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काम का या बस नाम का

Fri, 02 Jan 2015 08:53 PM IST
राजुल अवस्थी
राजुल अवस्थी Updated Fri, 02 Jan 2015 08:53 PM IST
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Game changer or name changer

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बीते 20 दिसंबर को संसद में घोषणा की कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) शीघ्र ही लागू किया जाएगा और इस संबंध में राज्यों की चिंताएं दूर की जाएंगी। इससे संबंधित विधेयक संसद के अगले सत्र में लाया जाएगा। उन्होंने इसे 'स्वतंत्रता के बाद का सबसे बड़ा कर सुधार' बताया। यह वाकई स्वतंत्रता के बाद का सबसे बड़ा कर सुधार हो सकता था, पर इसके प्रस्तावित मौजूदा प्रारूप को देखकर ऐसा नहीं कहा जा सकता। जैसा कि कई आर्थिक विशेषज्ञ बता रहे हैं, कई मायनों में यह कर ढांचे में बड़े बदलाव से ज्यादा नाम बदलने की कवायद ही लगता है। जीएसटी शुरू करने का मुख्य उद्देश्य 'व्यवसाय को सुविधाजनक बनाना' था, पर लगता है कि इसकी जगह 'राजस्व संरक्षण' ने ले ली है।

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जीएसटी की मूल अवधारणा केंद्र एवं राज्यों के अप्रत्यक्ष करों को मिलाकर एक ही कर लागू करना था। प्रस्तावित कर मसौदे में प्रमुख अप्रत्यक्ष करों को शामिल किया गया है, लेकिन राज्य स्तरीय चार प्रमुख करों को इससे अलग रखा गया है- जिसमें पेट्रोलियम उत्पादों पर कर, विद्युत शुल्क, आबकारी शुल्क एवं अचल संपत्ति पर स्टांप शुल्क शामिल है। जहां तक पेट्रोलियम का सवाल है, तो वह राज्यों के राजस्व में पच्चीस से पचास फीसदी तक का योगदान करता है। इसलिए वह एक महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत है। इसी कारण जीएसटी के दायरे से उसे बाहर रखना एक प्रतिगामी कदम है। कई सेवाओं और उद्योगों में उत्पादन की लागत में बड़ी हिस्सेदारी पेट्रोलियम  पदार्थ की होती है।
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इसे अगर जीएसटी में रखा जाएगा, तो उत्पादक इनपुट टैक्स के रूप में पेट्रोलियम पदार्थों पर चुकाए गए कर का दावा करने में सक्षम होंगे और एक सरल कर शृंखला का निर्माण होगा, जो अप्रत्यक्ष कर के कर-पर-कर जैसी बुराई को खत्म करेगा। यह अनावश्यक लागत मुद्रास्फीति को खत्म करेगी। ठीक यही मामला विद्युत शुल्क को लेकर है।
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मसौदे में पेट्रोलियम पदार्थों को भविष्य में शामिल करने का प्रावधान रखा गया है, जो अच्छी बात है, लेकिन जीएसटी की लेवी को लागू करने की तिथि का निर्धारण जीएसटी काउंसिल करेगी, जिसमें दो तिहाई सीटें राज्यों के लिए आरक्षित हैं। यानी काफी कुछ जीएसटी काउंसिल पर निर्भर करता है।

यह समझ से परे है कि शराब को क्यों जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया? शराब को जीएसटी के दायरे में रखने से राज्य के टैक्स अधिकारियों के लिए इसकी व्यवस्था करना और शराब विक्रेताओं से इसका पालन करवाना और भी आसान होगा। यदि कोई राज्य अपना राजस्व बढ़ाने के लिए या इसका उपभोग घटाने के लिए इसे महंगा करना चाहता है, तो जीएसटी के ढांचे में इसे लाकर भी वह ऐसा कर सकता था।
स्टांप ड्यूटी राज्यों के राजस्व का एक अन्य महत्वपूर्ण स्रोत है। उदाहरण के लिए, आर्थिक सर्वे के मुताबिक महाराष्ट्र के अपने राजस्व का 20 फीसदी और बिहार का 12 फीसदी हिस्सा इसी से आता है। पर इसी वजह से अगर इसे जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया, तो अच्छी बात नहीं है। मौजूदा प्रारूप के अनुसार, रियल एस्टेट व्यवसाय के मामले में निर्माण सामग्री की लागत और वास्तुशिल्पी एवं ठेकेदारों द्वारा मुहैया कराई गई सेवाओं पर जीएसटी के तहत टैक्स लगेगा। पर इस व्यवसाय का एक बड़ा घटक जमीन है, जिस पर जीएसटी के तहत टैक्स नहीं लगेगा। यानी स्टांप ड्यूटी के रूप में जमीन पर चुकाए गए कर का समायोजन नहीं होगा और रिसाव जारी रहेगा।

मौजूदा प्रस्ताव में 'अंतरराज्यीय व्यवसाय के संबंध में वस्तुओं की आपूर्ति पर अतिरिक्त कर (एक फीसदी से ज्यादा नहीं)' का प्रावधान किया गया है। इस तरह का कर दो वर्ष की अवधि के लिए केंद्र द्वारा वसूला जाएगा और जिस राज्य से आपूर्ति की गई, उसे सौंपा जाएगा। जीएसटी काउंसिल चाहे, तो दो वर्ष की इस अवधि को बढ़ा भी सकती है। यह और कुछ नहीं, केंद्रीय बिक्री कर का ही दूसरा नाम है! निश्चित रूप से यह अवधारणा जीएसटी को गंतव्य आधारित उपभोग कर बनाने के प्रस्ताव से मेल नहीं खाती है।

जीएसटी के शासकीय ढांचे के लिए जीएसटी काउंसिल बनाने की बात कही गई है, जिसमें केंद्र सरकार की वोट हिस्सेदारी मात्र एक तिहाई होगी, बाकी दो तिहाई हिस्सेदारी राज्यों की होगी। यह काउंसिल तमाम प्रमुख मुद्दों- दर (दर की सीमा भी), छूट, मॉडल जीएसटी कानून, लेवी के सिद्धांत, आईजीएसटी का विभाजन, आपूर्ति की जगह को शासित करने वाले सिद्धांत आदि पर अपने सुझाव देगी। जीएसटी काउंसिल अच्छा विचार है, लेकिन राजस्व को लेकर राज्यों का वर्चस्व अप्रत्यक्ष कर ढांचे में वास्तविक सुधार के लिए बड़ी बाधा साबित हो सकता है। इसके अलावा, इसमें 2011 के संविधान संशोधन विधेयक में परिकल्पित राष्ट्र स्तरीय जीएसटी विवाद निपटान प्राधिकरण से परहेज किया गया है। अगर सभी राज्यों का अपना विवाद निपटान प्राधिकरण होगा, तो जीएसटी को साझा कर बनाने का सपना धरा ही रह जाएगा।


सबसे अहम बात यह है कि जीएसटी की दर क्या होगी, प्रस्ताव में इसका उल्लेख नहीं है। इसका निर्धारण जीएसटी काउंसिल करेगी। राजस्व तटस्थ दर पर बातचीत के दौरान 27 फीसदी से ज्यादा दर रखने पर चर्चा हुई। लेकिन इतनी ऊंची दर को मुद्रास्फीति बढ़ाने वाला न भी कहें, तो यह निवेश और विकास विरोधी होगी। ऊंची दर ज्यादा राजस्व प्राप्ति की गारंटी नहीं है, बल्कि यह कर चोरी को प्रोत्साहित करती है। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ में रोमानिया में वैट दर सबसे ज्यादा 24 फीसदी है, लेकिन इसका अनुपालन नहीं करने की दर भी लगभग 50 फीसदी है। तुलनात्मक रूप से कुछ देशों में कर की दर बेहद कम है-चीन में 17, इंडोनेशिया में 10, ऑस्ट्रेलिया में 10, जर्मनी में 16 फीसदी है। अगर जीएसटी दर 27 फीसदी के आसपास रखी गई, तो यह न केवल आर्थिक गतिविधियों को हतोत्साहित करेगी, बल्कि वस्तु एवं सेवाओं की कीमत और कर चोरी को भी बढ़ाएगी। ऐसे में निश्चित रूप से यह कर ढांचे में बड़े बदलाव के उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाएगी।

-विश्व बैंक से जुड़े वरिष्ठ कर नीति एवं राजस्व प्रशासन विशेषज्ञ

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