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सुस्त होती रफ्तार और बेजार बाजार
जयंतीलाल भंडारी
Updated Wed, 11 Jan 2017 07:38 PM IST
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जयंतीलाल भंडारी
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हाल ही में छह जनवरी को भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2016-17 में देश की विकास दर को लेकर जो अनुमानित आंकड़े जारी किए हैं, उसके मुताबिक मौजूदा वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) की दर 7.1 फीसदी रहने का अनुमान है। वर्ष 2015-16 में यह दर 7.6 फीसदी थी। इस हिसाब से विकास दर में आधा फीसदी गिरावट की आशंका है। यह गिरावट कृषि को छोड़कर अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में आशंकित है।
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आर्थिक विकास दर का यह अनुमान चालू वित्त वर्ष के पहले सात महीनों के औद्योगिक उत्पादन के आधार पर लगाया गया है। यानी नोटबंदी का असर इसमें शामिल नहीं है। इसका मतलब है कि यदि इसमें नवंबर और दिसंबर के आंकड़े जोड़े जाएं, तो विकास दर में अनुमान से कहीं ज्यादा गिरावट देखी जा सकती है। रिजर्व बैंक ने भी वर्ष 2016-17 में देश के जीडीपी की वृद्धि दर के अनुमान को 7.6 फीसदी से घटाकर 7.1 फीसदी कर दिया है। रेटिंग एजेंसी फिच ने नोटबंदी के मद्देनजर मौजूदा वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का नया अनुमान व्यक्त किया है, जबकि नोटबंदी के पहले उसने 7.4 प्रतिशत का अनुमान व्यक्त किया था।
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निश्चित रूप से नोटबंदी के चलते नवंबर, 2016 के बाद अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों की वृद्धि रफ्तार धीमी पड़ गई। असंगठित क्षेत्र और ग्रामीण इलाके नोटबंदी से अधिक प्रभावित हैं। लोगों की क्रयशक्ति घट गई है और निजी उपभोग प्रभावित हुआ है। सामान्यत: प्रति वर्ष अक्तूबर के बाद औद्योगिक गतिविधियों में तेजी आती है, जबकि इस बार नोटबंदी के कारण आर्थिक गतिविधियां घटी हैं। नई परियोजनाओं का एलान भी अक्तूबर से दिसंबर के बीच पिछली तीन तिमाहियों की तुलना में सबसे अधिक सुस्त रहा है। निवेश और मांग की कमी के कारण उद्योग-कारोबार की रफ्तार नहीं बढ़ने से नौकरियां घटने की चिंताएं दिखाई दे रही हैं। यही नहीं, वर्ष 2017 में वैश्विक आर्थिक मंदी से भारत भी प्रभावित हो सकता है। वहीं पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक द्वारा प्रतिदिन 12 लाख बैरल कच्चा तेल उत्पादन में कमी करने के निर्णय से अपनी जरूरत का 80 फीसदी तेल आयात करने वाले भारत में भी तेल की कीमतें बढ़ेगी। देश का औद्योगिक ही नहीं, निर्यात परिदृश्य भी निराशाजनक है और प्रोत्साहनदायक प्रावधानों की कमी से औद्योगिक और निर्यात वृद्धि की संभावनाओं पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
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उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने कैशलेस ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देने के लिए डिजिटल पेमेंट पर पेट्रोल-डीजल, रेल टिकट, सर्विस टैक्स और बीमा प्रीमियम पर जो रियायतें घोषित की हैं, उससे लोगों की कुछ क्रयशक्ति बढ़ेगी। लेकिन बड़ी संख्या में लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए सरकारी परियोजनाओं के तहत रोजगार, उद्योग और कारोबार के लिए प्रोत्साहन के कदमों की जरूरत है। ऐसा एक मौका हमारे हाथों से निकाल गया है। रिजर्व बैंक से ब्याज दरों में कटौती की अपेक्षा की जा रही थी। उद्योग-कारोबार से जुड़े करोड़ों लोगों की निगाहें रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक पर लगी थी, लेकिन ब्याज दरों में बदलाव नहीं किया गया। रिजर्व बैंक ने कहा कि वह विकास दर में गिरावट के बजाय महंगाई के जोखिम को लेकर ज्यादा चिंतित है। अब नए वर्ष में सरकार को एक ओर घरेलू मांग के निर्माण के लिए उद्योग-कारोबार को प्रोत्साहन देना होगा, तो दूसरी ओर अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए सरकारी निवेश में वृद्धि करनी होगी।