महाराष्ट्र की सियासत में किंगमेकर से जमीन पर
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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के करीब एक महीने बाद अचानक कल तड़के देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने जिस तरह क्रमशः मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, वह भारतीय राजनीति के बेहद चौंकाने वाले घटनाक्रमों में से एक है। लेकिन राजनीति में ऐसी घटनाएं अप्रत्याशित नहीं हैं।
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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के करीब एक महीने बाद अचानक कल तड़के देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने जिस तरह क्रमशः मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, वह भारतीय राजनीति के बेहद चौंकाने वाले घटनाक्रमों में से एक है। लेकिन राजनीति में ऐसी घटनाएं अप्रत्याशित नहीं हैं।
महाराष्ट्र का जनादेश निस्संदेह भाजपा और शिवसेना के लिए था। लेकिन उनका चुनाव पूर्व गठबंधन जब सरकार बनाने में कामयाब नहीं हुआ, तब चुनाव बाद गठबंधन बनाकर सरकार बनाने की कोशिशें शुरू हुईं। शिवसेना ने एनसीपी यानी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाने की संभावनाएं तलाशनी शुरू कीं और इसमें कांग्रेस भी शामिल हुई, क्योंकि इसके बगैर सरकार का गठन संभव नहीं था।
हालांकि तब भी ऐसा माना जा रहा था कि देर-सबेर भाजपा-शिवसेना का सरकार बनना तय है। एक तो इसलिए कि दोनों का साथ बेहद पुराना है। और दूसरा यह कि दोनों की वैचारिकता भी समान है। यह ठीक है कि भाजपा के साथ सरकार बनाने के मामले में शिवसेना ने बेहद तीखेपन का परिचय दिया।
इसके बावजूद भाजपा अपने पुराने गठबंधन सहयोगी को मना सकती थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। शायद वह यह मानकर चल रही थी कि शिवसेना उससे रूठकर आखिर जाएगी कहां? यहां तक कि जब शिवसेना और एनसीपी के बीच मुलाकातों का दौर चल रहा था, तब भी भाजपा को लग रहा था कि महाराष्ट्र में उसकी ही सरकार बनेगी।
इस भरोसे की दो वजहें थीं-वह नहीं मान सकती थी शिवसेना उसका साथ छोड़ देगी। और उसका यह भी मानना था कि शिवसेना के साथ कांग्रेस कोई गठबंधन नहीं करेगी। लेकिन धीरे-धीरे ही सही, जब शिवसेना-एनसीपी-गठबंधन की सरकार बनने की संभावना आकार लेने लगी, तब भाजपा को सक्रिय होना पड़ा।
एनसीपी प्रमुख शरद पवार अगर महाराष्ट्र चुनाव के मैन ऑफ द मैच थे, तो बदले हुए घटनाक्रम में सबसे ध्वस्त भी वही हैं। ऐन चुनाव के बीच ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने जब शरद पवार को तलब किया, तब पवार ने इसे मराठी अस्मिता में बदल दिया। शारीरिक रूप से लाचार पवार ने एक दिन में कई-कई रैलियां कीं और उन्हें लोगों का समर्थन मिला।
यह संदेश फैला कि दिल्ली से टक्कर लेनी है। उसका चुनावी लाभ सिर्फ पवार की पार्टी एनसीपी को ही नहीं, बल्कि कांग्रेस को भी मिला। शरद पवार भारतीय राजनीति के बेहद चतुर खिलाड़ी हैं, जिन्हें विगत में पार्टी लाइन से अलग जाने में भी हिचक नहीं हुई थी।
महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस की महाविकास अघाड़ी सरकार बनाने की कोशिश उन्हीं शरद पवार के अनुभवी कंधों पर थीं। लेकिन उनके जैसे चतुर नेता को भी पता नहीं था कि भाजपा एक वैकल्पिक रणनीति पर तेजी से काम कर रही है। कल तक जो शरद पवार महाराष्ट्र की राजनीति के किंगमेकर थे, जिनकी कोशिशों से महाराष्ट्र प्रगतिशील अघाड़ी की सरकार बनने वाली थी, आज उनकी पार्टी में ही नहीं, परिवार में भी फूट पड़ चुकी है।
लेकिन इन्हें शायद भनक नहीं थी कि बदलते राजनीतिक समीकरणों से हैरान भाजपा भी अपनी कोशिशों में लगी थी। शुक्रवार की देर रात से शनिवार सुबह तक भाजपा ने जिस तेजी से एक के बाद एक दांव चले, उनसे साफ है कि अजित पवार के संपर्क में वह बहुत पहले से थी। चुनाव के समय इन्हीं अजित पवार को भाजपा जेल भेजने की बात कह रही थी। लेकिन शिवसेना का साथ छूटने के बाद भाजपा ने उन्हीं अजित पवार के साथ मिलकर सरकार बनाने के बारे में सोचा।
महाराष्ट्र की राजनीति में दो सवाल बेहद प्रासंगिक हैं। एक यह कि सरकार गठन के मामले में हमेशा तेजी दिखाने वाली भाजपा ने महाराष्ट्र में सरकार गठन के प्रति इतनी लंबी चुप्पी क्यों साधे रखी? लेकिन उसका जवाब मिल चुका है कि शिवसेना के इनकार के बाद व्यावहारिक तौर पर सरकार बनाने का कोई विकल्प न होने के बावजूद भाजपा ने अजित पवार को तोड़कर सरकार बना ली। लेकिन
दूसरे सवाल का जवाब फिलहाल नहीं है कि शरद पवार जैसे धुरंधर नेता को इसका पता कैसे नहीं चला कि अजित पवार भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने की कोशिश में हैं। विडंबना देखिए, शिवसेना और कांग्रेस, दोनों को लग रहा था कि भाजपा उसके विधायक तोड़ लेगी। इसलिए इन दोनों पार्टियों ने अपने विधायकों को बाहर भेज दिया था। जबकि एनसीपी के विधायक खुले घूम रहे थे। पर टूटी आखिरकार एनसीपी ही!
देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने शपथ तो ले ली है। संभव है कि बहुमत की परीक्षा में भी यह सरकार पास हो जाए। इसकी वजह यह है कि एनसीपी के अनेक युवा विधायक भाजपा की सरकार में जाने के इच्छुक हैं, क्योंकि इसमें स्थिरता की गारंटी है। जबकि शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस अगर मिलकर सरकार बनाती, तो उसकी स्थिरता की गारंटी नहीं थी। लेकिन सुबह राजभवन में अजित पवार के साथ पहुंचे एनसीपी विधायकों ने जिस तरह शरद पवार के प्रति समर्थन जताया है, उससे अजित पवार और नई सरकार की महत्वाकांक्षा को झटका लगे, तो आश्चर्य नहीं।
खेल अभी खुला हुआ है। अजित पवार के साथ एनसीपी के 36 विधायक हों, तो वह दलबदल कानून के दायरे में नहीं आएंगे। लेकिन अजित पवार के साथ जाने वाले विधायक कम हुए, तो खेल बिगड़ सकता है। कर्नाटक मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला इस मामले में प्रासंगिक है। हालांकि इसमें स्पीकर की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण साबित होगी। अलबत्ता मौजूदा प्रसंग ने जिस राजनेता के पैरों तले से जमीन खींच ली है, वह निर्विवाद रूप से शरद पवार हैं।