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जुड़ने को बेताब हैं एक संस्कृति के असंख्य बिखरे कण

Sat, 11 May 2013 10:48 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
कल्लोल चक्रवर्ती Updated Sat, 11 May 2013 10:48 PM IST
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dispersed particles are desperate to join a myriad of culture

नदियों को मां इसलिए कहते हैं, क्योंकि उन्हीं के किनारे हमने जीना सीखा। नदियों के प्रति इसी कृतज्ञता का ज्ञापन जब-तब किताबों में मिलता है। इस सिलसिले में मार्क ट्वेन के संस्मरण 'लाइफ ऑन मिसीसिपी' को याद किया जा सकता है, तो नर्मदा के परिक्रमा पथ के सौंदर्य पर अमृतलाल वेगड़ की किताबों को कौन भूल सकता है! लेकिन उत्तरोत्तर विकास की कीमत भी हमारी नदियां ही चुकाती हैं।

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एक नदी के रूप में गंगा के नष्ट होते जाने की बात नई नहीं है। इसे बिजली के लिए टिहरी में बांधा गया, लेकिन किसानों को पानी देने के नाम पर गंगनहर में तो नब्बे फीसदी पानी ही डाल दिया गया। किसी राजनीतिक पार्टी में यह साहस नहीं है कि वह इस इलाके के किसान वोटों की अनदेखी करते हुए गंगनहर में पूरी गंगा को उलीच देने का विरोध करे!
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स्थिति यह है कि इलाहाबाद का कुंभ नरौरा से पानी छोड़े जाने पर निर्भर करता है। आस्था के नाम पर अतिक्रमण का खेल उत्तरकाशी से शुरू होकर ऋषिकेश में चरम पर पहुंचता है। क्या यह सिर्फ संयोग है कि गंगा आरती का व्यावसायिक स्वरूप ठीक तब शुरू हुआ, जब यह नदी अपना पौराणिक स्वरूप और महत्व लगभग खोने लगी थी?
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शहरों की गंदगी गंगा में डालने का सिलसिला तो उत्तरकाशी से शुरू हो जाता है, जो कानपुर में चरम पर पहुंचता है। इसी कारण सूखती हुई यह नदी अपने आसपास को भी उसी तरह सुखा रही है और गंगा किनारे के कुछ पुराने तीर्थ तो कुछ वर्ष बाद हमारी स्मृतियों से भी बाहर हो जाएंगे।

गढ़मुक्तेश्वर में सौ साल पहले बहने वाली गंगा आज बृजघाट में है, तो बनारस के बाद सर्वाधिक घाटों वाला शहर बिठूर सूखती गंगा के साथ खुद व्यतीत होता जा रहा है। कभी शीतला धाम के नाम से ख्यात कड़ा माणिकपुर के मीलों लंबे रेतीले इलाके में लोग शवों को इस उम्मीद से दफनाते हैं कि कभी बाढ़ आएगी, तो उनके पितरों को मुक्ति मिल जाएगी!

गंगा के सूखने से हमारे आम जनजीवन पर पड़ा फर्क ज्यादा चिंतनीय है। विंध्याचल के छनवर की उर्वरा शक्ति की ख्याति कभी उत्तर प्रदेश के बाहर भी थी। गंगा ने उसे इतना उपजाऊ बनाया था कि कुछ भी बो देने पर फसल लहलहाने लगती थी। उसी छनवर के किसान अब अपने खेत बेचने को मजबूर हैं।

इसी तरह इलाहाबाद में यमुना से मिलने के बाद गंगा भरी-पूरी भले दिखती है, लेकिन आगे बिहार में घुसने के बाद इस सूखती नदी का असर लोगों के काम पर ही नहीं, अपराध के बढ़ते आंकड़ों में भी दिखता है। यहां परमाणु कचरे से मछलियां भी मर रही हैं और डॉल्फिन भी। गंगा के सूखने से खेती खत्म हुई, तो मल्लाहों और मछली मारने वालों के पेशे पर फर्क पड़ा। कहीं दूसरी जातियों में पंडा-पुजारी बनने की होड़ बढ़ी, तो कहीं अपराध बढ़े, खासकर मुंगेर के नक्सलियों में ज्यादातर गंगा किनारे के हताश-बेरोजगार युवा हैं।


दो युवा पत्रकार अभय मिश्र और पंकज रामेन्दु ने गंगा किनारे के शहरों की दुरावस्था के बहाने हमारी सभ्यता के छीजते जाने की अद्भुत कहानी कही है, जिसके लिए साहस भी चाहिए। कभी ब्लेन हॉर्डन ने इसी तरह कोलंबिया नदी के विनाश की कहानी 'ए रिवर लॉस्ट' नाम से लिखी थी। लेकिन यहां तो गंगा के साथ-साथ हमारा पूरा जीवन ही खतरे में है।

दर दर गंगे, अभय मिश्र-पंकज रामेन्दु, पेंगुइन बुक्स, मूल्य-199 रुपए

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