{"_id":"36adfc20795f017b6c7dd1b8f09bcdd8","slug":"father-s-dream","type":"story","status":"publish","title_hn":"सपना पिताजी का","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
सपना पिताजी का
योगेंद्र शर्मा
Updated Wed, 20 Nov 2013 07:48 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हर पिता चाहता है कि उसका बेटा उससे भी आगे जाए। अस्तु मेरे स्वर्गीय पिताश्री ने भी अपने पंद्रह मिनटीय सपने में मुझे आकंठ उपेदशामृत पिलाया। आप भी पीजिए-
विज्ञापन
बेटा, संत कबीर फरमा गए हैं, बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय। अतएव दुनिया-जहान को सुधारने का ठेका न ले, खुद को सुधार, अपने घर को संवार। एक उंगली किसी की ओर करो, तो तीन खुद की ओर मुड़ जाती हैं। अर्थात कोई है बुरा, तो तू है, तीन गुना बुरा। दस अवतार लिए श्रीविष्णु, जगत के पालनहार ने। क्या इंसानियत की टेढ़ी दुम रंचमात्र भी सीधी हुई? अंततः थक-हारकर वहीं वापस मुड़ गए।
विज्ञापन
बेटा, सारा मोहल्ला गंदा, सारा शहर गंदा, सारा प्रदेश गंदा, सारा देश हो गंदा, तो फिक्र क्यों करे बंदा। स्वयं खुद और अपना घर साफ-सुथरा होना चाहिए। सरकार तो है उगता हुआ सूरज, जो दुनिया को दे उजाला। उसकी ओर मुंह कर जो थूकेगा, तो उसका थूका उसी के मुंह पर आएगा।
विज्ञापन
बेटा, कुछ भी कर, लेकिन अपना जीवन सफल बना, अमर हो जा। पराए धन, पराई नार को मत ताक, अपने घर का आंगन खोद, चार सौ बीस टन सोना निकाल। सोना है, तो सब कुछ होना, सोना न हो, तो क्या होना?
प्याज, टमाटर शतकवीर हो गए, तो हो जाने दे। इंसान सस्ता हो गया है, तो कोई चीज तो महंगी होगी। इतनी ईर्ष्या क्यों, इतना गुस्सा क्यों? महंगाई तो शाश्वत धर्म है, इसकी शिकायत क्या करना! अनाज महंगा हो गया है, तो कम खा। पेट्रोल के दाम बढ़ गए हैं, तो पैदल चल। साइकिल चलाकर सेहत बना। महिलाओं के खिलाफ अपराध बहुत बढ़ गए हैं, इसलिए उनकी चौकसी करना सीख। हम पहले ही कहते थे कि औरतों का काम घर में रहना है, बाहर निकलना नहीं। पर तुम लोगों ने नहीं सुनी। औरतें काम पर निकलें, तो साथ में कोई पुरुष हो। उनके पर्स में कम से कम छह राखियां रखने का फतवा दे। चोर, डकैत घर में घुस आए, तो चाय, कॉफी आदि से उनका स्वागत करना सीख। घर में जो पान-फूल हों, उन्हें सादर अर्पित कर।
हम पुरुष-प्रधान समाज में जीते हैं, अस्तु मातृभाषा तज, पितृभाषा अपना। हिंदी पढ़ने से क्या होगा? अंग्रेजी पढ़ने में ही कल्याण है। सावधान, तेरी औलादें तेरी तरह हिंदी के लेखक न बन जाएं। फिर तेरी बहुएं सारी उम्र छाती पीटती रहेंगी।