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नेताजी की स्मृति से जुड़ा गोमो
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गोमो जंक्शन
- फोटो : a
वर्ष 2009 में आज ही के दिन झारखंड के धनबाद जिले की तोपचांची तहसील के गोमो स्टेशन को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की स्मृति से जोड़कर नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन किया गया था। पर बोलचाल में आज भी इसे गोमो ही कहते हैं। कई वर्ष पहले मुझे गोमो जंक्शन को देखने का मौका मिला था। उस बार मैं धनबाद जा रहा था, पर उससे पहले मैं उस गोमो रेलवे स्टेशन पर उतरना चाहता था, जहां से देश की आजादी के बड़े अभियान के लिए नेताजी ने छद्म वेश में प्रस्थान किया था। रेलवे के एक कर्मचारी ने बताया था कि अक्सर ट्रेन गोमो में रुक जाती है, इसलिए मैं तैयार रहूं। पर धीमे होने के बाद इंजन ने गति पकड़ ली। तब से बार-बार इस जगह की याद आती रही।
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18 जनवरी, 1941 को कालका मेल से जियाउद्दीन के वेश में पेशावर जाने के लिए नेताजी इसी रेलवे स्टेशन से रवाना हुए थे। नेताजी के साथी क्रांतिकारी भगतराम तलवार उन्हें पेशावर तक छोड़ने गए थे। भगतराम जी से मेरी भेंट 1980 में कोलकाता में शहीद यतींद्रनाथ दास बलिदान अर्धशती के अवसर पर हुई थी, जब वहां अनेक क्रांतिकारियों का जमावड़ा हुआ था।
सरकारी अतिथि गृह में वह मुझसे नीचे की मंजिल में लाहौर षड्यंत्र केस में कालापानी गए क्रांतिकारी पंडित किशोरलाल के साथ ठहरे हुए थे। कई दिनों के उनके संग-साथ में तब उनसे लंबी बातचीत भी मैंने रिकॉर्ड की थी। मैं गोमो में भगतराम जी की भी एक तस्वीर लगवाना चाहता हूं।
पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली से अंग्रेजी में प्रकाशित उनकी पुस्तक द तलवार्स ऑफ पठान लैंड ऐंड सुभाष चंद्राज ग्रेट एस्केप में और खासकर उसके अंतिम पृष्ठों में नेताजी के भतीजे शिशिर कुमार बोस के एक लंबे आलेख में, जो बांग्ला की देश पत्रिका के पूजा अंक (1974) से अनूदित कराकर छापा गया है, नेता जी के कोलकाता से गोमो तक आने की गुप्त योजना का पूरा खुलासा हुआ है।
उस अभियान में शिशिर बोस ने सक्रिय हिस्सेदारी की थी और वही कार चलाकर कोलकाता से गोमो तक नेता जी को ले गए थे। शिशिर बोस की नेताजी पर अलग से पुस्तकें हैं और उनमें नेताजी के इस रोमांचक सफरनामे की गर्व करने लायक दास्तान है। गोमो स्टेशन पर नेताजी के जन्म दिवस यानी 23 जनवरी को उनकी स्मृति में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम में उनके विदेश जाने के इस क्रांतिकारी अभियान का गर्व के साथ स्मरण किया जाता है। रेलवे स्टेशन के बोर्ड पर ‘एनएससी बोस ज. गोमो’ अंग्रेजी में लिखा है, जो देखने-पढ़ने से अधूरा लगता है।
धनबाद शहर से नेताजी का पारिवारिक रिश्ता रहा था। वहां उनके भतीजे शिशिर बोस केमिकल इंजीनियर थे। नेता जी धनबाद आते-जाते थे और देश की पहली रजिस्टर्ड ट्रेड यूनियन की शुरुआत उन्होंने वहीं की थी, जिसके वह अध्यक्ष थे। उन्होंने वहां मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ी। धनबाद और उसके चारों ओर का इलाका नक्सलवाद से प्रभावित रहा है, जिसके संकेत अब भी दिखते हैं।
प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता ए.के. राय का इस इलाके में व्यापक प्रभाव रहा है, जो यहां से विधायक और सांसद भी रहे। करीब 40 हजार की मिली-जुली आबादी वाले गोमो के इर्द-गिर्द कोयला खदानों के होते भी यह इलाका प्रायः धूलमुक्त है। यह ट्रेनों के ठहराव का एक महत्वपूर्ण मुकाम है। आजाद हिंद फौज के गठन के लिए नेताजी के विदेश प्रस्थान का यह छोटा-सा कोना उनकी यादों से अभी तक सुवासित है।