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नेता का डर, पब्लिक का डर

Sun, 15 Dec 2013 06:02 PM IST
श्याम विमल
श्याम विमल Updated Sun, 15 Dec 2013 06:02 PM IST
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fear of the leader, fear of the public

अपने विराट लोकतंत्र में डर भी किसिम-किसिम के होते हैं। यहां नेता भी डरते हैं और पब्लिक भी डरती है। जैसे पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला को अचानक लड़कियों से डर लगने लगा था। डर इस बात का कि लड़की से बतियाने में कोई छिपा रुस्तम चैनल वाला स्टिंग ऑपरेशन से दृश्य-श्रव्य को टेपित करके उन पर यौन शोषण का इल्जाम न लगा दे।

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हालांकि अपनी इस मौखिक आशंका पर चारों तरफ से हुई थुक्का-फजीहत से दुखी होकर बाद में उन्होंने स्त्री विमर्श के पैरोकारों से माफी मांग ली।

हम पब्लिक का डर दूसरी तरह का है। वह ऐसा कि मतदान के बाद घोषित नतीजों में जीतने वाला कैंडिडेट और उसके समर्थक व कार्यकर्ता जीत की खुशी में मदहोश होकर अपनी चमचागीरी प्रदर्शित करते वक्त ढोल-नगाड़ों की कानफाड़ू ध्वनि प्रदूषण करते हुए लुंगी डांस-पुंगी डांस जैसा कुछ करते-करते अश्लीलता न परोसने लगें।
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दूसरा डर यह है कि सड़क पर या विजेता के घर-द्वार के सामने हजारों-हजार पटाखे वाली लड़ियां बिछाकर उसमें सुलगती तीली छुआकर भड़का न दें और तड़तड़ाहट के साथ निकलते बदबूदार धुएं से दिशाएं न भर दें।
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तीसरा डर यह है कि ऐसे जश्न में कुछ मीठा हो जाए के बहाने मिठाई के डब्बे में पंजे डालकर लड्डू-पेड़ों के निवाले को डाइबिटीज के इस रोगी जमाने में बेलिहाज एक दूजे के मुख प्रदेशों में ठूंसने न लगें। वैसे में हम बुजुर्गों का क्या होगा?

चौथा डर इस तामझाम में फूल-पत्तियों की, कहीं-कहीं नोटों की एनाकोंडा समान विशाल महामालाओं के घेराव में अपनी मुंडियां घुसेड़ने को आतुर अब्दुल्ले (बेगानी शादी वाले) दिखने लगें तो? एक डर तो चर्चिल के जमाने वाले 'वी' शेप दर्शाने वाले विजय चिह्न को बार-बार देखने का हम मतदाताओं के मन में बैठ ही गया है। इस 'वी' के मायने अनेक निकलते हैं।

इन विचित्र डरावनी मुद्राओं की झांकियां नवगठित आप ने लगभग न दिखाकर अच्छा उदाहरण पेश किया है। उसने झाड़ू को परचम की तरह लहराया है, जैसे सारी गंदगी इसी से साफ कर देंगे। आप को यदि बनाए रखा जाए, तो झाड़ू से गंदगी बुहारकर देश की व्यवस्था को साफ-सुथरा करने की उम्मीद बन सकती है।


पुराने पड़ चुके वंशवाद और अंधी व्यक्तिपूजा से ऊपर उठकर कुर्सीप्रेमी बुजुर्गों को विश्राम करने का सविनय निवेदन जतलाकर जन-जन के दिल में स्वच्छ व विश्वस्त जगह बनाने का यही समय है। बताइए, 'आप' के बारे में आपके क्या विचार हैं!

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