फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Emergency: Memory of dark chapter, repression continued for 19 months

आपातकाल : एक काले अध्याय की स्मृति, 19 माह तक चला सिलसिला

Wed, 25 Jun 2025 07:14 AM IST
K C Tyagi केसी त्यागी
Updated Wed, 25 Jun 2025 07:14 AM IST
विज्ञापन
सार
झूठे मुकदमों में विपक्षियों को जेल में ठूंसा जा रहा था, मूल अधिकार खत्म हो चुके थे, जेलों में बंदियों की मृत्यु तक हुई और यह सिलसिला 19 महीने तक चला।
 
loader
Emergency: Memory of dark chapter, repression continued for 19 months
अमर उजाला के अंकों में आपातकाल - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

बारह जून, 1975 के दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पारिवारिक मित्र डीपी धर के निधन का दुखद समाचार उनके लिए भावनात्मक झटके जैसा था। प्रातः से ही गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आने शुरू हुए और मतगणना के प्रारंभिक दौर से ही ‘जनता मोर्चा’ ने कांग्रेस के उम्मीदवारों पर बढ़त बनानी शुरू कर दी। मोर्चे का गठन जेपी, मोरारजी भाई के संयुक्त प्रयासों का नतीजा था, जब चिमनभाई पटेल की भ्रष्ट सरकार के विरुद्ध छात्रों के आंदोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया।



बाद में मोरारजी भाई द्वारा विधानसभा भंग करने हेतु आमरण अनशन की घोषणा ने इंदिरा सरकार को विधानसभा भंग करने के लिए मजबूर कर दिया। चुनाव परिणाम में कांग्रेस पार्टी पराजित हुई और विपक्षी गठबंधन गांधीवादी नेता बाबू भाई पटेल के नेतृत्व में सरकार बनाने में सफल रहा। गुजरात के चुनावी नतीजों ने जहां एक ओर बिहार के छात्र-युवा आंदोलन को गति प्रदान की, वहीं दूसरी ओर समूचा विपक्ष सरकार के विरुद्ध एकजुट होने लगा। लेकिन सबसे अधिक चौंकाने वाला फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा सुनाया गया, जब उन्होंने समाजवादी नेता राजनारायण की एक याचिका पर अपना निर्णय दिया कि इंदिरा गांधी ने रायबरेली चुनाव (1971) में चुनाव जीतने के लिए भ्रष्ट तरीके अख्तियार किए और उनका चुनाव रद्द कर छह वर्ष के लिए अयोग्य घोषित किया।


इंदिरा गांधी के आवास के बाहर भीड़ जुटनी शुरू हो गई। यही वह दिन है, जब लोकतंत्र पटरी से उतरा हुआ दिखने लगा था। वफादार मंत्री, पार्टी पदाधिकारी अपने चहेतों के साथ आस्था प्रकट करने पहुंचे। व्याकुल भीड़ कभी-कभी जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा मुर्दाबाद के भी नारे लगाती नजर आ रही थी। इंदिरा गांधी के वकील बीएन खरे की इस दलील को स्वीकार कर लिया गया कि प्रधानमंत्री के तत्काल इस्तीफा देने से पूरे देश में प्रशासन अस्त-व्यस्त हो जाएगा और इसलिए जस्टिस सिन्हा ने फैसले पर 20 दिन तक रोक लगाने का निर्णय लिया।

इसी बीच संजय गांधी, आरके धवन और हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल, तीनों मिलकर भावी योजना के क्रियान्वयन में लग गए। इस मुहिम को कांग्रेस के अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने भी बल दिया, जब ‘इंदिरा इज इंडिया’ का भौंडा नारा लगाया। 13 जून को दिल्ली में उपस्थित विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति भवन के पास धरना देकर इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग कर डाली। कांग्रेस की 20 जून की रैली के समकक्ष 22 जून को रामलीला मैदान में भव्य रैली के आयोजन की घोषणा की गई। रैली की तैयारी चल रही थी कि जेपी की कोलकाता से दिल्ली आने वाली सभी फ्लाइट रद्द कर दी गईं। सभी दलों ने पुनः बैठक कर सभा के लिए 25 जून का दिन चुना।

इतिहास अपने आप को कैसे दोहराता है, इसकी एक बानगी उस दिन नारों से प्रफुल्लित हो रही थी, जेपी इसके नायक थे। युवा कवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा उनके सम्मान में तैयार कर गाया गीत इतिहास बन गया ‘जयप्रकाश है नाम समय की करवट का, अंगड़ाई का भूचाल, बवंडर के ख्वाबों से भरी हुई तरुणाई का।’ रामलीला मैदान के बाहर तक लंबी कतारें लगी थीं, मानो समूची दिल्ली जेपी के सिंहनाद को सुनने को बेचैन थी। मंच का संचालन जनसंघ के तेज-तर्रार नेता मदनलाल खुराना कर रहे थे। मुझे भी सत्यपाल मलिक के साथ-साथ मंच पर बैठने का सौभाग्य मिला, लोकदल प्रतिनिधि के रूप में हम आमंत्रित थे। दो दर्जन कांग्रेसी सांसद इस भोज में उपस्थित रहे, लेकिन इससे भी अधिक सांसदों ने अपना समर्थन इसके लिए दोहराया।

रैली में उपस्थित सभी विपक्षी नेताओं ने एक स्वर से इंदिरा गांधी के त्यागपत्र की मांग की और उन पर तानाशाही पूर्वक व्यवहार करने का आरोप लगाया। जेपी ने कहा, वह नैतिकता खोकर प्रधानमंत्री बनी हैं, लिहाजा सभी से आग्रह है कि अवैध आदेशों का पालन न करें। इसमें सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं, लेकिन कांग्रेस की संजय ब्रिगेड इसे सेना और पुलिस से जेपी की अपील को मुद्दा बनाकर प्रचारित करती रही।

सभा समाप्त होने के बाद ही आपातकाल घोषित करने के लिए राष्ट्रपति से अनुमति ली गई और सभी दलों के शीर्षस्थ नेताओं समेत लगभग एक लाख 75 हजार कार्यकर्ताओं पर झूठे मुकदमे लगाकर जेल में डाल दिया गया। सभी मूलभूत अधिकार समाप्त किए जा चुके थे। समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लगा दी गई। अदालत को भी गुप्त निर्देश दिए गए कि बंदियों की जमानत याचिकाओं को लटकाया जाए। उनकी परिवार वालों से मुलाकात भी न कराई जाए। मानसिक एवं शारीरिक यातनाएं भी दी जाने लगीं। कई जेलों से बंदियो के मृत्यु समाचार भी मिले। यह सिलसिला लगभग 19 महीने चला। आखिरकार विश्व जनमत के विरोध एवं बांग्लादेश में शेख मुजीब की हत्या की वजह से आपातकाल समाप्त करने की घोषणा कर चुनाव कराने का निर्णय लिया गया और चुनाव में इंदिरा गांधी को पराजित होना पड़ा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed