इराक के लिए जरूरी पांच सिद्धांत
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इराक और सीरिया की बर्बादी से वह व्यवस्था पूरी तरह उलट गई है, जो एक शताब्दी से मध्य-पूर्व को परिभाषित करती रही है। यह एक बड़ा मसला है, और एक राष्ट्र के रूप में इस पर किस तरह प्रतिक्रिया देनी चाहिए, यह सोचने की जरूरत है। दो सप्ताह पहले मैं इराक से वापस लौटा हूं, और मैं समझता हूं कि मेरे इन पांच सिद्धांतों से कुछ राह निकल सकती है। पहला सिद्धांत है, दुश्मन का दुश्मन, मेरा दुश्मन। कुर्द के अलावा कोई दूसरा नहीं है, जो इस युद्ध में हमारा साथ दे। इराक युद्ध का नेतृत्व करने वाले शिया और सुन्नी नेता आज अमेरिकी मूल्यों को साझा करने को तैयार नहीं दिख रहे।
मोसुल शहर पर कब्जा करने वाले सुन्नी जेहादी, बाथ पार्टी के सिपाही और कबीलाई सैनिक उस लोकतांत्रिक बहुलतावादी इराक के समर्थक नहीं हैं, जिसे सहयोग देने का अमेरिका इच्छुक है। इराक के शिया प्रधानमंत्री नूरी कमाल अल मालिकी की कार्यशैली से भी ऐसा नहीं लगता कि वह लोकतांत्रिक बहुलतावादी इराक की इच्छा रखते हैं। कार्यभार संभालते ही उन्होंने सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण पदों से सुन्नी नेताओं और कमांडरों को बाहर कर शियाओं को प्रमुख पद देना शुरू कर दिया है। मालिकी प्रधानमंत्री के साथ कार्यवाहक रक्षा मंत्री भी हैं तथा आंतरिक और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मंत्री भी। केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय पर भी उनके नजदीकियों का नियंत्रण है। अल मालिकी के पास दो विकल्प थे- या तो वह सांप्रदायिक रास्ते पर चलते अथवा समावेशी सरकार की स्थापना करते। उन्होंने सांप्रदायिक रास्ता चुना। लिहाजा अब अमेरिका को उनकी मदद नहीं करनी चाहिए।
दूसरा सिद्धांत 'अरब वसंत' के उस महत्वपूर्ण सवाल से निकला है, जिसके जवाब तलाशने की जरूरत है। ट्यूनीशिया और इराक के अर्द्ध स्वायत्त कुर्दिस्तान, दोनों ने उन सही रास्तों को चुना, जिन पर अमेरिका का ध्यान नहीं था। अमेरिकी सहयोग की चिंता छोड़ उन्होंने खुद अपनी कोशिशों के जरिये अपने क्षेत्र को शांति का द्वीप बनाया; हालांकि यह शांति कब तक कायम रहती है, इस पर संदेह है। लेकिन कुर्दिस्तान में दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वी पार्टियों ने न सिर्फ आपसी बैर खत्म किए, बल्कि मिलकर लोकतांत्रिक चुनाव की ओर भी कदम बढ़ाए, जिस वजह से आज वहां आक्रामक विपक्षी पार्टियां हैं, जिन्होंने पहली बार सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन छेड़ा। वहीं ट्यूनीशिया में आंतरिक संघर्ष और रक्तरंजित इतिहास देखने के बाद धर्मनिरपेक्षतावादी और कट्टरपंथियों के बीच संतुलन स्थापित करने में सफलता मिली, नतीजतन वहां अरब जगत के इतिहास में पहले प्रगतिशील संविधान पर सहमति बनी है।
लिहाजा मेरा दूसरा सिद्धांत यही है- मध्य-पूर्व के चेहरे पर तभी मुस्कान आ सकती है, जब वह स्वतः अपने भीतर से ऐसा करे। यानी वे आपसी मेल-मिलाप की जिम्मेदारी खुद लें। सुन्नी और शियाओं को अमेरिका से हथियार लेने की जरूरत नहीं है। उन्हें सच के लिए खड़े होने की जरूरत है। 21वीं सदी की शुरुआत हो चुकी है और वे अब भी इसी बात पर लड़ रहे हैं कि पैगंबर मोहम्मद साहब के असली उत्तराधिकारी कौन हैं?
मेरा तीसरा सिद्धांत ईरान की दखलंदाजी से जन्मा है। संभव है कि ईरान और उसके रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कुद्स फोर्स के कमांडर जनरल कासिम सुलैमानी ज्यादा व्यावहारिक न हों। लेकिन यह ईरान ही था, जिसने इराक के अपने शिया सहयोगियों को हथियार मुहैया कराए। ईरान अमेरिका को इराक से भगाना चाहता है। उसी ने अल मालिकी को अमेरिका के साथ वह समझौता करने से रोका, जिसके तहत अमेरिकी सैनिकों को वहां रहने की कानूनन मंजूरी मिलती। ईरान इस पूरे क्षेत्र की नेतृत्वकारी ताकत बनना चाहता है। उसकी सेना का सीरिया, लेबनान और इराक तक में विस्तार हो गया है और अमेरिकी फौज वापस हो गई है। उसे आने वाले दिनों की शुभकामनाएं।
अमेरिका की अब भी यही कोशिश है कि वह कोई ऐसा परमाणु समझौता कर ले, जिससे ईरान परमाणु बम विकसित न कर सके, इसलिए ईरान के सुन्नी दुश्मनों को कितनी सहायता दी जाए, इसे लेकर अमेरिका को सावधान रहने की जरूरत है। हालांकि ईरान पर अब भी प्रतिबंध लगा हुआ है और उसकी सेना तथा हिजबुल्लाह सीरिया, लेबनान और इराक में आमने-सामने हैं, इसलिए फिलहाल यही कहना ज्यादा सही है कि अमेरिका के लिए यह मुफीद समय है।
चौथे सिद्धांत की बुनियाद बेहतर नेतृत्व है। इराक की यात्रा के दौरान मैं उस किरकुक शहर भी गया, जिस पर कब्जे को लेकर कुर्द, अरब और तुर्कियों के बीच भीषण लड़ाई हुई थी। पांच वर्ष पहले जब मैं वहां था, तो वह नारकीय युद्धक्षेत्र बना हुआ था। इस बार मैंने वहां पक्की सड़कें, पार्क और एक समृद्ध अर्थव्यवस्था भी देखी। मेरी मुलाकात कुर्द राज्यपाल नाजीमालदीन उमर करीम से भी हुई, जो विगत अप्रैल में पिछली बार से ज्यादा सीटें जीतकर दोबारा चुने गए हैं। ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी कुर्द को अल्पसंख्यक तुर्कों और अरबों ने भी वोट दिया।
मौजूदा हिंसा के बाद कुर्दों ने किरकुक की सेना पर पूरा नियंत्रण कर लिया है, लेकिन मेरा कहना यही है कि अगर अल मालिकी ने इराक को वैसा ही नेतृत्व दिया होता, जैसा करीम ने किरकुक में दिया है, तो आज अमेरिका के पास यह समस्या ही नहीं होती।
और अंत में, जब यह तय हो चुका है कि कुर्द के अलावा कोई दूसरा बड़ा समूह अमेरिकी मूल्यों के लिए इराक में नहीं लड़ रहा है, तो क्या कोई और भी वहां है, जो हमारे हितों के लिए लड़ रहा है; कम से कम एक ऐसे इराक के लिए, जो अमेरिका के लिए खतरा न बने? और हम वास्तव में किसकी मदद कर सकते हैं? जवाब अब तक स्पष्ट नहीं है। लिहाजा जब तक यह साफ न हो, तब तक अमेरिका को वहां बहुत सावधान रहने की जरूरत है।