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इज्तिराब

Sat, 10 Jan 2015 10:01 PM IST
दिनेश मिश्र
दिनेश मिश्र Updated Sat, 10 Jan 2015 10:01 PM IST
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gazal book.

जीवन सिर्फ यूं ही जीने का नाम नहीं है। धड़कती हुई जिंदगी का स्पंदन सुनने के लिए इसे न सिर्फ महसूस करना पड़ता है, बल्कि इसमें काफी गहराई तक उतरना पड़ता है। इतना जरूर है कि इसके लिए कभी-कभार हमें किसी माध्यम की जरूरत होती है। कभी गीतों तो कभी कविताओं या फिर कभी गजलों के माध्यम से जिंदगी धड़कती हुई सुनाई देती है। गजलों में तो जिंदगी के प्रति संजीदगी कुछ ज्यादा ही है। यहां जाड़ों की नर्म धूप तो है ही, गर्मियों की चिलचिलाती हुई और बेचैन कर देने वाली सूरज की तपिश भी है। पतझड़ और बसंत इसके दो पहलू हैं। गजलों में जिंदगी हमराज भी है तो हमसाया भी।

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कभी इन गजलों में पगडंडियों पर खड़ी अपने बेटे को ढूंढती मां की दूर तक जाती बेबस निगाहें नजर आती हैं तो शहर के शोर में अक्सर गुम हो जाने वाली अपने प्यार को तलाशती आवाजें भी सुनाई पड़ती हैं। कुछ ऐसी ही गजलों का संकलन किया गया है हाल ही में आई नई किताब ‘इज्तिराब’ में। जिसका संपादन किया है आलोक यादव ने। पेशे से केंद्र सरकार में अधिकारी आलोक के भीतर भी गजलें अंगड़ाई लेती रही हैं। वे खुद भी गजलों से काफी इत्तेफाक रखते हैं। संकलन में उनकी भी रचनाएं हैं। एक बानगी- ‘खनखनाती रहीं कांच की चूड़ियां, गीत गाती रहीं कांच की चूड़ियां। बच्चों की कलाई में जाके बहुत खिलखिलाती रहीं कांच की चूड़ियां।’ खास बात यह है कि संकलन में ऐसे गजलकारों की गजलें हैं, जो पेशे से राज्य या केंद्र सरकार में कर्मचारी हैं, मगर उनके दिल में धड़कनें गजलों के रूप में जिंदा हैं। भागमभाग के दौर में गजलें और नज्में लिखना वाकई में हैरत की बात है, जो बताती है कि आज भी जहां जिंदगी सांस लेती है, उसे सुनने के लिए कुछ लोगों ने अभी भी अपने कान खुले रखे हैं। इनकी गजलों में महज रीतिकालीन सौंदर्य का जिक्र नहीं है, बल्कि इनमें जिंदगी का रोजनामचा भी बयां होता है। इनमें कथ्य और शिल्प बेहतरीन बन पडे़ हैं। संवेदनाएं तो सहज ही दिल को छू लेने वाली हैं।
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उदाहरण के तौर पर सूर्य पाल गंगवार ‘सूरज’ की एक गजल है- ‘ये दुनिया रात को जब-जब भी दीवाली मनाती है। मेरी मां लौ से दीपक की मेरा काजल बनाती है।’ इसी तरह ओम प्रकाश ‘यति’ की गजल अपने आस-पास रोज घट रही जिंदगी पर पैनी नजर रखती है- ‘हंसी खामोश हो जाती, खुशी खतरे में पड़ती है। यहां हर रोज कोई दामिनी खतरे में पड़ती है।’ संग्रह में ऐसी तमाम गजलें है, जिसे पाठक पढ़ते वक्त बेवजह की बोरियत महसूस नहीं करता और न ही इसमें किसी किस्म का बासीपन है। इनमें जिंदगी इंद्रधनुषी है। मंसूर उस्मानी के शब्दों में इस संकलन की गजलें बेचैनी का इकबालिया बयान हैं।
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सबसे बड़ी बात कि हिंदी के प्रख्यात गजलकार दुष्यंत कुमार के बाद गजलों की जो दुनिया चंद प्रमुख गजलकारों में ही सिमट चली थी, ऐसे में चंद्रभाल सुकुमार, सरदार आसिफ, लक्ष्मीशंकर बाजपेयी, सुधाकर अदीब, चरन सिंह बशर, कमलेश भट्ट कमल, बीआर  विप्लवी, मुहम्मद इकबाल अजर, राजन स्वामी, अखिलेश तिवारी, अनुराग मिश्र गैर, अवनीश कुमार यादव, मनीष शुक्ल, हरिओम, पवन कुमार, अजय कुमार पांडेय ‘सहाब’ समेत संकलन के 19 गजलकारों की रचनाओं से यह उम्मीद तो बंधती नजर ही आती है कि हिंदी गजल का भविष्य फिलहाल उज्ज्वल है।

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