फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Empower NOTA Make Parties Atone

उम्मीदवारों के प्रति मतदाताओं के असंतोष और असहमति को दर्शाता है नोटा

Wed, 17 Apr 2019 08:42 AM IST
shankar aiyyar शंकर अय्यर
Updated Wed, 17 Apr 2019 08:42 AM IST
विज्ञापन
Empower NOTA Make Parties Atone
NOTA

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 60.02 लाख मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था। यानी भाजपा को कुल जितने वोट मिले थे, उसका 3.49 फीसदी या कांग्रेस को कुल जितने वोट मिले थे, उसका 5.61 फीसदी। इनमें से 5.92 लाख से ज्यादा मतदाता उत्तर प्रदेश से थे। राष्ट्रीय चार्ट में जहां नीलगिरी 46,559 वोटों के साथ शीर्ष पर है, तो रॉबर्ट्सगंज 18,489 वोटों के साथ उत्तर प्रदेश के चार्ट में शीर्ष पर है।


loader

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 60.02 लाख मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था। यानी भाजपा को कुल जितने वोट मिले थे, उसका 3.49 फीसदी या कांग्रेस को कुल जितने वोट मिले थे, उसका 5.61 फीसदी। इनमें से 5.92 लाख से ज्यादा मतदाता उत्तर प्रदेश से थे। राष्ट्रीय चार्ट में जहां नीलगिरी 46,559 वोटों के साथ शीर्ष पर है, तो रॉबर्ट्सगंज 18,489 वोटों के साथ उत्तर प्रदेश के चार्ट में शीर्ष पर है।

2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 7.5 लाख से ज्यादा लोगों ने नोटा का बटन दबाया, जो बहुमत पाने वाली पार्टी भाजपा को मिले कुल वोट का 2.2 फीसदी है, बसपा के वोटों का 3.9 फीसदी, सपा के वोटों का चार फीसदी, कांग्रेस के वोटों का 13 फीसदी और निर्दलीय उम्मीदवारों को मिले वोटों का 33 फीसदी है। अगर नोटा कोई पार्टी होता, तो यह सातवें स्थान पर होता।

नोटा यानी उपर्युक्त उम्मीदवारों में से कोई नहीं की सुविधा भारतीय मतदाताओं को सितंबर, 2013 से उपलब्ध कराई गई है, ताकि वे चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के विकल्प के प्रति अपनी नाराजगी या असंतोष को व्यक्त कर सकें। नोटा का बढ़ता ज्वार राजनीति और उम्मीदवारों की गुणवत्ता के प्रति मतदाताओं के असंतोष और असहमति को दर्शाता है। 2018 में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में इसने अनुमानित रूप से 22 विधानसभा क्षेत्रों में जीत के अंतर को प्रभावित किया।

अब जबकि भारत अगली लोकसभा के लिए मतदान कर रहा है, तो यह पूछना लाजिमी है कि क्या मतदताओं की इस असहमति को राजनीतिक दलों की स्वीकृति या सुधारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। 2019 के लोकसभा चुनाव के उम्मीदवारों के नामांकन पर्चे की समीक्षा करें, तो वह दर्शाता है कि मतदाताओं की नाराजगी की काफी अनदेखी की गई है।

चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक पार्टियां विभिन्न कारकों को चुनती हैं-जाति से लेकर पंथ तक, लोकप्रियता से लेकर वंशावली तक और धन से लेकर बाहुबल तक। पूर्व में किए गए अपराध उनके लिए कोई मायने नहीं रखते। चाहे यह मुंबई हो, नीलगिरी, दाहोद, सिंघभूम या और कहीं, लगता है, नोटा अभी तक राजनीतिक दलों के चुनाव विश्लेषण में कोई कारक नहीं बन सका है।

एडीआर की रिपोर्ट में प्रत्याशियों को लेकर हुए गंभीर खुलासे

एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) का विश्लेषण बताता है कि पहले चरण के चुनाव में 91 लोकसभा सीटों के लिए 1,266 प्रत्याशी मैदान में हैं, जिनमें से 213 आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे हैं। उनमें से 146 के खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप हैं, 12 के खिलाफ दोष सिद्ध हो चुका है, दस पर हत्या के आरोप हैं, 25 पर हत्या की कोशिश के आरोप हैं, तो 16 पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले हैं।

प्रमुख दलों में से भाजपा के 83 में से 16, कांग्रेस के 83 में से 22, वाईएसआर कांग्रेस के 25 में से 10 ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले का खुलासा किया है। लोकसभा चुनावों के पहले चरण में उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ रहे 96 उम्मीदवारों में से 24 पर आपराधिक मामले हैं, जिनमें से 17 पर गंभीर अपराधों के मामले हैं। मेरठ के 11 प्रत्याशियों में से पांच के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं।

राजनीतिक प्रक्रियाओं में पवित्रता कभी पर्याप्त नहीं होती है-ऐसा पुल जो परिणाम के इरादे को आगे बढ़ाता है, वह अभी तक निर्मित नहीं हुआ है। यह सच है कि राजनीतिक दलों ने नोटा के प्रति बहुत कम सम्मान दिखाया है, लेकिन यह भी तथ्य है कि नोटा के वोटों ने अभी तक यथास्थिति को बाधित करने के लिए महत्वपूर्ण जन समर्थन हासिल नहीं किया है। इसका कुछ कारण नोटा के डिजाइन में निहित है।

वैचारिक रूप से नोटा के वर्तमान स्वरूप में उस अनिवार्य वजन का अभाव है, जो मतदाताओं को यह सोचने के लिए विवश करे कि यह प्रत्याशियों और राजनीति के घटिया स्तर के खिलाफ एक प्रभावी औजार है। नोटा नाराजगी दर्शाने का सबसे अच्छा उपाय है, लेकिन जहां तक परिणामों की बात है, तो चाहे मानें या न मानें, नोटा का बटन प्रभावी असर नहीं डाल सका है।

इसलिए नोटा को सशक्त बनाने की आवश्यकता है, ताकि मतदाता राजनीतिक दलों को प्रायश्चित करने के लिए मजबूर कर सके। नोटा के पीछे की भावना के स्वरूप और वितरण में सुधार के लिए ठोस संवाद और योजना की जरूरत है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग ने स्थानीय निकाय के चुनाव में पुनर्निर्वाचन पर विचार करने की बात कही है, अगर जीतने वाले उम्मीदवार को नोटा से कम वोट मिलता है। यदि चुनाव में जीत का अंतर नोटा के वोटों से कम हो, तो फिर से चुनाव कराना एक प्रभावी उपाय होगा।

यह है नोटा का उद्देश्य

नोटा के पुनर्गठन को प्रकट और चुनावी नतीजों से परे देखने की जरूरत है। नोटा का उद्देश्य राजनीतिक दलों को प्रत्याशियों और राजनीति में सुधार के लिए मजबूर न सही, राजी करना जरूर है। मसलन, चुनावों में आपराधिक मामलों से जुड़े लोगों को राजनीति में आने से रोकना जरूरी है। कम से कम संज्ञेय आपराधिक मामलों का सामना करने वाले उम्मीदवारों को नामांकन भरने से हतोत्साहित करने का एक उपाय यह है कि उम्मीदवार को मिले वोट का कुछ फीसदी नोटा में डाल दिया जाए।

मौजूदा चुनाव में राजनीतिक बयानबाजी की गुणवत्ता को लेकर भारी दुख और शोक है-स्पष्टतः दुर्व्यवहार से लेकर कट्टरता तक। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद बस इतना हुआ है कि निर्वाचन आयोग ने कुछ नेताओं पर थोड़े समय के लिए प्रचार कार्य पर पाबंदी लगा दी है। जब भी उम्मीदवार शालीनता की सीमा का उल्लंघन करते हैं, तो उस पर रोक के लिए हर बार उनको मिले वोटों को नोटा के खाते में क्यों नहीं डाला जाता। यदि क्रिकेट में दुर्व्यवहार के लिए एम एस धोनी पर जुर्माना लगाया जा सकता है, तो राजनेताओं पर क्यों नहीं! इसके अलावा और भी उपाय हैं और होंगे।

लेकिन इन उपायों को लागू करने के लिए कानून, नियमों का मसौदा तैयार करने और उनका निरीक्षण करने की जरूरत होगी। यह सब कठिन लग सकता है, लेकिन असंभव नहीं है। चंद्रशेखर द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में नियुक्त टी. एन शेषण के समय निर्वाचन आयोग कोई दूसरा ही संस्थान था, जिसे बुजदिली से मिटा दिया गया। शेषण ने राजनीतिक विकृति पर नकेल कसने के लिए कानून को उसकी भावना के साथ लागू किया था। सबसे बड़े लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया में नोटा का विचार आइटम गीत नहीं हो सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed