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गंगा की अविरलता के लिए
तवलीन सिंह
Updated Sun, 21 Oct 2018 05:09 PM IST
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अफसोस कि 'मी टू' और सबरीमाला के शोर में गंगा मां के एक ऐसे योद्धा के देहांत को वह ध्यान नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था। स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद लंबी भूख हड़ताल के बाद चले गए। न कोई मंत्री वहां पहुंचे उनके जाने से पहले और न ही हम मीडियावालों ने उनकी मांगों पर ध्यान दिया।
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स्वामीजी कभी आईआईटी, कानपुर में प्रोफेसर गुरुदास अग्रवाल हुआ करते थे, जहां वह पर्यावरण विज्ञान के विशेषज्ञ के नाते प्रसिद्ध हुए, लेकिन उनके जीवन का असली लक्ष्य था गंगा जी के जल को अविरल और पवित्र रखना। उनका हथियार था उपवास। पहले भी दो बार 2009 और 2012 में सरकार का ध्यान अपने इस मिशन की तरफ आकर्षित करने के लिए उन्होंने उपवास रखे। इस बार उनकी मुख्य मांग थी कि गंगा जी के ऊपरी, पहाड़ी हिस्से में बांध न बने, ताकि अविरल रह सके गंगा जी का पानी।
माना कि मोदी सरकार के लिए यह मांग पूरी करना कठिन था, लेकिन एक बार प्रधानमंत्री स्वामी जी से मिल आते, तो शायद उनको समझा पाते कि उनकी सरकार ने गंगा जी के लिए पूर्व सरकारों से ज्यादा काम किया है। कानपुर में गंगा किनारे जहरीला पानी उगलने वाले जो उद्योग थे, वे सब बंद कर दिए गए हैं। हाल में हुए इंटरनेशनल सेनिटेशन कॉन्फ्रेंस में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने घोषित किया कि गंगा किनारे जितने भी गांव हैं, उनको अब ओडीएफ कर दिया गया है, यानी वहां खुले में शौच करना बंद हो गया है। समस्या लेकिन यह है कि दशकों की लापरवाही और गंदगी का खामियाजा तो भुगतना पड़ेगा। राजीव गांधी के समय बना था गंगा ऐक्शन प्लान, सो उस समय अगर गंगा जी में से प्रदूषण हटाने का काम ईमानदारी से किया गया होता, तो संभव है कि स्वामी जी को अपनी जान न देनी होती। बहुत कुछ किया जा सकता था पिछले चालीस साल में, जो न सिर्फ नहीं हुआ, बल्कि जो पैसा भारत सरकार ने गंगा जी की सफाई के लिए दिया था, उसका अधिकतर हिस्सा भ्रष्ट अधिकारियों और राजनीतिज्ञों की जेबों में गया है। शायद ऐसा आज भी हो रहा होगा।
लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि मोदी सरकार ने गंगा जी की सफाई में जितनी गंभीरता दिखाई है, वह पहले किसी सरकार ने नहीं दिखाई थी। आधुनिक तकनीकों का इस कार्य के लिए इस्तेमाल किया जा रहा और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों से सलाह ली जा रही है। काश, कि बनारस के संकटमोचन मंदिर के स्वर्गीय महंत वीरभद्र मिश्र की उस योजना पर भी अमल हो रहा होता, जो उन्होंने कई साल पहले बनारस की नगरपालिका को बना कर दी थी। महंत जी के साथ मेरी आखिरी मुलाकात में उन्होंने मुझे उस योजना के बारे में बताया था। वह खुद इंजीनियर थे, सो उन्होंने ऐसी योजना तैयार करके स्थानीय शासकों को दी, जिसके तहत बनारस का सीवर गंगा जी में न जाने के बदले शहर से बाहर दूर ले जाने का प्रावधान था। इस सीवर से खाद बनाने का भी प्रावधान था। महंत जी ने उस आखिरी भेंट में मुझे कहा था, 'भारत में हम कभी नदियों में मल नहीं डाला करते थे। ऐसा करना अंग्रेजों ने शुरू किया था, जो हमको बहुत पहले ही बंद कर देना चाहिए था।’ अफसोस कि उस समय महंत जी की योजना को उत्तर प्रदेश सरकार ने रोक डाला, लेकिन उस पर आज भी अमल हो सकता है, अगर नरेंद्र मोदी बनारस के सांसद बनते समय गंगा मां से किया अपना वायदा पूरा करना चाहते हैं। स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद की आत्मा को शांति प्रदान करने का इससे अच्छा रास्ता क्या हो सकता है?