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पटरी पर लौटती विदेश नीति, बदलाव का स्वागत किया जाना चाहिए

Mon, 02 Nov 2020 03:59 AM IST
राजेश बादल राजेश बादल
राजेश बादल Published by: राजेश बादल Updated Mon, 02 Nov 2020 03:59 AM IST
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Foreign policy of India returning on track
सार्क बैठक में विदेश मंत्री एस जयशंकर - फोटो : एएनआई

भारतीय विदेश नीति अब करवट लेती दिखाई दे रही है। यह एक सकारात्मक परिवर्तन है, जो बहुत पहले होना चाहिए था। भारत अपनी आंतरिक राजनीति में कुछ साल उलझा रहा और चीन, पाकिस्तान ने हमारी  विदेश नीति में आए इस ठंडेपन का फायदा उठाया। इससे भारत की स्थिति जटिल हो गई। गनीमत है कि हम वक्त रहते सावधान हो गए। इस नीतिगत बदलाव का स्वागत किया जाना चाहिए।


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काठमांडू में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के साथ भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के प्रमुख की लंबी बैठक ने दोनों देशों के रिश्तों में आई दरार पाटने की दिशा में कदम बढ़ाया। यह नेपाल के रवैये में आया बड़ा परिवर्तन है। हालिया वर्षों में नेपाल का चीन प्रेम बढ़ता गया है। चीन ने इस खूबसूरत पहाड़ी देश में चालाकी से हिंदुस्तान के प्रति नफरत के बीज बो दिए थे। अब इनकी जड़ें गहरी हो चुकी हैं। भारत ने पिछले कुछ साल से इस दिशा में ध्यान ही नहीं दिया था। या तो विदेश नीति देखने वाले नौकरशाह शीर्ष स्तर से हरी झंडी का इंतजार कर रहे थे या यह सोचकर बैठे थे कि नेपाल तो भारतीयों का दूसरा घर है, इसलिए वहां से किसी खतरे का सवाल ही पैदा नहीं होता। बाद में यह भ्रम टूट गया। यही हाल नेपाल का भी हुआ। कुछ दिन पहले तक भी केपी शर्मा ओली चीन की भाषा बोल रहे थे।


पर चीन की असलियत शीघ्र ही उनके सामने खुल गई। चीन ने नेपाल के बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया। उपकारों के बोझ तले दबे केपी चीन से शिकायत तक नहीं कर सके। उन्होंने तटस्थता की नीति अपनाने की कोशिश की। इससे बौखलाया चीन नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में ओली-विरोधियों को संरक्षण देने लगा। घबराए ओली को अब भारत की दोस्ती के महत्व पता चल रहा है। भारत ने हमेशा उसके हितों की रक्षा की है। नेपाल में एक बड़ा वर्ग भी चीन से सरकार की निकटता का विरोधी है और भारत से बेहतर रिश्ते चाहता है। इसी क्रम में म्यांमार से रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या और उसकी सीमा पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद संबंधों में आई खटास पाटने का प्रयास हुआ।

चीन ने बांग्लादेश के साथ म्यांमार का इसी मसले पर गोपनीय समझौता कराया था। आंग सान सू की ने तो स्पष्ट कहा था कि वह चीन से दोस्ती के लिए भारत की नाराजगी पर ध्यान नहीं देती। म्यांमार का गुस्सा भारत के लिए झटके से कम नहीं था। ऐसे में म्यांमार की नौसेना को मजबूत बनाने के लिए भारत अपनी आधुनिक पनडुब्बी आई एन एस सिंधुवीर म्यांमार को दे रहा है। दरअसल भारत और म्यांमार के लिए बंगाल की खाड़ी की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है और म्यांमार की नौसेना में यह पहली पनडुब्बी है।

वहां की नौसेना के अनेक अधिकारी भारत में प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। इस पनडुब्बी के जरिये म्यांमार की नौसेना खुद को शक्तिशाली रूप में बदलेगी, पर देखना यह है कि इस देश का भारत के प्रति व्यवहार बदलता है या नहीं। गौरतलब है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश चीन से करीब एक दर्जन पनडुब्बियां लेकर अपने नौसैनिक बेड़े में शामिल कर चुके हैं। वैसे बांग्लादेश भी हमसे छिटक ही गया था। भारत ने चूंकि प्याज निर्यात पर रोक लगा दी थी, जिससे क्षुब्ध बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को कहना पड़ा था कि उन्होंने अपनी रसोई में प्याज पर बंदिश लगा दी है।

बाद में भारत को भूल का एहसास हुआ। बीते दिनों भारतीय विदेश सचिव बांग्लादेश गए और प्रधानमंत्री से मिले। नेपाल की तरह बांग्लादेश भी भारत से भावनात्मक रूप से जुड़ा है। बांग्ला भाषा, साहित्य, संस्कृति और सरोकार दोनों देशों को एक मंच पर लाते हैं। बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई बिना भारतीय सहयोग के नहीं लड़ी जा सकती थी। इसलिए बांग्लादेश के साथ रिश्तों में भारत को संवेदनशील रहना चाहिए। श्रीलंका का मामला भी ऐसा ही है। चीन के चंगुल में फंसे इस सुंदर  द्वीप-देश ने उससे अपने को मुक्त कर 'सबसे पहले भारत' और 'भारत जैसा कोई मित्र नहीं' का एलान किया है। मालदीव पहले ही चीन से छिटक चुका है। मान सकते हैं कि भारतीय विदेश नीति ने पुरानी राह पकड़ ली है। इसी में भलाई है।

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