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पड़ोस: हिंदू व सिखों के पलायन और मुस्लिम शरणार्थियों के आने से विविधता खत्म.. कितना बदला निर्वासित शहर लाहौर?

Sun, 09 Feb 2025 05:10 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 09 Feb 2025 05:10 AM IST
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सार
1947 से पहले के लाहौर की विविधता हिंदू और सिखों के पलायन और पंजाब (भारत) के हिस्सों से मुस्लिम शरणार्थियों के आने के साथ खत्म हो गई। विघटन के उस क्षण के बाद यह अपने ही अतीत से एक निर्वासित शहर बन गया।
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Diversity ends post exodus of Hindu Sikh and Muslim refugees arrival in exiled city Lahore How much change
पाकिस्तान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कई साल पहले जब मैं खेल के सामाजिक इतिहास पर काम कर रहा था, तब मुझे 1955 में लाहौर में खेले गए एक टेस्ट मैच की कुछ समाचार रिपोर्टें मिलीं। यह मैच अत्यधिक उबाऊ था, जो भारत-पाकिस्तान के बीच खेले गए पांच मैचों की शृंखला के पांच ड्रॉ में से एक था। इसमें प्रति ओवर दो से भी कम रन बने थे। इस मैच को लेकर जो बात अधिक दिलचस्प थी, वह सामाजिक संदर्भ थी। 1947 के बाद यह पहला मौका था, जब लाहौर शहर को अपने बहुसांस्कृतिक अतीत को दोबारा प्राप्त करने की अनुमति दी गई थी। इस टेस्ट के लिए कम से कम दस हजार टिकट भारतीय नागरिकों के लिए अलग रखे गए थे, जो मैच देखने हर सुबह वाघा बॉर्डर पार करके आते थे और उसी रात अमृतसर लौट जाते थे। एक प्रत्यक्षदर्शी ने इसे ‘विभाजन के बाद सीमा पार से सबसे बड़ा सामूहिक प्रवासन’ कहा था।



टेस्ट मैच 29 जनवरी, 1955 को शुरू हुआ। अगले दिन डॉन अखबार में छपा कि जैसे ही स्टेडियम का दरवाजा खुला, औरतें, सिख, हिंदू और स्थानीय लोग दो से तीन फर्लांग या इससे भी अधिक लंबी कतारों में धैर्य और शालीनता से अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। ऐसा लग रहा था, मानो पूरा शहर अवकाश के मूड में था। सुबह-सुबह भीड़ की ऐसी हलचल शालीमार मेले की याद दिला रही थी, बस अंतर इतना था कि यहां भीड़ का आकार बड़ा था। रिपोर्ट में आगे कहा गया कि इस भीड़ में ‘सिख विशिष्ट थे और वे जहां भी गए, आकर्षण का केंद्र बने। हर जगह उनका शानदार स्वागत किया गया। उनमें से कुछ तो पुराने मित्रों से गले मिलकर रो पड़े।’ डॉन अखबार ने जो खबर छापी थी, वह गुमनाम थी, लेकिन उसके लेखक की भावनाओं को विभाजन के दर्द से दूर रहे मद्रास के एक हिंदू पत्रकार ने यह कहते हुए दोहराया कि ‘टेस्ट मैच के दिनों में हर जगह पाकिस्तानियों और भारतीयों के बीच अद्भुत भाईचारा देखा गया।’


मुझे मनन अहमद आसिफ की किताब ‘डिसरप्टेड सिटी : वॉकिंग द पाथवेज ऑफ मेमोरी एंड हिस्ट्री ऑफ लाहौर’ को पढ़ते हुए उन खबरों की याद आ गई। लेखक लाहौर में ही बड़े हुए थे, लेकिन 30 साल पहले उन्होंने यह शहर विदेश में पढ़ाई करने और वहीं काम करने के कारण छोड़ दिया था। हालांकि वह अक्सर अपने घर आते थे। उनकी इस पुस्तक का उद्देश्य ‘बिना उस राष्ट्र-राज्य का बंधक बने इस शहर के विरासती इतिहास को बताना है।’

आसिफ अपनी कहानी की शुरुआत में कहते हैं, ‘1947 से पहले के लाहौर की विविधता हिंदू और सिखों के पलायन और पंजाब (भारत) के हिस्सों से मुस्लिम शरणार्थियों के आने के साथ खत्म हो गई।’ वह आगे कहते हैं, ‘विघटन के उस क्षण के बाद यह अपने ही अतीत से एक निर्वासित शहर बन गया।’ आसिफ की किताब में क्रिकेट का जिक्र तो कुछ ही समय के लिए है और 1955 के लाहौर टेस्ट का तो बिल्कुल भी नहीं। फिर भी उनकी पुस्तक उन चार दिनों के शालीमार मेले की याद दिलाती है, जिसे चिरागान मेला के नाम से भी जाना जाता है। यह एक समय लाहौर का प्रमुख त्योहार था, जो 16वीं सदी के सूफी संत शाह हुसैन के जीवन और विरासत के उपलक्ष्य में मनाया जाता था। आसिफ अपनी किताब में लिखते हैं कि शाह हुसैन के विचार में ‘उन लोगों की निंदा की जानी चाहिए, जो रूढ़िवादिता के समर्थक है, शराब और नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं, खुशी से नाचते-गाते हैं और अक्सर निर्वस्त्र रहते हैं।’ शाह हुसैन के सबसे करीबी साथी या प्रेमी एक हिंदू थे और जिस मंदिर में दोनों को दफनाया गया, वह जगह ‘हिंदू, मुस्लिम और सिखों के लिए तीर्थस्थल के साथ एक वार्षिक उत्सव स्थल भी बन गया।’ विभाजन के बाद उत्सव ने अपनी विविधता खो दी, जिसे पर्यवेक्षकों ने 1955 के लाहौर टेस्ट के दौरान देखा था।

मनन आसिफ की किताब उनके शहर और उसके समृद्ध अतीत के बारे में हमारी समझ विकसित करती है, साथ ही शहर से जुड़े पात्रों, जैसे दाता गंज बख्श, योद्धा रणजीत सिंह आदि के अमूल्य जानकारी प्रदान करती है। आसिफ द्वारा उकेरे गए रेखाचित्र सूक्ष्म जानकारी तो देते हैं, लेकिन उनमें एक अपवाद रुडयार्ड किपलिंग का है, जिन्हें वह एक पक्षपाती साम्राज्यवादी के रूप में चित्रित करते हैं। दूसरी ओर, उनके उपन्यास ‘किम’ में उनकी युवावस्था के लाहौर और वहां के लोगों के संघर्ष का सहानुभूतिपूर्ण और गहराई से वर्णन किया गया है।

आसिफ की किताब ‘डिसरप्टेड सिटी’ से लाहौर की स्थापत्य कला की गहरी समझ मिलती है, जिसमें वहां की प्रसिद्ध इमारतों के बारे में बताया गया है। खंडहर या परित्यक्त मंदिर और गुरुद्वारे, जो आज भी मस्जिदों के साथ दिखाई देते हैं, इस बात को दर्शाते हैं कि इन धार्मिक स्थलों ने लाहौर की विरासत में कितनी अहम भूमिका निभाई थी। एक अन्य अध्याय में आसिफ दर्शाते हैं कि 1947 से पहले लाहौर का अधिकांश आर्थिक जीवन हिंदू और सिख उद्यम द्वारा आकार लिया गया था।

एक विचारोत्तेजक दृश्य में आसिफ लिखते हैं कि 1970-80 के दशक में जब लाहौर तेजी से इस्लामीकरण की ओर बढ़ रहा था, उस दौरान वह स्कूल से घर जाते हुए अक्सर एक पुराने घर से गुजरते थे, जिसके किनारे पर देवनागरी अक्षरों में कुछ धुंधले शब्द लिखे थे। वह याद करते हुए कहते हैं, ‘कई महीनों तक मैं सिर्फ उस लिखावट पर सरसरी निगाह डालकर आगे बढ़ जाता था। मैं लाहौर में देवनागरी नहीं पढ़ सका (न पढ़ना सीख पाया)। मैं जानता था कि देवनागरी लिपि ‘हिंदू’ थी और मेरी सामाजिक विज्ञान की किताब में जैसा बताया गया था, ‘हिंदू’ वह व्यक्ति था, जो मेरी पीठ में छुरा घोंपने की कोशिश कर रहा था।’

इन पंक्तियों को पढ़ते हुए मैं हिंदुत्व राज में रहने वाले हिंदू बच्चों के बारे में सोचने लगा, जिन्हें उनके अतीत और वर्तमान के बारे में विकृत जानकारी दी जा रही है। भारतीय जनता पार्टी की सरकारों द्वारा इतिहास और सामाजिक विज्ञान की किताबों में भारत को एक हिंदू देश के रूप में दिखाया गया है। इस बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण को हिंदुत्व सोशल मीडिया द्वारा प्रचारित किया गया है, जैसे कि सभी उम्र के हिंदुओं से सभी मुसलमानों पर अविश्वास करने का आग्रह किया जाता है।

अपनी पुस्तक में एक जगह आसिफ बताते हैं कि कैसे एक बार मेला चिरागान और वसंत जैसे लोकप्रिय त्योहारों को सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक द्वारा प्रचारित वहाबी इस्लाम के सिद्धांतों के साथ संघर्ष करने की वजह से बंद कर दिया गया था। 1980 और उसके बाद के पाकिस्तान में ‘खुशी मनाना और सामूहिकता संदिग्ध गतिविधियां बन गईं।’ ऐसा मालूम पड़ता है कि हिंदूवादी भारत भी पाकिस्तान के उसी उदाहरण का सूक्ष्मता से अनुकरण कर रहा है।

इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान ने लाहौर के अतीत से हिंदू और सिख प्रभाव के संकेतों को मिटाने की भरसक कोशिश की। अब हिंदुत्ववादी मुस्लिमों के ऐतिहासिक तथ्यों को मिटाने में पाकिस्तान की नकल कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि उत्तरी भारत के शहरों और कस्बों को सांस्कृतिक और वास्तु शिल्प रूप से इस तरह नया आकार दिया जाए कि इस्लामी प्रभाव पूरी तरह खत्म हो जाए। हम यह भूल जाएं कि उत्तरी भारत का अतीत सिर्फ गैर-मुसलमानों की राजनीति के बारे में नहीं था, बल्कि यह लेखकों, कलाकारों, संगीतकारों और कारीगरों का समाज में असाधारण और स्थायी योगदान के बारे में भी था, भले ही वे आस्था से मुस्लिम थे, जबकि यह हमारी साझा, समावेशी, बहुलवादी भारतीय विरासत का एक अनिवार्य हिस्सा है, जिसे हिंदुत्व का विरोध करने वालों को मानना और पुष्ट करना चाहिए।

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