{"_id":"693763da7e27aa3552079503","slug":"flight-crisis-is-result-of-indigo-arbitrariness-2025-12-09","type":"story","status":"publish","title_hn":"आसमान पर कब्जा: संकट इंडिगो की मनमानी का नतीजा, खामियाजा लाखों यात्री भुगत रहे","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
आसमान पर कब्जा: संकट इंडिगो की मनमानी का नतीजा, खामियाजा लाखों यात्री भुगत रहे
Tue, 09 Dec 2025 05:43 AM IST
लव गौर
अमर उजाला
अमर उजाला
Published by: लव गौर
Updated Tue, 09 Dec 2025 05:43 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
हवाई यात्रा का अभूतपूर्व संकट इंडिगो की मनमानी का नतीजा है
- फोटो :
अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
पिछले कुछ दिनों से देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो जिस अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है, वह तो दुर्भाग्यपूर्ण है ही, इससे बेबस यात्रियों को जिस तरह से मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, वह और भी शर्मनाक है। देश के विभिन्न हवाई अड्डों पर लाखों यात्री बेहद बुरी स्थितियों में फंसे रहे, किसी की परीक्षा छूटी, किसी की नौकरी का इंटरव्यू, तो कोई गंभीर मरीज डॉक्टर तक वक्त पर नहीं पहुंच सका। इस अफरा-तफरी में एक पिता की अपनी बेटी के लिए सेनेटरी पैड के लिए गुहार तक सुनने वाला कोई नहीं था।यात्रियों के मार्गदर्शन की व्यवस्था किस हद तक चौपट हो सकती है, यह हवाई अड्डों पर फैली अराजकता में साफ दिखा। किसी भी तरह की सेवा में संवेदना अनिवार्य होती है, लेकिन इंडिगो के नियामक तंत्र और सरकार की तरफ से भी इस पूरे संकट को लेकर जैसी धीमी प्रतिक्रिया आती दिखी, वह हैरान करने वाली है। इस तस्वीर को अगर आज की भारतीय मध्यवर्गीय जिंदगी का आईना कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसे अभिशाप कहें या वरदान कि हमने अपने जीवन को इतना तेज बनाया है कि चीजें आपस में उलझ गई हैं, तभी तो एक हवाई अड़चन ने मानो जीवन को ही ठप कर दिया।
समस्या की मूल वजह डीजीसीए द्वारा सभी एयरलाइंस के लिए पायलटों व अन्य क्रू सदस्यों के आराम और ड्यूटी के नियमों में किए गए बदलावों को बताया गया। हालांकि, सभी एयरलाइनों के पास नियमों के अनुपालन की तैयारी के लिए करीब बीस महीने का समय था, लेकिन इंडिगो के वरिष्ठ प्रबंधन ने शायद सोचा होगा कि वे अपने विशाल बाजार आकार के बल पर सरकार को नए नियमों को स्थगित करने के लिए मजबूर कर देंगे। इंडिगो आज अकेली नहीं जूझ रही, यह तो बस उस पूरे तंत्र का प्रतिबिंब है, जिसमें हम रह रहे हैं। एक एयरलाइन 65 से 70 फीसदी घरेलू बाजार पर कब्जा जमाए बैठी है, जिसे विशुद्ध अर्थशास्त्र में एकाधिकार कहा जाता है, जिस पर अंकुश लगना चाहिए।
इंडिगो बोर्ड को आत्मचिंतन करने की जरूरत है, क्योंकि उसकी गलतियों की जिम्मेदारी कोई और नहीं ले सकता। जरूरी है कि जो दोषी हैं, उन्हें सजा भी मिले। यह पूरा हंगामा सरकार के लिए भी सबक है। उसकी सख्ती से इंडिगो को यात्रियों को रिफंड देने पर मजबूर होना पड़ा, लेकिन सवाल तो यह भी है कि अगर पहले सक्रियता दिखाई गई होती, तो यह आपदा आती ही क्यों। आखिर ऐसे मुद्दों पर सामूहिक आवाज क्यों नहीं उठती?