विराट राष्ट्रीय मोर्चे के जनक गांधी
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मोहनदास करमचंद गांधी के 150 वें जयंती वर्ष में भारत को एक महान राष्ट्र बनाने की प्रक्रिया में उनके बुनियादी सिद्धांतों के क्रियान्वयन की अनिवार्यता पर विचार करना प्रासंगिक होगा। वर्ष 1915 में दक्षिण अफ्रीका से महात्मा गांधी की वापसी से पहले ही इस देश में आजादी की अलख जग चुकी थी, लेकिन गांधी ने उसे एक सर्वथा नया आयाम दिया। दक्षिण अफ्रीका के उनके अनुभव उपयोगी तो थे, मगर पर्याप्त नहीं थे। व्यापक विविधताओं, कदम-कदम पर मौजूद विरोधाभासों और टकराव की आशंकाओं वाले इस देश में ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता से निर्णायक संघर्ष के लिए पुराने नुस्खों में बदलाव और कुछ नए फार्मूलों की आवश्यकता थी। अखिल भारतीय मोर्चा और अहिंसा की शर्त-यह था गांधी जी का नया आयाम। वर्ष 1857 से गांधी जी के भारत आगमन तक इन दो सिद्धांतों पर एक साथ अमल इससे पहले कभी नहीं हुआ था।
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इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता पामीरो तुगलियाती और बुल्गारिया की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता जार्जी दिमित्रोव ने गांधी जी के ढाई दशक बाद संयुक्त मोर्चे की थीसिस रखी। लगभग उसी दौर में चीन में माओ त्से तुंग ने जापान को शिकस्त देने के लिए अपने कट्टर दुश्मन चियांग काईशेक से हाथ मिलाया। हान बहुल होने के कारण माओ त्से तुंग का रास्ता आसान था। इसके अलावा चीन में सामाजिक विरोधाभास भी सीमित थे।
दूसरी ओर, महात्मा गांधी के सामने उपमहाद्वीपीय चुनौतियां थीं। केरल से लेकर कश्मीर और सरहदी सूबे तक फैले जनगण का मिजाज अलग-अलग था। यहां भूखी-अधमरी जनता थी, सामंतवाद था, नवोदित पूंजीवाद था, समाज में हिंदू-मुस्लिम मतभेद थे और इन सबके ऊपर अंग्रेज का जैकबूट था। अतीत की विफलताएं थीं, 1916 का लखनऊ समझौता था और जरा-जरा-सी बात पर होने वाले सांप्रदायिक दंगे थे। इसके अतिरिक्त खुद हिंदू समाज में भी खौफनाक और विभाजक मतभेद मौजूद थे।
इन परिस्थितियों में महात्मा गांधी ने अपना पहला ऐतिहासिक प्रयोग शुरू किया। पहले विश्वयुद्ध में हार-जीत के बाद सबसे महत्वपूर्ण था तुर्की में खिलाफत का खात्मा, क्योंकि इसके साथ ही इस्लामी इतिहास का एक अध्याय समाप्त हो गया।
भारत में अली बंधुओं-मोहम्मद और शौकत-के नेतृत्व में वर्ष 1920 में खिलाफत कमेटी बनी। इस मुद्दे की निरर्थकता गांधी जी भी भली-भांति समझते थे। लेकिन उनके लिए यह हिंदू-मुस्लिम एकता के एजेंडे को आगे बढ़ाने का एक स्वर्णिम अवसर था। खिलाफत आंदोलन को गांधी जी का साथ मिलने के बाद मौलाना मोहम्मद अली ने यह एलान किया, 'पैगंबर के बाद मैं गांधी जी के आदेश का पालन करना अपना फर्ज मानता हूं।' इसके बाद मौलाना एक-दो बार बहके और भारत की आजादी के लिए अफगान सेना को भारत पर हमले की दावत देने की बात तक कह डाली। लेकिन खुद के भटक जाने के लिए गांधी जी से उन्होंने खेद भी प्रकट किया।
उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा में थाने में बाईस पुलिसकर्मियों को फूंक दिए जाने की प्रतिक्रिया में महात्मा गांधी ने अपना असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। खिलाफत आंदोलन के लिए भी गुंजाइश नहीं बची, तो अली बंधु उनके विरोधी हो गए।
इसी दौरान केरल में मोपला विद्रोह हिंदू-विरोधी हिंसक मुहिम में बदल गया। उस घटना ने पूरे हिंदू समाज को हिला डाला। महात्मा गांधी की हिंदू-मुस्लिम एकता का पहला प्रयोग विफल रहा। लेकिन यह उनकी विफलता नहीं थी। पहली बार हजारों मुसलमान मुंबई की एक मस्जिद में गांधी जी की तकरीर सुनने के लिए आए। पहली बार स्वामी श्रद्धानंद ने दिल्ली की जामा मस्जिद के मंच से मुसलमानों को संबोधित किया। पहली बार एक के बाद एक मौलाना लोग गोहत्या के विरोध में बोलने लगे। मौलाना मोहम्मद अली ने सरेआम यह एलान किया कि कलाम-ए-पाक हिंदू-मुस्लिम इत्तेहाद की इजाजत देता है। मौलाना की मां बी अम्मन ने जलसे में सबके सामने अपना बुर्का उतार कर फेंक दिया। लेकिन उसके बाद यह सब फिर कभी नहीं हो पाया।
महात्मा गांधी के संयुक्त मोर्चे का कमाल यह था कि वह मिल मजदूर और मिल मालिक को एक साथ लेकर चलते थे। इस मर्म को ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के काबिल सिद्धांतकार रजनी पाम दत्त तक नहीं समझ पाए। कई दशकों के बाद दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला ने इस नीति पर अमल किया।
यह विरोधाभासों के प्रबंधन की महात्मा गांधी की क्षमता का चमत्कार ही था कि वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समारोह में शामिल हुए और काशी विद्यापीठ की स्थापना भी करवाई। गांधी जी ने रूढ़िवादी मुसलमानों से दोस्ती रखी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मूल्यों के खिलाफ दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना भी करवा दी। जाहिर है कि हिंसा के निषेध के बिना यह मोर्चा मुमकिन नहीं था। महात्मा गांधी ने स्पष्ट तौर पर लिखा कि अंग्रेजों का श्रेष्ठ सैन्यबल हिंसक आंदोलन को कुचल कर रख देगा।
वह यह स्पष्ट देख रहे थे कि समाज के सैन्यीकरण की परिणति आपसी मारकाट, खासतौर से हिंदू-मुस्लिम दंगों में होगी। यह सब फिर भी हुआ। महात्मा की तिलिस्मी शख्सियत अगर न होती, तो इस देश में न जाने कितने जालियांवाला बाग और कितने नोआखाली होते। समाज के सैन्यीकरण के खतरे तो आज भी बदस्तूर कायम हैं।
महात्मा गांधी की चिर प्रासंगिकता एक ईसाई मिशनरी को दिए गए इस उत्तर में निहित है, 'धर्म से राज्य का कोई सरोकार नहीं। राज्य समाज कल्याण, स्वास्थ्य, संचार, विदेश नीति, करेंसी जैसे विषयों को देखेगा। हमारे और आप के धर्म को नहीं।' प्रखर हिंदू, राम के पुजारी और गाय को पवित्र मानने वाले गांधी जी का यह था आस्थाबिंदु।