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संक्रमण-समय के चार नए अध्याय

Sat, 02 Mar 2013 11:12 PM IST
अरुण आदित्य
अरुण आदित्य Updated Sat, 02 Mar 2013 11:12 PM IST
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four new chapter of transition time

रवि बुले के दूसरे कहानी संग्रह 'यूं ना होता तो क्या होता' में कुल जमा चार कहानियां हैं, लेकिन वास्तव में ये हमारे संक्रमण-समय के चार आख्यान हैं। पर ये सरल एकरेखीय आख्यान नहीं हैं। इनमें समय की अनेक उलझी हुई गुत्थियां हैं, जिन्हें खोलने के लिए पाठक को भी थोड़ा रचनात्मक होना पड़ता है।

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संग्रह की शीर्षक कहानी 'यूं ना होता तो क्या होता' हमारी सामाजिक-राजनीतिक संरचना में एक आम आदमी के छोटे-छोटे सपनों के बिखरकर दुःस्वप्न में बदल जाने की कहानी है। स्वप्न, यथार्थ और नियति के धागों में उलझी यह कहानी ऐसे दौर का बयान है, जहां एक आम आदमी को अपने सपने पर शहीद हो जाने के बाद भी इतिहास में दर्ज हो पाने के लिए पीतल के एक बिल्ले की दरकार होती है।
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इस कहानी के नायक शिवमंगल पांडे के बहुत छोटे-छोटे स्वप्न थे-पांडे जी अपराजेय पहलवान बनना चाहते थे। पांडे जी फौज में भर्ती होना चाहते थे। पांडे जी देश के काम आना चाहते थे। पांडे जी ब्राह्मण धर्म का पूरी निष्ठा से पालन करना चाहते थे। आमिर खान की फिल्म 'मंगल पांडे : द राइजिंग' देखने के बाद पांडे जी मंगल पांडे बनना चाहते थे। लेकिन वक्त ने उन्हें डिसमिस पांडे बना दिया। वे अपराजेय नहीं रहे। फौज ने रिजेक्ट कर दिया।
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सखूबाई के मोहपाश में बंधकर अपना तथाकथित ब्राह्मणत्व भी खो बैठे। देश के काम आने का सपना देखने वाले पांडे जी अंततः पुलिस फायरिंग में मारे गए। स्वप्न, यथार्थ, इतिहास और फंतासी के संगुम्फन से निर्मित विशिष्ट शैली में यह कहानी अंत तक पाठक को बांधे रखती है। कहन की यह विशिष्टता रवि को समकालीन कथाकारों से अलग करती है। पूर्ववर्ती कथाकारों में ऐसा कौशल उदय प्रकाश के पास दिखता है।

संग्रह की पहली कहानी 'मैं, एक बयान' का नायक रूपहले परदे का नायक बनने का स्वप्न लेकर मुंबई आता है, लेकिन नियति उसे मायानगरी की ऊबी हुई और सुखी महिलाओं के दैहिक-मानसिक मनोरंजन का साधन बना देती है। इस एक कहानी में मायानगरी की कई रंगीन और काली रातों की कहानियां हैं और हर कहानी के बाद लगता है कि अब क्लाइमेक्स आने वाला है, पर कहानी एक और रात में दाखिल होकर आगे बढ़ जाती है। रवि मुंबई में फिल्म पत्रकारिता भी कर चुके हैं और उस दौर के अनुभवों ने इस कहानी को विश्वसनीय डिटेल्स दिए हैं।

तीसरी कहानी 'एक्सक्लूसिव स्टोरी' अखबार जगत की हकीकतों से रूबरू कराती है। साहित्यिक अभिरुचि के पत्रकार डीडी पाराशर एक तिकोनी कहानी लिखना चाहते थे, जिसमें वह संपादक को अमरीशपुरी बनाना चाहते थे और खुद सलमान खान बनना चाहते थे। लेकिन वैश्विक मंदी के दौर में नियति ने उन्हें एक ऐसे मोड़ पर ला पटका कि प्रधानमंत्री की प्रेस कान्फ्रेंस कवर करने पहुंचे डीडी खुद एक खबर बन गए। इस कहानी में अखबारों के बदलते माहौल, अंदरूनी दांव-पेच के बीच सृजनात्मकता की टूटती सांसों को गिना जा सकता है।


संग्रह की अंतिम रचना 'डेढ़ कहानी' यूं तो एक प्रेम कथा है, पर यह आतंक कथा भी है। इस कहानी में गल्प गुरु देवर्षि नारद भी हैं, तो बम विस्फोट के सिलसिले में गिरफ्तार आधुनिक साधिका भी है। हजारों लोगों को मौत के घाट उतारने वाले 'अहिंसक' नायक में बुद्धकालीन अंगुलिमाल की झलक मिलती है, तो उसकी प्रेमिका के चरित्र पर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की छाया नजर आती है। मिथक, इतिहास और वर्तमान में आवाजाही करती यह कहानी रवि की क्रिएटिव रेंज की गवाही देती है। रवि बुले अपने पहले संग्रह 'आईने', 'सपने और वसंत सेना' से ही एक खास मुकाम बना चुके हैं। ये चार कहानियां उन्हें अपने उस मुकाम से चार कदम आगे ले जाती हैं।

यूं न होता तो क्या होता, लेखक-रवि बुले
प्रकाशक-हार्पर कॉलिंस पब्लिशर्स इंडिया
मूल्यः 199 रुपए

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