फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   farming of flowers

इतने फूल मत उगाओ

Fri, 08 Mar 2013 10:12 PM IST
Updated Fri, 08 Mar 2013 10:12 PM IST
विज्ञापन
farming of flowers

वेलेंटाइन डे के गुजरे अभी महीना भी नहीं हुआ है। भारत में यह दिन सांस्कृतिक पहरेदारों के उपद्रवों के कारण ज्यादा चर्चित रहने लगा है। प्रेम का इजहार करने के लिए गुलाब की देश के अंदर बिक्री और विदेशों में निर्यात के रिकॉर्ड दर रिकॉर्ड के लिए भी इस दिन को याद किया जाता है।

विज्ञापन


बंगलूरू और पुणे फूलों का सिक्का दुनिया भर में जमा चुके हैं और सरकारी प्रोत्साहन व विदेशी मुद्रा कमाने के प्रलोभन से नए-नए क्षेत्र उभर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश और सिक्किम फूलों की खेती और निर्यात का नया केंद्र बनकर उभर रहे हैं।
विज्ञापन


महाराष्ट्र के भयानक सूखे ने जो सुर्खियां बनाई हैं, उनमें प्रदेश को बिजली उपलब्ध कराने वाले कई बड़े बिजलीघरों का बंद करना शामिल है। प्रख्यात पत्रकार पी साईंनाथ ने इस संकट का विश्लेषण करते हुए जिन कारकों की ओर उंगली उठाई है, उनमें गुलाब की खेती का बढ़ता चलन प्रमुख है।
विज्ञापन
विज्ञापन


गुलाब बहुत ज्यादा पानी की मांग करने वाला पौधा है, गेहूं और धान की तुलना में करीब बीस गुना। गुलाब का एक फूल उगाने में करीब दस लीटर पानी की दरकार होती है। महाराष्ट्र में तो गन्ने की फसल भी गेहूं और धान की तुलना में चार गुना ज्यादा पानी सोखती है।

खेती के पारंपरिक चक्र को त्याग के नए उत्पादनों (विदेशी बाज़ार को ध्यान में रखकर फूल को सबसे ज्यादा प्रोत्साहन दिया जाता है) की ओर रुख करने की सरकारी नीतियां सिर्फ वर्तमान (करीब सौ करोड़ रुपये का फूलों का निर्यात) को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं, पर इनके दीर्घकालिक सामाजिक और पर्यावरणीय दुष्प्रभावों की तरफ से आंखें मूंद ली जाती हैं। महाराष्ट्र के जल संकट के देशव्यापी बन जाने की आशंका पूरी है।

कोमलता और प्यार का प्रतीक गुलाब भू-जल की कमी का बड़ा कारण भी बनता जा रहा है। कर्नाटक को ही लीजिए। इसकी राजधानी बंगलूरू को गुलाबों का शहर भी कहा जाता है। यहां गुलाब सरीखे निर्यात प्रधान फूलों की नर्सरी के क्षेत्रफल में पिछले दिनों दस से पंद्रह फीसदी वृद्धि हुई, पर उत्पादन में कोई बढ़ोतरी नहीं देखी गई।

दक्ष मालियों की कमी, बिजली की दरों में इजाफा और भू-जल का स्तर निरंतर गिरते जाने से उत्पादन बढ़ भी नहीं सकता। ग्रीन हाउस के अंदर अनुकूल तापमान बनाए रखने की तकनीक की शुरुआती लागत तो ज्यादा होती ही है, इनके लिए अच्छी-खासी बिजली की जरूरत भी होती है।

राजस्थान का पुष्कर और हल्दीघाटी क्षेत्र सदियों से गुलाब की पारंपरिक खेती और गुलाब जल व गुलकंद जैसे उत्पादों के लिए विख्यात रहा है, पर गिरते जलस्तर के कारण पिछले कुछ वर्षों में वहां इनका उत्पादन और व्यापार बड़ी तेजी से घटा है।

ज्यादा दिन नहीं हुए, जब पुष्कर में तीन-चौथाई से ज्यादा भूमि गुलाब की खेती में लगी हुई थी, लेकिन अब वहां का नक्शा बदला-बदला लगता है। पानी की कमी से वहां के गुलाब का सुर्ख लाल रंग धीरे धीरे गुलाबी रंग में तब्दील होता गया; लाल गुलाब की प्रजाति ज्यादा पानी की मांग करती है।    
         
अपने गर्म वातावरण के लिए बदनाम अफ्रीका के अनेक देश विश्व फूल व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ समय पहले खबर आई थी कि दुनिया में फूलों का सबसे बड़ा कारोबारी एक भारतीय है, जिसने मुंबई के क्षेत्रफल से पांच गुने आकार की भूमि इथियोपिया में खरीदकर वहां फूलों की खेती शुरू की है।

कीनिया की नैवाशा झील फूलों की खेती के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराती है और वहां उगाए जाने वाले गुलाब के निर्यात की देश की अर्थव्यवस्था में अहम हिस्सेदारी है। पर्यावरण के लिए बेहद सजग रहने वाले नीदरलैंड, ब्रिटेन और जर्मनी उन फूलों के सबसे बड़े खरीदार हैं। पानी की कमी से जूझते देश की इस जीवनदायी झील की हालत जब खस्ता होने लगी, तो कई अध्ययनों ने कीनिया के फूलों के कारोबार को इसका कारण बताया।


दिलचस्प यह है कि ऑक्सफाम जैसा संगठन इथियोपिया के गुलाब खरीदने को नैतिक आधार पर कठघरे में खड़ा करता है। उसका कहना है कि बहुराष्ट्रीय निगमों का शिकंजा ऐसा षड्यंत्रकारी है कि फूलों की बाजारू कीमत का सिर्फ तीन फीसदी इथियोपिया में पहुंचता है और शेष सत्तानबे फीसदी अमीर देशों की तिजोरी में।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed