नदियों को मरीज मत बनाइए
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पर टिहरी से चले पानी के जनवरी के पहले हफ्ते में इलाहाबाद पहुंचने पर लोगों की आंखों में जो चमक आई थी, वह इतनी क्षणिक साबित हुई कि उस पर अविश्वास होने लगा। बताया गया कि पांच जनवरी को फाफामऊ में गंगा का औसत जल स्तर समुद्रतल से 76.48 मीटर ऊपर था, पर अगले छह दिनों में ही यह करीब पांच मीटर नीचे आ गया। बहरहाल, कुछ लोग बता रहे हैं कि मकर संक्रांति के पहले स्नान के समय संगम पर घुटने भर ही पानी था।
इलाहाबाद के महाकुंभ के राजनीतिक निहितार्थ को समझ कर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने विगत नवंबर में पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी का नाम लेकर बड़े जोर-शोर से क्षिप्रा-नर्मदा सिंहस्थ जोड़ परियोजना का शिलान्यास किया। उस अवसर पर दिए गए भाषणों में विकास की दौड़ में पिछड़ रहे मालवा क्षेत्र के लिए नर्मदा सहित अन्य नदियों का पानी उपलब्ध करा कर लोगों की प्यास बुझाने के साथ-साथ खेती-बाड़ी और उद्योगों को मजबूत बनाने के लुभावने सपने दिखाए गए। पर इस परियोजना के राजनीतिक संदेश को समझा जाना चाहिए। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि उज्जैन में 2016 में सिंहस्थ कुंभ होने वाला है और वहां के कुंभ क्षेत्र में क्षिप्रा नदी का अस्तित्व लगभग खत्म हो चुका है।
ऐसे आधे-अधूरे मन से किए गए प्रयासों से नदियों को कुछ साल तो जिंदा रखा जा सकता है, पर लाखों-करोड़ों लोगों के उस भरोसे का क्या होगा, जो सदियों से जीवित जलस्रोतों के साथ अविच्छिन्न ढंग से जुड़ा हुआ है? क्या इन गहरे बदलावों को सिर्फ प्राकृतिक करवट मानकर हम निरुपाय होकर देखते रहेंगे? क्या हमारे सामने अनुकरणीय साक्ष्य नहीं हैं, जिनमें शुद्ध भगीरथ प्रयासों के सामने कुदरत के बदलने की योजनाओं को मुल्तवी कर देने के संदेश निहित हों?
बहुत दूर क्यों जाएं, देश की तकदीर बदल डालने के दावों के साथ तमाम विशालकाय योजनाएं बनाने वाली सरकार की कुर्सी से पंजाब का वह छोटा-सा इलाका बहुत दूर (स्थान और काल, दोनों दृष्टियों से) नहीं है, जहां एक मामूली से धार्मिक अनुष्ठान करने वाले कार्यकर्ता बलबीर सिंह सीचेवाल ने औद्योगिक कचरे और कूड़ा-करकट से गंदा नाला बन जाने वाली एक ऐतिहासिक नदी को पुनर्जीवित करने जैसा चमत्कार सिर्फ आम लोगों के सच्चे सरोकार के बल पर कर दिखाया। देश के प्रशासनिक अमले ने उनकी इस कोशिश को चाहे महत्व न दिया हो, पर टाइम पत्रिका ने उन्हें दुनिया भर के पच्चीस पर्यावरण योद्धाओं में शामिल जरूर किया।
दक्षिण से भी अभी-अभी एक ऐसी ही उत्साहित करने वाली खबर आई है। तमिलनाडु के तिरुपुर औद्योगिक नगर (टेक्सटाइल के लिए मशहूर) के कारखानों से कपड़ों की रंगाई से निकलने वाला विषाक्त रासायनिक कचरा पास से बहने वाली भवानी और नोयल नदियों को लगभग लील ही चुका था कि स्थानीय शिक्षण संस्थानों ने इस्राइल के एक प्रोफेसर के सहयोग से इनको साफ-सुथरा करने की उम्मीदें जगा दी हैं।
प्रो. योरम ओरेन अपने देश में नैनो फिल्ट्रेशन तकनीक की मदद से अनेक जलस्रोतों में मिलने वाला विषाक्त पानी छानकर उपयोगी बनाने का काम सफलतापूर्वक कर चुके हैं, और यहां भी वे उसी तकनीक से अनहोनी करने के कगार पर हैं। इस तकनीक में वह कुछ विशेष छन्नों की मदद से गंदा पानी छानकर ठोस पदार्थ अलग कर देते हैं और छना हुआ पानी नदी में दोबारा डाल देते हैं, जो सामान्य पानी जैसा ही हानिरहित बन जाता है। ऐसा नहीं है कि इतने बड़े देश में यही दो उदाहरण होंगे। ऐसे अन्य सभी प्रयासों का हमें पूरी निष्ठा के साथ स्वागत और अनुसरण करना चाहिए। समाज को बचाना है, तो पानी तो बचाकर रखना ही होगा।