फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   do not neglect our power

हमारी ताकत की अनदेखी न करें

Fri, 05 Apr 2013 11:51 PM IST
अरुण नेहरू
अरुण नेहरू Updated Fri, 05 Apr 2013 11:51 PM IST
विज्ञापन
do not neglect our power

यह न केवल आम आदमी के लिए, बल्कि सभी आय वर्ग के लोगों के लिए एक अच्छी खबर है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कैंसर की जीवन रक्षक दवा ग्लिवेक पर पेटेंट का दावा करने वाली नोवार्टिस की याचिका खारिज कर दी।

विज्ञापन


यदि नोवार्टिस को पेटेंट का अधिकार मिल जाता, तो रक्त कैंसर की इस दवा की कीमत 1.20 लाख रुपये मासिक होती, जबकि सिपला द्वारा निर्मित इस दवा के स्थानीय संस्करण की कीमत मासिक आठ हजार रुपये पड़ती है। हमारे देश से पूरी दुनिया में दवाएं निर्यात की जाती हैं। ये सस्ती दवाएं कई विकासशील देशों एवं तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों में जाती हैं और हजारों लोगों की जान बचाती हैं।
विज्ञापन


बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के लिए लॉबिंग करने वाली संस्थाएं प्रचलित तर्कों के सहारे निश्चित रूप से इस फैसले को चुनौती देंगी और नई दवाओं के शोध पर किए जाने वाले निवेश को खत्म करने की धमकी भी देंगी। अगर वे ऐसा करते हैं, तो उनका स्वागत है, क्योंकि उनकी महंगी दवाओं को भला कौन खरीद पाएगा? अमेरिका की सबसे बड़ी समस्या चिकित्सा पर होने वाला खर्च है और यह उसके आर्थिक संकट का भी दूसरा सबसे बड़ा कारण है।
विज्ञापन
विज्ञापन


गौरतलब है कि अमेरिका अपने नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा के नाम पर मुफ्त चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराता है। मुझे याद है, राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने पहले भाषण में ही इस चिकित्सा-सेवा खर्च पर अंकुश लगाने की बात की थी, लेकिन इस दिशा में ज्यादा कुछ नहीं हो पाया, क्योंकि लॉबिस्ट एवं ताकतवर निहित स्वार्थी तत्वों ने आर्थिक सुधार के कदमों को रोक दिया। अमेरिका स्वास्थ्य सेवा पर दो खरब डॉलर से ज्यादा खर्च करता है, जो हमारे सकल घरेलू उत्पाद से भी ज्यादा है! गड़बड़ियों और झूठे दावों के कारण इस धनराशि में से करीब 600 अरब डॉलर की सेंध लग जाती है।

जहां तक आधुनिक चिकित्सा का मामला है, तो इस क्षेत्र में अब ऐसी कोई सुविधा नहीं, जो हमारे देश में उपलब्ध न हो। भारतीय दवा कंपनियां ने यूरोप समेत कई देशों में विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण किया है और खासकर आर्थिक मंदी के इन दिनों में सस्ती भारतीय दवाओं का विदेशी बाजारों में पहुंचने का खास अर्थ है। जबकि भारत की तुलना में विकसित देशों में सामान्य दवाओं की कीमतों में भी भारी अंतर देखा जाता है। मेरी बेटी ने अमेरिका में एक खास क्रीम 200 डॉलर में खरीदी, जिसकी कीमत 11,000 रुपये बैठती है, पर भारत में वही दवा 140 रुपये में उपलब्ध है!

वास्तविक पेटेंट एवं आविष्कार से इन सबका कोई लेना-देना नहीं है। हमें सुप्रीम कोर्ट, स्वयंसेवी संगठनों की दृढ़ता एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का शुक्रगुजार होना चाहिए, जिन्होंने हमें यह राहत प्रदान की है।

यह दुखद है कि कुछ विकसित देश जमीनी वास्तविकताओं को अब भी देखना नहीं चाहते और विकासशील देशों के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो वे उनकी औपनिवेशिक जागीरें हों। बड़े देश छोटे देशों पर अक्सर दबाव डालते हैं। हमने भी ऐसे दबाव झेले हैं और मजबूती के साथ उसका मुकाबला किया है।

दुखद है कि आज भी दुनिया में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत बरकरार है। भारतीय मछुआरों की हत्या के आरोपी इतालवी नौसैनिकों वाला मामला हमने देखा ही है, जब इटली के पक्ष में यूरोपीय संघ भी खड़ा हो गया था, लेकिन सरकार एवं सुप्रीम कोर्ट दोनों ने सख्ती दिखाई, तो उन दोनों आरोपियों को भारत लौटना पड़ा।

कोलकाता में आईपीएल सीजन की धमाकेदार शुरुआत हुई और पिछले वर्ष की शानदार सफलता से इसकी तुलना की गई, लेकिन पुलिस हिरासत में एक छात्र नेता की दुखद मौत से माहौल बिगड़ गया। पुलिस हालांकि दावा कर रही है कि उसकी मौत लैंपपोस्ट से टकराने के कारण हुई।

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा कोई नई बात नहीं है, लेकिन वक्त बदल गया है। ज्यादा दिनों तक ऐसी हिंसा स्वीकार्य नहीं होगी और इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी। उधर मध्य प्रदेश के खनन क्षेत्र में एक ईमानदार अधिकारी, जिसे जान का खतरा था, सड़क दुर्घटना में मारा गया। उसकी बिलखती पत्नी और पुत्र न्याय की मांग कर रहे हैं। क्या मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री इस मुद्दे को रोजमर्रा की घटना की तरह लेंगे?

हम किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं करते, पर हमें आगे बढ़ना होगा। एक अकेली घटना भी हमारे व्यवहार में बदलाव ला सकती है। देखिए कि एसएफआई के नेता सुदीप्तो गुप्त की मौत पर पश्चिम बंगाल में कैसी प्रतिक्रिया हुई। पिछले कुछ समय से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री संकटों में घिरी हैं और इस घटना से उनकी छवि को नुकसान होगा। माहौल में बदलाव और हिंसा की बयार बह रही है।

कर्नाटक में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। जाहिर है, हमारे सामने कई चुनावी भविष्यवाणियां होंगी, पर जैसा कि मैंने पिछले हफ्ते आकलन किया था, 224 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में कांग्रेस बहुमत से जीतेगी। आम भावना के आधार पर मेरा मानना है कि कांग्रेस 110 से 120 सीटें, जद (एस) 30 से 40 सीटें और सत्तारूढ़ भाजपा अगर बहुत भाग्यशाली हुई, तो 50 से ज्यादा सीटें जीतेंगी।


भाजपा ने राज्य में अराजकता की स्थिति बना दी है। मुझे नहीं लगता कि पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे। इस समय सभी दलों, खासकर कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती सही उम्मीदवारों का चयन है। जब रुझान आपके पक्ष में हों, तो यह कभी आसान नहीं होता।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed