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विकल्प बनती दोस्ती

Mon, 25 Aug 2014 08:46 PM IST
मनीषा प्रियम
मनीषा प्रियम Updated Mon, 25 Aug 2014 08:46 PM IST
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Friendship driving

चार राज्यों में विधानसभा की 18 सीटें आंकड़ों के लिहाजा से राष्ट्रीय तो क्या, राज्य स्तर पर भी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं मानी जातीं, लेकिन अभी इन सीटों पर हुए उपचुनाव के परिणाम ने राजनीति का बाजार गर्म कर दिया है। बिहार में इसे जहां 'सेमी फाइनल' मुकाबला माना जा रहा था; क्योंकि वहां अगले साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं, वहीं अन्य तीन राज्यों में भी इसे 'मोदी लहर' से जोड़कर देखा गया। यकीनन यह परिणाम छोटे स्तर का है और इससे कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, लेकिन चूंकि यह नतीजा एनडीए के लिए सुखद नहीं है, इसी वजह से चर्चा गर्म है। लोग जहां मोदी लहर पर प्रश्न उठा रहे हैं, वहीं यह भी पूछा जा रहा है कि क्या अब भी उनका नाम देश भर में चुनावी जीत की गारंटी है। पूछा यह भी जा रहा है कि क्या मोदी विरोधी गठबंधन भी एक सफल राजनीतिक भविष्य की आशा कर सकता है।

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इन उपचुनावों में बिहार में भाजपा को चार, मध्य प्रदेश में दो और कर्नाटक में एक सीट मिली है, जबकि पंजाब के उसकी सहयोगी अकाली दल एक सीट बचा सकी है। पिछले विधानसभा चुनावों से अगर तुलना करें, तो पंजाब को छोड़ शेष तीन राज्यों में भाजपा को महज चार सीटों का नुकसान हुआ है। यह मोदी के नेतृत्व पर प्रश्नचिह्न लगाने का आंकड़ा तो नहीं माना जाएगा। पर यह नतीजा महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि हर राज्य के नतीजे के अलग-अलग संदेश हैं। मध्य प्रदेश में पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान पूर्ण बहुमत के साथ वापस लौटे थे, तो उसकी वजह थी भाजपा के अच्छे मुख्यमंत्रियों में उनकी गिनती और उनका कुशल नेतृत्व। अब उपचुनाव में उन्हें एक सीट का नुकसान हुआ है, जिसका कारण स्थानीय समीकरण है।
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इसी तरह कर्नाटक में भाजपा के दक्षिण भारत के स्तंभ माने जाने वाले येदियुरप्पा के बेटे बी वाई राघवेंद्र महज छह हजार मतों से शिकारीपुरा सीट बचा सके, जबकि यह उनके पिता की पारंपरिक सीट है, जहां से 2013 के विधानसभा चुनाव में वह 24 हजार से अधिक वोटों से जीते थे। यहां बेल्लारी ग्रामीण सीट के विश्लेषण की भी जरूरत है, जहां भाजपा को तगड़ा झटका देते हुए कांग्रेस के एन वाई गोपालकृष्णा ने जीत दर्ज की है। यह वह सीट है, जिसका प्रतिनिधित्व पहले बी श्रीरामालु कर रहे थे, जो किसी समय में खनन क्षेत्र के दिग्गज और पूर्व मंत्री जनार्दन रेड्डी के वफादार माने जाते रहे हैं। भाजपा की यहां हार का मतलब यह है कि राज्य की कांग्रेस सरकार और उसके मुखिया सिद्धरमैया में लोगों का विश्वास बढ़ा है।
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पंजाब में भाजपा के नुकसान की वजह शिरोमणि अकाली दल के प्रति स्थानीय लोगों का गुस्सा है। भले ही 2012 के विधानसभा चुनाव में अकालियों ने वहां अप्रत्याशित सफलता हासिल की थी, पर लोकसभा चुनाव, और अब उपचुनाव में यह राज्य वास्तव में न्यूजमेकर रहा। लोकसभा में जहां भाजपा के दिग्गज अरुण जेटली को यहां हार का मुंह देखना पड़ा, वहीं इस बार पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर कौर की पत्नी परनीत कौर ने अकाली दल के उम्मीदवार को 23 हजार से अधिक वोटों से पराजित किया। भाजपा की परेशानी यह है कि बीजू जनता दल और जनता दल (यूनाइटेड) के एनडीए से अलग हो जाने के बाद अकाली दल ही उसका सबसे बड़ा सहयोगी है, लेकिन इसके प्रति स्थानीय लोगों में नाराजगी भी बहुत है। लिहाजा यहां की हार का दोष भाजपा पर नहीं मढ़ा जा सकता।

विधानसभा उपचुनावों के परिणामों के लिहाज से बिहार के नतीजे सबसे महत्वपूर्ण हैं। यहां उत्तर प्रदेश के बाद सबसे अधिक मतदाता हैं, और 90 के बाद से ही यहां गैरकांग्रेसी सरकारें रही हैं। यह राज्य मंडल का गढ़ रहा है और कमंडल का रथ राज्य की सीमा से बाहर रोक चुका है। ऐसे में लोकसभा चुनाव में हार के बाद नीतीश ने जटिल राजनीतिक पासा फेंका। पहले उन्होंने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाकर रामविलास पासवान के छिटकने की भरपाई की। और फिर अपने धुर विरोधी लालू यादव से हाथ मिलाया। गौरतलब है कि यह नया राजद-जदयू महागठबंधन तब हुआ है, जब लालू चारा घोटाले के लिए अभियुक्त करार दिए जा चुके थे और नीतीश दस वर्षों के लालू राज को जब-तब 'कुशासन' बताया करते थे।

ऐसे में, विश्लेषकों की जिज्ञासा यह थी कि इस राजनीतिक प्रयोग को मतदाता किस रूप में देख रहे हैं। ऐसा माना गया था कि बिहार के मतदाता विकास के अनुगामी हो गए हैं और लालू के साथ गठबंधन को वे अस्वीकार कर देंगे। पर इन नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि नरेंद्र मोदी के विकास पुरुष के कद के बजाय मतदाताओं ने स्थानीय विकास पुरुष नीतीश को पसंद किया। वैसे भाजपा ने इस चुनाव को हल्के में लिया और अपने किसी बड़े नेता को चुनाव प्रचार के लिए बिहार दौर पर नहीं भेजा। लिहाजा यह परिणाम उसे बिहार में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बेहतर रणनीति बनाने की ओर प्रेरित करेगा।


बहरहाल इन परिणामों के कई संदेश हैं। पहला यही कि कांग्रेस-राजद-जदयू गठबंधन अब सच्चाई बन चुका है, जो कई पुरानी राजनीति को दरकिनार करता है। मुसलमानों का एकमुश्त वोट इस गठबंधन को मिला है, लिहाजा संघर्ष अब अन्य जातियों का मत अपनी ओर खींचने के लिए होगा। चूंकि राज्य में अति पिछड़ों के वोट हासिल करने के लिए ही राजनीतिक संघर्ष है, इसीलिए नीतीश ने जीतन राम मांझी का कार्ड चला। कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष और भाजपा की नई सहयोगी लोजपा के अध्यक्ष भी अति पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधि हैं। ऐसे में, जदयू, राजद और कांग्रेस का यह गठबंधन आने वाले दिनों में राष्ट्रीय स्तर पर भी नया प्रयोग कर सकता है और एनडीए को मजबूत प्रतिरोध दे सकता है। यह परिणाम नीतीश और भाजपा के संबंध के अंत पर भी आधिकारिक मोहर है। अब जब यह स्पष्ट है कि भाजपा की विरोधी पार्टियों को मुस्लिम वोट मिलता है, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले चुनावों में यह नया समीकरण 'मोदी रथ' को कितना रोक पाता है।

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