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किसानों के हिस्से में मायूसी

Thu, 28 Feb 2013 10:36 PM IST
देविंदर शर्मा
देविंदर शर्मा Updated Thu, 28 Feb 2013 10:36 PM IST
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farmers desperate from budget

आर्थिक संकट के साथ-साथ यह दौर चुनावों का भी है। इसलिए वित्त मंत्री चिदंबरम ने इन दोनों बातों को ध्यान में रखते हुए बजट पेश किया है। कृषि और किसानों की बात करें, तो वित्त मंत्री ने इस बात का ध्यान रखा है कि सभी खुश रहें। इस बजट में ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता, जिससे कहा जा सके कि कृषि और किसानों के लिए कोई बदलाव होने जा रहा है। बजट में कोई नई दिशा दिखाई नहीं देती है।

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हालांकि यह समझना होगा कि सरकार ने अगर बहुत अधिक कुछ दिया नहीं है, तो बहुत कटौती भी नहीं की है। पिछले साल कृषि ऋण का लक्ष्य पौने छह हजार करोड़ रुपये था। वर्ष 2013-14 का बजट पेश करते हुए कृषि ऋण के लक्ष्य में 1.25 हजार करोड़ रुपये की बढ़ोतरी की गई है। लेकिन सीधे तौर पर किसानों को इसका फायदा मिलने के बजाय हमेशा की तरह कॉर्पोरेट्स ही ज्यादा फायदे में रहने वाले हैं।
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छोटी अवधि के फसली ऋण के लिए ब्याज छूट योजना का लाभ मिलता रहेगा। समय पर कर्ज का भुगतान करने वाले किसानों को सालाना चार फीसदी के ब्याज पर कर्ज मिलता रहेगा। चिदंबरम ने फसल ऋण पर ब्याज छूट का दायरा निजी और वाणिज्यिक बैंकों तक बढ़ाने की भी घोषणा की है।
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इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा विधेयक के क्रियान्वयन के लिए 10,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी के आवंटन का भी प्रस्ताव किया गया है। फसल विविधता कार्यक्रम की ओर भी सरकार ने थोड़ा ध्यान दिया है। इसके लिए 500 करोड़ रुपये दिए गए हैं। पूर्वोत्तर राज्यों का ख्याल भी वित्त मंत्री ने इस बार भी रखा है।

पूर्वी भारत में दूसरी हरित क्रांति लाने की योजना को ध्यान में रखते हुए चिदंबरम ने अगले वित्त वर्ष के लिए इस योजना के तहत 1,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। उन्होंने खाद सब्सिडी में मामूली कटौती की है। मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि सब्सिडी जब भी बढ़ती है, तो खाद का उपभोग भी बढ़ता है, पर्यावरण के लिहाज से यह स्थिति बेहतर तो नहीं मानी जा सकती। बेहतर होता, सरकार इस सब्सिडी को घटाने के साथ ही जैविक खाद के बारे में कोई बात करती।


मनरेगा के लिए 33 हजार करोड़ देने की बात जरूर हुई है, लेकिन किसानों की आमदनी बढ़ने का कोई जरिया इस बजट में नजर नहीं आता। पोषकता बढ़ाने वाली फसलों के लिए बजटीय आवंटन तो ठीक है। लेकिन सिंचाई की समस्या को इस बार भी नजरंदाज किया गया है। 3,415 करोड़ रुपये की राशि कृषि अनुसंधान के लिए होगी, तो कुछ संस्थान खोलने की भी बात हुई है। कुल मिलाकर तो यही कहा जा सकता है कि सरकार ने सिर्फ लीपापोती करने की कोशिश की है। इस बजट को देखकर तो यही लगता है कि कृषि ऋण में थोड़ी-सी बढ़ोतरी के अलावा नया कुछ भी नजर नहीं आता।

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