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निकाहनामे से 'कुमारी' शब्द हटाने से क्या मिलेगा मुस्लिम महिलाओं को समानाधिकार?

Tue, 10 Sep 2019 04:04 AM IST
तस्लीमा नसरीन तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन Published by: तस्लीमा नसरीन Updated Tue, 10 Sep 2019 04:04 AM IST
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Equal Rights of Muslim women?
मुस्लिम महिला - फोटो : a

बांग्लादेश में उच्च न्यायालय ने विवाह पंजीकरण फॉर्म के पांच नंबर कॉलम में दुल्हन के लिए 'कुमारी' (वर्जिन) शब्द हटाकर 'अविवाहिता' शब्द रखने के लिए कहा है। निकाहनामा में व्याप्त इस विषमता को दूर करने के लिए वहां के कुछ संगठनों ने 2014 में अदालत की शरण ली थी। उनकी शिकायत थी कि निकाहनामा में जिस तरह सिर्फ औरत की वैवाहिक स्थिति के बारे में पूछा गया है, वह संविधान के अनुच्छेद 27, 28, 31, 32 के अनुसार, समानता की भावना के खिलाफ और संविधान-विरोधी है। उन संगठनों का यह भी कहना था कि कुमारी शब्द किसी स्त्री की मर्यादा और गोपनीयता पर हमला है, और संविधान-विरोधी है।


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इन दमदार तर्कों के आधार पर निकाहनामा में जरूरी संशोधन करवा लिए गए। पर नारी विद्वेषी लोगों की सोच में बदलाव लाने का तरीका क्या होगा? क्योंकि कोई पुरुष शादी करने जाता है, तो वह ऐसी दुल्हन चाहता है, जो कुमारी यानी अक्षतयोनि हो। अर्थात पुरुष औरत को भी चीज ही समझता है। लड़की के शिक्षित या मेधावी होने जैसे गुण पुरुषों को उतने आकर्षित नहीं करते। बल्कि अगर लड़की कम पढ़ी-लिखी हो या होशियार न हो, तो पुरुष को लगता है कि इसी बहाने वह उसे अपने अंकुश में रख सकेगा।

पुरुष खुद को चाहे जितना भी प्रगतिशील बताने की कोशिश करे, स्त्रियों और पत्नियों के मामले में वह परंपरावादी ही होता है। वह चाहता है कि उसकी शादी ऐसी लड़की से हो, जिसका किसी लड़के या पुरुष से संपर्क न रहा हो। अगर उसे पता चलता है कि उसकी होने वाली पत्नी की लड़कों से दोस्ती थी, तो वह यह मान लेता है कि फिर वह कुमारी कतई नहीं होगी। ऐसी लड़कियों के साथ विवाह में सिर्फ लड़के की ही नहीं, बल्कि लड़के के घर वालों और समाज की भी आपत्ति रहती है। एक ऐसा दौर भी था, जब लड़के वाले दुल्हन के कुमारी होने की परीक्षा भी लेते थे। संभव है, अब भी कुछ जगहों पर परीक्षा लेने की यह अपमानजनक और स्त्री गरिमा-विरोधी कुप्रथा प्रचलन में हो। अगर ऐसी परीक्षा में दुल्हन खुद के अक्षतयोनि होने का प्रमाण देने में चूक जाती थी, तो फिर उस पर अत्याचार शुरू हो जाता था। ध्यान देने की बात यह है कि इस मामले में पुरुषों को कभी किसी तरह की परीक्षा नहीं देनी पड़ी। समाज में हमेशा से ही जैसे यह मान लिया गया है कि पुरुष के अवगुण अवगुणों की श्रेणी में नहीं आते। समाज का ढांचा ही चूंकि पुरुषवर्चस्ववादी है, ऐसे में, पुरुषों के अवगुणों के बारे में कुछ कहने का दुस्साहस भला किसमें है! निकाहनामे में बदलाव पर बांग्लादेश में यह कहा जा रहा है कि इसका फॉर्म दरअसल पाकिस्तान के जमाने का ही है, और बांग्लादेश के एक अलग राष्ट्र बन जाने के बाद इस फॉर्म में पाकिस्तान की जगह बांग्लादेश लिखने के अलावा और कोई बदलाव नहीं किया गया!

बहुतेरे लोगों का मानना है कि कुमारी की जगह अविवाहिता लिख देने से निकाहनामा अब पूरी तरह दुरुस्त हो गया है। जबकि ऐसा नहीं है। निकाहनामे के फॉर्म के 13वें, 14वें और 15वें कॉलम को लेकर भी आपत्ति है। इसमें पूछा गया है कि दुल्हन को मेहर की रकम क्यों चाहिए? दहेज लड़की वालों की ओर से लड़के को दिया जाता है। जबकि मेहर की रकम लड़के वालों की तरफ से दुल्हन को दी जाती है। अगर दहेज देने पर प्रतिबंध है, तो फिर मेहर की रकम पर प्रतिबंध लागू क्यों नहीं होना चाहिए? ऐसे ही 18वें कॉलम में लिखा है कि पति ने पत्नी को तलाक देने का अधिकार प्रदान किया है या नहीं? अगर हां, तो किन शर्तों पर? यानी पति अगर पत्नी को तलाक देने का अधिकार प्रदान करे, तभी पत्नी तलाक दे सकती है, अन्यथा नहीं। उसमें भी पति जो-जो शर्तें रखेंगे, उसको मानकर ही कोई स्त्री अपने पति को तलाक दे सकती है। पति द्वारा पत्नी को तलाक देने के मामले में अलबत्ता ऐसी कोई शर्त नहीं है। पत्नी की कोई शर्त माने बगैर ही पति उसे तलाक दे सकता है। यही नहीं, उसे पत्नी से तलाक देने का अिधकार हासिल करने की जरूरत भी नहीं है। यह विषमता नहीं, तो और क्या है?

दिलचस्प बात यह है कि पुरुष 18वें कॉलम को भरने की जरूरत महसूस नहीं करते। यानी कोई अपनी होने वाली दुल्हन को तलाक देने का अधिकार नहीं देता। इसका मतलब यह है कि अगर कोई स्त्री अपने पति को तलाक देना चाहती है, तो इस्लामी कानून में यह संभव नहीं है। वैसे में उसे अदालत की शरण में जाना होगा। लेकिन वहां भी तलाक देने के लिए उसे ठोस कारण बताने होंगे। पत्नी अगर किसी दूसरे पुरुष से प्यार करती है और उससे शादी करना चाहती है, तो इस आधार पर वह पति से तलाक नहीं ले सकती। लेकिन अगर पति किसी दूसरी महिला से प्यार करता है और उससे शादी करना चाहता है, तो इस आधार पर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है। निकाहनामे के 21 वें और 22 वें कॉलम में दूल्हे को बहुविवाह का अधिकार है। लेकिन दुल्हन को ऐसा कोई अधिकार नहीं है। विवाह कानून में इस तरह की विषमताएं क्यों बरकरार हैं, यह एक बड़ा प्रश्न है।

भारत में तत्काल तीन तलाक के खिलाफ कानून बन जाने के बाद बहुत सारे लोगों ने यह मान लिया है कि मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार मिल गया है। ऐसे ही, बांग्लादेश में उच्च न्यायालय के निर्देश पर मुस्लिम विवाह पंजीकरण फॉर्म से कुमारी शब्द हटाकर अविवाहिता कर देने से अनेक लोगों ने मान लिया है कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिल गया है। यह धारणा पूरी तरह गलत है। धर्म पर आधारित पारिवारिक कानून को पूरी तरह खत्म किए बिना महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिल ही नहीं सकता। इसका कारण यह है कि धर्म महिलाओं को समानाधिकार नहीं देता। इस तरह से देखें, तो निकाहनामे में एक बदलाव भी बहुत बड़ा बदलाव है, जिसके लिए अदालत का शुक्रिया अदा करना चाहिए।

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