फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   drug patent conundrum

दवा पेटेंट का गोरखधंधा

Thu, 04 Apr 2013 11:11 PM IST
मधुरेंद्र सिन्हा
मधुरेंद्र सिन्हा Updated Thu, 04 Apr 2013 11:11 PM IST
विज्ञापन
drug patent conundrum

सर्वोच्च अदालत के एक फैसले ने दुनिया भर में हलचल ही नहीं मचा दी है, बल्कि अन्य देशों के लिए एक रास्ता भी खोला है। विशालकाय बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने पेटेंट के नाम पर सारी दुनिया के दवा उद्योग पर प्रभुत्व जमा रखा है। वे पेटेंट के सहारे प्रतिद्वंद्वियों को दबाकर रखती हैं, जिसका नतीजा है कि इनकी दवाएं बेहद महंगी हैं। मगर स्विट्जरलैंड की कंपनी नोवार्टिस की कैंसर रोधी दवा ग्लिवेक के पेटेंट को नकार कर सुप्रीम कोर्ट ने एक नई राह दिखा दी है।

विज्ञापन


दरअसल दवा बनाने वाली ज्यादातर बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनियां पुरानी दवाओं में ही थोड़ा बदलाव करके अपने देश में उनका पेटेंट करवाती रहती हैं, ताकि उनका कोई प्रतिद्वंद्वी पैदा न हो सके। सच यह है कि पिछले कई सालों से दवाओं की दुनिया में बहुत कम ही आविष्कार हुए हैं।
विज्ञापन


बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां एक बार किसी दवा की खोज करने के बाद वर्षों उससे मोटी कमाई करती रहती हैं। आर ऐंड डी यानी शोध और विकास पर खर्च के नाम पर वे वर्षों तक मनचाहे पैसे कमाती रहती हैं। डब्लूटीओ के बौद्धिक संपदा अधिकार के तहत पेटेंट की गई दवा की 20 वर्ष तक कॉपी नहीं हो सकती, जिससे कोई भी कंपनी 20 वर्ष तक सारी दुनिया पर राज करने का हक पा लेती है।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह अवधि पूरी होने से पहले ये कंपनियां उसी दवा में थोड़ा बदलाव करके उसका दोबारा पेटेंट करवा लेती हैं, जैसा ग्लिवेक के मामले में हुआ था। अभी भारत की अदालतों में ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन पीएलसी, रोश होल्डिंग्स एजी और फाइजर के पेटेंट संबंधी मामले लंबित हैं और इन कंपनियों को भय सता रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का कहीं उनके मामले में असर न पड़े।

इन कंपनियों को उनके देशों खासकर अमेरिका की सरकार का जबर्दस्त समर्थन रहा है। अपने देश के प्रशासन पर उनकी ऐसी पकड़ रही है कि वे दूसरे देशों की कंपनियों को पेटेंट के नाम पर फंसा देती हैं, जैसा कि भारतीय दवा कंपनी रैनबैक्सी के मामले में हमने देखा था। उसकी दवाओं को अमेरिका में बिकने से रोकने के लिए वहां की बड़ी दवा कंपनियों ने तमाम हथकंडे अपनाए।

लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं, महंगी दवाओं के दाम से परेशान लोगों ने लगभग हर देश में अपनी आवाज उठानी शुरू कर दी है। इसी का नतीजा है कि इसी महीने अमेरिकी अदालत में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ऐस्ट्राजीनीका पेटेंट से जुड़ा एक मुकदमा हार बैठी है। बच्चों के अस्थमा रोग के इलाज के लिए पेटेंट की गई उसकी दवा से पेटेंट छीन लिया गया है।

इस दवा की सालाना बिक्री 1.20 अरब डॉलर की है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस कंपनी ने पेटेंट से कितना पैसा बनाया होगा। ऐसी कई कंपनियां हैं, जो पेटेंट के बूते ही अरबों डॉलर का कारोबार कर रही हैं। यह सही है कि एक दवा के शोध व विकास पर अरबों डॉलर खर्च होते हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि दुनिया की विशाल आबादी को देखते हुए यह रकम महज साल दो साल में निकल आती है।

मगर अब इस ऐतिहासिक निर्णय से दुनिया में बदलाव की आंधी आने के संकेत मिलने लगे हैं। तीसरी दुनिया के देश तो पहले से ही इसके खिलाफ खड़े हैं, लेकिन वे कुछ कर नहीं पा रहे थे। अब ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में भी ऐसे एकतरफा पेटेंट के खिलाफ मीडिया में काफी कुछ छपने लगा है, जबकि वह अमेरिका के मित्र राष्ट्रों में है।

वहां की मीडिया का मानना है कि पेटेंट की अवधि बढ़ाते जाने से वहां के देसी दवा उद्योग को 200 करोड़ डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा। इसके अलावा कम आय वाली जनता को भी महंगी दवाइयां खरीदने को बाध्य होना पड़ा। अब वहां इस मुद्दे पर बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के खिलाफ लोग लामबंद होने लगे हैं। इसी तरह इंग्लैंड की जनता दवाइयों के महंगे होने का रोना रोती हैं और वहां भी इसके खिलाफ आवाज उठने लगी है।

अब यह संभावना बनने लगी है कि अन्य देश भी अपने यहां के कानूनों का सहारा लेकर दवा कंपनियों के पेटेंट को चुनौती दे सकते हैं। इस बारे में भारत के कानूनों के आधार पर कई देशों में नए कानून भी बन सकते हैं। विकासशील देशों के सामने बीमारियों के इलाज के लिए दवाओं की कमी बड़ी परेशानी है, जिसकी वजह से हर साल लाखों लोगों की जानें जाती हैं। आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था में यह शासकों के लिए चिंता का विषय है और वे इनसे निपटने के तरीके के तौर पर भारतीय मॉडल का सहारा ले सकते हैं।

उनके लिए भारत के सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मार्गदर्शक बन सकता है। अर्जेंटीना और फिलीपींस ने तो भारत की ही तरह कानून बना लिए हैं, जबकि ब्राजील, थाईलैंड जैसे देश कई खास दवाओं के पेटेंट के प्रति गंभीर भी नहीं हैं और उन्हें नहीं मानते। अफ्रीका के देश, जहां स्थानीय दवा उत्पादक कंपनियां हैं ही नहीं, ऐसी महंगी दवाओं को खरीदने के लिए अभिशप्त रहे हैं। अब उनके लिए आशा की एक किरण झलकी है, क्योंकि अब भारत या चीन जैसे देशों से ऐसी ही दवाएं काफी कम कीमतों पर मिलने लगेंगी।


सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से आहत बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां धमकी पर उतर आई हैं और कह रही हैं कि वे यहां आर ऐंड डी पर खर्च बंद कर देंगी। कुछ का कहना है कि वे भारत में ऐसी दवाएं बेचना बंद कर सकती हैं, पर यह सब कोरी धमकियां ही हैं। दुनिया में सबसे सस्ती दवाएं भारत में ही मिलती हैं और उसके बावजूद हमारा दवा बाजार 2020 तक 71 अरब डॉलर का होगा और कोई भी कंपनी इस बाजार की उपेक्षा करने का दुस्साहस नहीं कर सकती। भला इतनी बड़ी आबादी वाला बड़ा और खुला बाजार उन्हें कहीं और मिल सकता है!

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed