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ई-रिक्शा के बहाने 'जुगाड़' की याद

Tue, 23 Sep 2014 07:15 PM IST
अरुण तिवारी
अरुण तिवारी Updated Tue, 23 Sep 2014 07:15 PM IST
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E-rickshaw recalls 'jugad'

दस दिन के भीतर ई-रिक्शा दिल्ली की सड़कों पर फिर से दौड़ने लगेंगे- परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की यह घोषणा संकेत है कि ई-रिक्शा चालकों और मालिकों की रोजी-रोटी का फिर से इंतजाम हो जाएगा। यह संकेत अच्छा है और अदालत का आदेश भी कि ई-रिक्शा सड़कों पर चलें, पर नियम-कायदों के साथ। किंतु वह संकेत अच्छा नहीं, जो ई-रिक्शा पर अस्थायी रोक का आदेश आने के बाद मीडिया में दिखा। आदेश आने के बाद कई दिनों तक एक नामी ऑटो कंपनी के तिपहिया का विज्ञापन अखबारों में हमने देखा। ऐसे में शक होना स्वाभाविक है कि क्या बिना नामी ब्रांड वाले वाहनों पर रोक-टोक नामी कंपनियों की साजिश का हिस्सा तो नहीं?

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जरूरतमंदों के लिए सस्ती तकनीक की आधिकारिक कोशिशें हमारे देश में इतनी नहीं कि गरीब-गुरबे की पकड़ में आ सकें; किंतु गैरमान्यताप्राप्त कोशिशों और नवाचारों में हिंदुस्तान बहुत आगे है। ऐसी जुगतों को हम 'जुगाड़' कहते हैं। ऐसी ही एक तकनीक से तैयार एक वाहन का नाम ही हमने 'जुगाड़' रख दिया है। सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले डीजल इंजन से तैयार किया गया है यह वाहन। जुगाड़ पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कितने ही इलाकों में सवारी, दूध, सब्जी, अनाज... खासकर किसानों के लिए अत्यंत किफायती साबित हुआ है। मगर कुछ वर्ष पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश ने इसे संकट में ला दिया। वर्ष 2012 में बिहार के भागलपुर में तो इसके विरोध में कई माह तक आंदोलन भी छिड़ा रहा। मुख्यमंत्री से की गई अपील में आंदोलनकारियों ने जुगाड़ को अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बताते हुए एक लाख परिवारों की आजीविका बचाने का निवेदन किया था। गौरतलब है कि सर्वोच्च अदालत ने जुगाड़ को मोटर वाहन कानून का उल्लंघन माना था।
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वे आंदोलनकारी भी वही कह रहे थे, जो दिल्ली के ई रिक्शाचालक कह रहे हैं। उनका कहना था कि जुगाड़ ठेला ऐक्ट बनाकर वाहन को परमिट तथा ड्राइवर को लाइसेंस प्रदान किया जाए। वे जुगाड़ ठेलों को कानून के दायरे में लाने को तैयार थे। ...तो फिर अड़चन कहां है? असल में, जुगाड़ रुकेगा, तो बड़ी-बड़ी कंपनियों के महंगे मालवाहक वाहनों की बिक्री बढ़ेगी। अगर यह सही है, तो यह पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर उठा गंभीर प्रश्न है।
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दिल्ली में फिटफिट मोटरों को हटाए जाने के साथ ही दिल्ली सरकार ने वाहन चालकों को जीप के लिए ऋण तथा परमिट मुहैया कराए थे। अब ई-रिक्शा पर रोक के बाद नई नीति! हालांकि दिल्ली की अदालत की राय वाजिब थी कि ई-रिक्शा को सड़क पर उतारने से पहले सरकार को इनके लिए नियम बनाने चाहिए थे। आगरा नगर निगम तो पिछले एक साल से ई-रिक्शा चालकों को लाइसेंस मुहैया करा रहा है।


खैर! अब जुगाड़ पर रोक से प्रभावित राज्यों के शासनाधीशों को भी चाहिए कि वे सरकार की ई-रिक्शा नीति से प्रेरणा लें। वाजिब शर्तों के साथ जुगाड़ वाहनों की मान्यता हेतु नीति व नियम बनाएं। देश में कितने ही नवाचार इसीलिए व्यापक उपयोग का हिस्सा नहीं बन पाते, क्योंकि वे कानूनी मान्यता के जटिल जाल से पार पाने से पहले ही सिमट जाते हैं। यदि कानूनी मान्यता के बिना हर नवाचार के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का चलन चालू हो गया, तो देश में नवाचारों का सिलसिला ही रुक जाएगा।

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