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अच्छे दिन सब पहचान नहीं पाते
सुधीर विद्यार्थी
Updated Mon, 08 Jun 2015 08:10 PM IST
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साधो, अच्छे दिन मेरे सामने मुंह बाए खड़े थे, पर मैं उन्हें देख नहीं पा रहा था। मेरे पड़ोसी और उनके पड़ोसी ने उन्हें पहचान लिया। मैंने अचकचाकर अच्छे दिन से पूछा, आप कब आ गए। वह बोले, मैं तो साल भर पहले ही आ धमका था। तुम नहीं देख पा रहे हो, तो यह तुम्हारा दृष्टिदोष है। तुम्हें मोतियाबिंद तो नहीं हुआ? आंखों का किसी अच्छे डॉक्टर से इलाज कराओ। उन्होंने एक साथ कई बातें कह दीं। यह भी कहा कि तुम कांग्रेसी तो नहीं हो। अच्छे दिन सिर्फ सोनिया और राहुल को दिखाई नहीं पड़ते, जबकि मैं खुलेआम सड़क पर विचर रहा हूं।
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अच्छे दिन की दबंगई देख मैं घबरा गया। दरवाजा बंद करने लगा कि कहीं वह भीतर न घुस आए। अच्छे दिन से मैं डरता हूं, जबकि लोग हैं कि उनके इंतजार में पलक-पांवड़े बिछाकर रखते हैं। फिर भी मैंने सकपकाकर अच्छे दिन से पूछ ही लिया, तुम्हें यहां कौन लाया? वह तड़पकर बोले, लगता है तुम विकास विरोधी हो, नमो को नहीं जानते। इन दिनों दुनिया भर में हमारा डंका है। जब ओबामा कहते हैं कि अच्छे दिन आ गए, तो तुम किस खेत की मूली हो!
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मैं अपने मूली होने पर गंभीरता से विचार करने लगा। इतने में मेरे वयोवृद्ध पिता जी भीतर से आ गए। अच्छे दिन को कुछ याद करते हुए वह बोले, तुम तो हमारे लंगोटिया यार के बेटे हो न। अरे, कहां चले गए थे तुम। हम तो तुम्हारी राह देखते बूढ़े हो गए।
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अब आ गए हो, तो छोड़कर जाना नहीं। बहुत मुश्किल से आए हो। तुम्हें इस देश के विकास पुरुष भगीरथ आसमान से लेकर आए हैं। हम बहुत शुक्रगुजार हैं उनके। मेरे पिता की बातें सुन अच्छे दिन फूलकर कुप्पा हो गए। अच्छे दिन सबकी पहचान में नहीं आते। जो अच्छे दिन को नहीं पहचानते, उन्हें बताने के लिए इन दिनों रैलियां की जा रही हैं। तमाम मंत्रियों और सांसदों को काम पर लगा दिया गया है। जून की चिलचिलाती धूप में अच्छे दिन और भी चमचमा रहे हैं। अच्छे दिन के बारे में टीवी और अखबारों में बताया जा रहा है। जय हो, अच्छे दिन की!