उभरती राजनीति और बंजर होते गांव
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गांवों के बदतर होते हालात के पीछे राजनीतिक प्रतिनिधित्व ही सबसे बड़ा कारण दिखाई देता है। आज अगर लोकतंत्र और विकास कहीं आपस में एक-दूसरे से जुड़ें, हो तो 67 सालों में इसकी झलक गांव में कहीं और कभी नहीं दिखाई दी। स्वतंत्रता के बाद इस लोकतंत्र ने जरूर कुछ भी किया होगा, पर गांवों का आज तक कुछ भी भला नहीं हुआ। इसका बड़ा कारण गांवों के प्रतिनिधियों की हमेशा चुनाव के बाद अपने चुनाव क्षेत्र की तरफ पीठ ही रहती है। उनकी मजबूरी ही उनको केंद्र की तरफ नजर बनाये रखने के लिए मजबूर करती है, जहां असली सत्ता का केंद्र है। इसका सीधा और सरल-सा कारण यह है कि देश के चुनाव हों, राज्यों के दो मुख्य राजनीतिक दल और चंद क्षेत्रीय दलों की ही भूमिका मुख्य रहती है। तीसरे विकल्प का अभाव तो रहता ही है। जिससे विकल्प की अपेक्षा की जाती है, उसे बड़ी पार्टियां गठबंधन के नाम पर लील लेती हैं। छोटे दलों के लिए अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए बड़े दलों की छत्रछाया तो अवश्य ही चाहिए पर दो बड़े राजनीतिक दलों की अकर्मण्यता और नाकारापन के कारण उपजे क्षेत्रीय दल फिर उन्हीं की भाषा और दिशा पर चलने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
बड़ा प्रश्न तो यह खड़ा होता है कि किसी भी विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवार का नाम तय करने का दायित्व स्थानीय लोगों का ही होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता। उत्तराखंड हो या झारखंड या फिर कोई और राज्य हो, चुनाव क्षेत्र विशेष के प्रतिनिधि का नाम दिल्ली से ही तय होता है, जहां बड़ी पार्टियों के अध्यक्ष या आलाकमान बैठते हों। इसलिए प्रतिनिधियों के लिए ज्यादा जरूरी यह हो जाता है कि उनकी पकड़ क्षेत्र में हो न हो, पार्टी में ज्यादा होनी चाहिए। इस व्यवस्था को सबने ऐसे स्वीकार कर लिया है कि प्रतिनिधियों और गांवों या समाज का कोई सीधा न तो रिश्ता रहा और न ही दायित्व! अमूमन सभी दलों के कार्यालय राजधानी के आसपास ही घूमते रहते हैं। उनकी सोच में विकास ज्यादा सुविधायें जुटाने व पैदा करने के ही चारों तरफ घूमता है। और इसलिए भी उनकी समझ गांवों व गरीबों की मूल समस्याओं से बहुत दूर रहती है। यही कारण है कि गांव विकास की मुख्य धारा से बहुत दूर ही रहे। सरकारों की प्राथमिकता ढांचागत विकास, आर्थिक जोड़तोड़ और नौकरी आदि तक ही सीमित रही। गांवों के उस हिस्से को नगण्य ही माना गया, जो देश की पूरी आर्थिकी का मेरूदंड है। मतलब खेती, पशुपालन आदि। अब केंद्र की वर्तमान सरकार को ही देखिए, यह आते ही स्मार्ट सिटी, डिजिटल इंडिया, बुलेट ट्रेन, मेक इन इंडिया पर केंद्रित हो गई और बाकी भारत की बात नदारद हो गई। आनन-फानन में सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ सुर मिलाते हुए स्मार्ट गांव की बात बिना हो हल्ले के जरूर छेड़ दी।
देश के बड़े हिस्से के पिछड़ेपन के पीछे कहीं न कहीं जनप्रतिनिधियों का बड़ा दोष है। उनका रुख ग्रामीण नहीं, शहरी है। वे ग्राम्य विकास को शहरी दृष्टि से ही देखते हैं, क्योंकि उनका राजनीतिक लालन-पालन ऐसे ही होता है। चुने जाने के बाद उनकी जवाबदेही गांवों व जनता के प्रति कम और पार्टी व इसके शीर्ष प्रमुखों पर बैठे लोगों के प्रति ज्यादा रहती है।
उत्तराखंड और झारखंड को देख लीजिए। राज्य बनने के बाद इनके जनप्रतिनिधियों के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन आया, पर गांवों का जीवन बदतर हुआ है। बड़ा प्रश्न यह है कि किस लोकतंत्र की दुहाई देकर हमारे राजनीतिक दल सत्ता में काबिज होना चाहते हैं।
-पर्यावरण विद अनिल प्रकाश जोशी ( इन दिनों गांव बचाओ यात्रा पर हैं)