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भुला दिए गए भारतीय योद्धा

Tue, 13 Nov 2018 07:06 PM IST
prashant dikshit प्रशांत दीक्षित
Updated Tue, 13 Nov 2018 07:06 PM IST
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Forgotten Indian warriors
प्रथम विश्वयुद्ध के योद्धा

बीते ग्यारह नवंबर को प्रथम विश्वयुद्ध को सौ वर्ष पूरे हो गए। प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय उपमहाद्वीप के सैनिकों की भागीदारी, भूमिका और महत्व के बारे में हमारे पास बहुत कम जानकारी है, जबकि यूरोप में इसको लेकर भारी दिलचस्पी है, जो हमें गहरे तक छूती है। हालांकि कुछ भारतीय अखबारों में इस महान युद्ध के शुरू होने की सौवीं सालगिरह को व्यापक कवरेज दिया गया है। साहसी प्रयासों के बावजूद भारतीय उपमहाद्वीप के लेखकों की चुप्पी अखरती है, हालांकि भारतीय मूल के कुछ इतिहासकारों एवं विद्वानों ने ब्रिटिश या अन्य क्षेत्रों के शिक्षाविद के रूप में इस पर लिखा है।


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इस पृष्ठभूमि में यह देखना परेशान करता है कि भारत की भूमिका और उसके योगदान को अक्सर भुला दिया जाता है। भारत ने जवानों और सामग्री, दोनों के मामले में इस विश्वयुद्ध में पर्याप्त योगदान दिया था। भारतीय सैनिकों ने दुनिया भर के कई युद्ध क्षेत्रों-फ्रांस, बेल्जियम, अदन, अरब, पूर्वी अफ्रीका, गैलीपोली, मिस्र, मेसोपोटामिया, फलीस्तीन, फारस, सैलोनिका, रूस और यहां तक कि चीन में गरिमा और सम्मान के साथ सेवाएं दीं।

इस तरह से हम भारत के लोग ब्रिटिश सेना के एक हिस्से के रूप में अपने रिश्तेदारों और पूर्वजों के योगदान को अनदेखा करने के दोषी हैं। हमने उस वक्त भारत की आबादी 32.5 करोड़ लोगों में से प्रथम विश्वयुद्ध में हिस्सा लेने वाले 17 लाख लोगों को भुला देना बेहतर समझा, जिनमें से ग्यारह लाख लोग सैनिक थे और छह लाख श्रमिक। इनमें से 62,000 लोग वापस नहीं आ सके, जबकि अन्य 67,000 लोग घायल हो गए। कुल मिलाकर युद्ध के दौरान कम से कम 74,187 भारतीय सैनिकों की मृत्यु हो गई।

हालांकि प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय योगदान पर डला पर्दा अब उठने लगा है, क्योंकि उत्साही भारतीय शोधकर्ता इस दिशा में काम कर रहे हैं। लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है और ऐसा संभवतः जानकारी के अभाव के कारण है। ऐसा माना जाता है कि मीडिया भारी सेंसरशिप के तहत काम कर रहा था, क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध के समय प्रेस की स्वतंत्रता जैसी कोई अवधारणा विकसित नहीं हुई थी।

प्रेस का उपयोग उस समय प्रचार के उपकरण के तौर पर किया जाता था। प्रत्येक देश ने अपनी सकारात्मक छवि बनाने के लिए मीडिया को तैनात किया था। मासूम कुंवारे युवाओं में देशभक्ति की भ्रमित भावना भरकर प्रेस ने उन्हें युद्ध में शामिल होने के लिए उकसाया था। वर्ष 1914 से 1919 के बीच पत्रकारों की तीन श्रेणियां थीं-आधिकारिक पत्रकार, मुक्त प्रेस और शौकिया पत्रकार या सैनिक, जो बंकरों से रिपोर्टिंग करते थे। केवल आधिकारिक पत्रकारों को ही युद्ध क्षेत्र में जाने की इजाजत थी और आधिकारिक तस्वीरें ही युद्ध क्षेत्र की छवियों के प्राथमिक स्रोत थे।

बाद में विद्वानों ने भारत के बौद्धिक परिवेश की इस चूक को समझने का प्रयास किया। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सेंट एंथोनी कॉलेज के पश्चिम एशिया केंद्र के फेलो और पश्चिम एशिया के आधुनिक इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर यूजीन रोजान लिखते हैं, 'प्रथम विश्वयुद्ध में सैनिकों, गैर-योद्धा और श्रमिकों के रूप में अपनी सेवाएं देने वाले भारतीय लोगों की बड़ी संख्या को देखते हुए यह हैरान करने वाला है कि हम उनके युद्ध अनुभवों के बारे में कितना कम जानते हैं। यूरोप और मध्य पूर्व के सैनिकों के विपरीत भारतीय सैनिकों और अधिकारियों की बहुत कम डायरी, पत्रिकाएं या संस्मरण प्रकाशित हुए हैं। विद्वान लोग इस खाई को पाटने के लिए सक्रियता से काम कर रहे हैं।

‘यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में शांतनु दास और यूनिवर्सिटी ऑफ हल के डेविड ओमिशी, दोनों ने भारतीय सैनिकों द्वारा लिखे गए पत्रों और डायरी सहित नए स्रोत जुटाए हैं। फिर भी उपलब्ध सामग्री की मात्रा भारतीय सैनिकों (जिन्होंने युद्ध लड़ा, जो पीड़ित हुए और जो मारे गए) के एक मामूली अनुपात का प्रतिनिधित्व करती है। प्रथम विश्वयुद्ध को याद करने के इस मौसम में भारतीय सैनिकों की विपुल संख्या, जितने मोर्चों पर वे लड़े और जितनी कठिनाइयां उन्होंने झेली, इन सबको देखते हुए उनके योगदान की उपेक्षा करके उस महायुद्ध का कोई भी विवरण पूरा नहीं हो सकता।'

जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता में इतिहास के प्रोफेसर और नार्वे के ओस्लो स्थित पीस रिसर्च के ग्वोबल फेलो कौशिक राय लिखते हैं, ‘इतिहासकार भारतीय सैनिकों की भूमिका के प्रति उदार नहीं रहे हैं। ब्रिटिश और अमेरिकी विद्वानों ने मित्र देश और जर्मन सैनिकों के बीच के घमासान युद्ध संबंधी अपने आलेखों में भारतीय सैनिकों को मामूली जगह दी है। उनकी नजर में भारतीय सेना एक औपनिवेशिक पुलिस बल थी, जो बड़े पैमाने पर युद्ध संचालन के लिए अनुकूल नहीं थी। और भारतीय नागरिक इतिहासकारों ने कभी सैन्य मामलों में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई।

‘विदेशी औपनिवेशिक शासन के लिए लड़ने और मरने वाले सिपाही चर्चा में कभी प्रमुखता में नहीं रहे, जिसने उपनिवेश विरोधी संघर्ष पर जोर दिया। भारत के उच्च शिक्षण संस्थान भी भारतीय संस्कृति के सैन्यीकरण होने के भय से प्रथम विश्वयुद्ध के सैन्य इतिहास को प्रायोजित करने के इच्छुक नहीं थे।

‘भारत में अब भी प्रथम विश्वयुद्ध के आधिकारिक इतिहास का अभाव है। भारतीय सेना का इतिहास आम तौर पर सेवानिवृत्त सैन्य इतिहासकारों का उपयोग ड्रम्स ऐंड बटन्स (परेड वगैरह जैसे औपचारिक दिखावे) की कहानियां लिखवाने के लिए करता है, जिसे पेशेवर इतिहासकारों द्वारा गंभीरता से नहीं लिया जाता है।’ 

यह आलेख प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय सैनिकों के योगदान को याद करने का एक विनम्र प्रयास है, उम्मीद है कि भारत के इतिहासकार इस तरफ ध्यान देंगे।

लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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