हैं। बेशक बजट में थोड़ी चर्चा कृषि की भी होती है, लेकिन यह रूटीन की तरह ही होता है। मगर इस बार कृषि क्षेत्र को गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि यह वस्तुओं एवं सेवाओं की ग्रामीण मांग को गति दे सकता है। हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली को पूरी अर्थव्यवस्था की मुश्किलों को देखना होगा, जो कम गंभीर नहीं है।

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद भावना और भरोसे में जो उछाल देखा गया था, वह घटता हुआ प्रतीत होता है, क्योंकि कुछ आर्थिक संकेत अर्थव्यवस्था की त्वरित बहाली को स्पष्ट तौर पर चुनौती दे रहे हैं। एक सवाल पूछा जा रहा है कि जब वैश्विक निवेशकों का भरोसा भारत में पहले से कहीं सबसे ज्यादा है, तो रुपया अचानक क्यों कमजोर हो रहा है। विनिमय दर 64 रुपये प्रति डॉलर के आसपास है। सबसे चिंताजनक तो यह है कि अक्तूबर में औद्योगिक उत्पादन में 4.2 फीसदी की नकारात्मक वृद्धि दिखाई गई है। इससे पता चलता है कि कुल 6.3 लाख करोड़ रुपये की मौजूदा निवेश परियोजनाएं विभिन्न कारणों से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं।

 जहां तक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की बात है, खासकर सड़क क्षेत्र, तो उसमें खास प्रगति नहीं है, क्योंकि उनके निर्माण में लगी निजी कंपनियां या तो नकदी की कमी से जूझ रही हैं या वे सरकार के साथ निष्पादन से संबंधित विवादों में उलझी हैं। बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में पिछले छह महीनों से हाई-वे प्रोजेक्ट में कोई प्रगति नहीं हुई है, जबकि उसे वर्ष 2013 में शुरू किया गया था।

प्रमुख आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने बताया कि बुनियादी ढांचों के निर्माण में लगी निजी कंपनियां भी भारी कर्ज से जूझ रही हैं। बैंक उन्हें परियोजनाएं पूरा करने के लिए और रकम नहीं दे रहे। नतीजतन भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने फैसला किया है कि अगले दो वर्षों में सरकार सभी नई राजमार्ग परियोजनाओं को 70 फीसदी धन देगी। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि हाल के हफ्तों में उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी सड़क परियोजनाओं के वित्त पोषण के उद्देश्य से की गई है।

इस तरह बुनियादी ढांचा क्षेत्र में हम समस्याओं का सामना इसलिए कर रहे हैं कि वहां मांग आपूर्ति से अधिक है, लेकिन निजी क्षेत्र के पास पैसा नहीं है, जबकि गैर बुनियादी क्षेत्र में हम इसलिए समस्याओं से जूझ रहे हैं, क्योंकि हमारे पास काफी क्षमता है, लेकिन मांग घटती जा रही है। आने वाले वर्षों में स्थिति और बुरी हो सकती है, क्योंकि ग्रामीण मांग, जो महत्वपूर्ण है, आगे और भी घट सकती है, क्योंकि वैश्विक खाद्य कीमतों में 20 से 30 फीसदी की गिरावट आई है। इसलिए वर्ष 2015 में किसानों की आमदनी में वृद्धि धीमी पड़ सकती है। मामूली ग्रामीण मजदूरी वर्ष 2012 के अंत तक 17 से 19 फीसदी की आकर्षक दर से बढ़ी। लेकिन अब मुद्रास्फीति से समायोजित करने के बाद ग्रामीण मजदूरी में वृद्धि नकारात्मक है।


विशेषज्ञ कृषि क्षेत्र में उत्पादन के सुस्त पड़ने का अनुमान भी लगा रहे है, जिसमें हाल के वर्षों में लगातार अच्छी वृद्धि दर्ज की गई है। अगर यही हाल रहा, तो 2015 में कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान मोदी को ही होगा, क्योंकि उन्होंने किसानों से बड़े वायदे किए थे। अब उनके वायदों की कसौटी पर उनकी परीक्षा होगी। संक्षेप में कहें, तो घरेलू स्तर पर नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली के समक्ष कई चुनौतियां हैं।

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