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अहंकार पतन का कारण बनता है

Fri, 24 May 2013 09:38 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Fri, 24 May 2013 09:38 PM IST
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ego causes collapse

श्वेतकेतु ऋषि आरुणि का पुत्र था। कुछ बड़ा होने पर आरुणि ने श्वेतकेतु से कहा, कुल की परंपरा के अनुरूप गुरुकुल में रहकर साधना और धर्मशास्त्रों का अध्ययन करना। गुरु की सेवा और सान्निध्य से ही तुम उपनिषदों और वेदों में पारंगत हो सकोगे।

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श्वेतकेतु पिता का आदेश मानकर गुरु की सेवा में लग गया। चौबीस वर्ष की आयु पूरी होने पर वह घर लौटा। उसे यह झूठा अभिमान हो गया कि वेदों का उससे बड़ा कोई दूसरा व्याख्याता नहीं है और शास्त्रार्थ में वह सभी को पराजित कर सकता है।
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वह अपने को पिता से भी बड़ा विद्वान मानने लगा। पुत्र के अभिमान को पिता सहज ही भांप गए। वह जान गए कि इसका अमर्यादित स्वभाव और अहंकार इसके पतन का कारण बनेगा।
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एक दिन पिता आरुणि ने एकांत पाकर पुत्र से धर्मशास्त्र व आत्मा संबंधी कुछ प्रश्न पूछे, लेकिन वह किसी का भी उपयुक्त उत्तर नहीं दे पाया। आरुणि ने कहा, पुत्र, तुम्हारे गुरु महान पंडित और साधक हैं।


लगता है, अहंकारग्रस्त होने के कारण तुम उनसे कुछ प्राप्त नहीं कर पाए। गुरु से कुछ पाने के लिए विनयशील होना आवश्यक है। अनजान और मासूम बनकर ही गुरु से कुछ सीखा जा सकता है। श्वेतकेतु का अहंकार चूर-चूर हो गया। आरुणि ने उसे शास्त्रों का दृष्टांत देकर अमरत्व का सार बताया।

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