जातिविहीन समाज का सपना
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डॉ भीमराव अंबेडकर का मूल दर्शन देखें, तो वह भारत में जातिविहीन समाज की स्थापना करना चाहते थे। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के पीछे दलित-पिछड़े की सामाजिक, राजनीतिक एवं शैक्षणिक परिस्थिति ही नहीं, बल्कि भारत का लगभग दो हजार वर्ष पुराना इतिहास रहा है। अंबेडकर का अध्ययन करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यदि भारत बार-बार पराजय का सामना करता रहा, तो उसके पीछे समाज का जातियों में बंट जाना रहा है। देश की रक्षा की जिम्मेदारी एक विशेष जाति को दी गई और जैसे शेष से कोई मतलब ही न हो। कभी-कभी यही शेष जातियां हमलावरों का साथ दे देती थीं, क्योंकि बंधुत्व का अभाव था।
कोई भी राजनीतिक दल स्वीकार नहीं करेगा कि वह जाति से ऊपर नहीं उठा है। सुविधानुसार जाति का प्रयोग सभी करते हैं, फर्क है, तो तरीके में। यह भी इतनी आपत्तिजनक नहीं है, जितना कि डॉ अंबेडकर के मूल दर्शन को आधार मानकर और फिर जात-पात करना। जब चुनाव के समय उम्मीदवारों से प्रतिवेदन मंगाए जाते हैं, तब की स्थिति को अगर जान लिया जाए, तो समझ में बात आएगी कि चुनाव लड़ने वाले की जाति ही प्रमुख होती है। यदि उनके बायोडाटा को पढ़ लिया जाए, तो उनमें जाति समीकरण को पक्ष में ही समझाने का प्रयास किया जाता है। नेता भी साक्षात्कार के समय जाति को केंद्र मान करके उम्मीदवारी का मूल्यांकन करते हैं। देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती कि कब हम इस दैत्य के प्रभाव को कम कर सकेंगे। जब तक ऐसा नहीं होता, हम चीन, कोरिया जैसे विकसित देशों की कतार में खड़े नहीं हो सकते।
अंबेडकर की विचारधारा पर काम करने वाले अनगिनत सामाजिक संगठन हैं, जो जाति का निषेध करते तो हैं, पर चेतन एवं अचेतन अवस्था में जातिगत संकीर्णता से मुक्त नहीं हो पाए हैं। राजनीतिक दल नाम मात्र के हैं और बड़े अस्तित्व वाली कोई पार्टी है, तो वह है बहुजन समाज पार्टी। बहुजन-हिताय, बहुजन-सुखाय, भगवान गौतम बुद्ध के इस मूल मंत्र को बाबा साहब डॉ.अंबेडकर ने अपनाया। यह समता का द्योतक है। इसी को आधार मानते हुए बसपा का निर्माण हुआ। सभी दलित-पिछड़ी जातियों को जोड़ने का यही आधार बनाया। प्रशिक्षण शिविरों, सभा और सम्मेलनों में कहा जाने लगा कि अब बहुजनों को इकठ्ठा होकर अपनी हुकूमत लेनी है। जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागेदारी के नारे ने बहुत आकर्षित किया। दुश्मन को दिखाकर एकजुट करने की भी रणनीति बनी। जैसे सवर्णों के प्रति तीखे बोल। शुरू में न केवल दलित जातियां, बल्कि पिछड़ी जातियां भी तेजी से जुड़ीं। धीरे-धीरे कारवां बनता गया और लोग जुड़ते गए।
सत्ता में आते ही वही सारे अवगुण और दोष आने लगे, जो और जगहों पर होते हैं। एक विशेष जाति, जिससे सुश्री मायावती स्वयं हैं, ने पूरे संगठन पर कब्जा कर लिया। सर्वजन चेहरा बनाए रखने के लिए प्रतीकात्मक रूप से कुछ ब्राह्मणों और अल्पसंख्यकों को रखा गया। इसी प्रक्रिया में अति पिछड़ी और गैर जाटव-दलित बिछड़ते चले गए। ऊपर से जो फरमान आए उसी पर चलते रहना। इसी का प्रतिकूल असर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के ताजा चुनावों में देखने को मिला। जातिविहीन समाज की स्थापना असंभव है। भले ही इस लक्ष्य की प्राप्ति में सैकड़ों और हजारों साल लग जाएं, पर कम से कम जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी तो हो। बसपा को एक मौका मिला था कि वह अगर जाति नहीं तोड़ सकती थी, तो जातियों की भागीदारी तो दे ही सकती थी, लेकिन हुआ उल्टा कि उन्हें बाहर का दरवाजा दिखाया जाने लगा।