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चर्चा : क्या जल्द हो सकते हैं जम्मू-कश्मीर में चुनाव

Wed, 15 Dec 2021 06:09 AM IST
Awadhesh Kumar अवधेश कुमार
Updated Wed, 15 Dec 2021 06:09 AM IST
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सार
लद्दाख की चार सीटें निकलने के बाद जम्मू-कश्मीर में इस समय 83 विधानसभा सीटें हैं, जो परिसीमन के बाद 90 हो जाएंगी। इनमें जम्मू और कश्मीर के बीच संतुलन तो होगा ही, अनुसूचित जाति के लिए आठ प्रतिशत एवं अनुसूचित जनजाति के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का मतलब यह हुआ कि नौ सीटें आरक्षित हो जाएंगी।
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Discussion: Can elections be held soon in Jammu and Kashmir
बारामुला में बर्फबारी के दौरान पर्यटक। - फोटो : पीटीआई

विस्तार

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब और मणिपुर विधानसभा के चुनावों की गहन चर्चा हो रही है। केंद्र शासित क्षेत्र जम्मू-कश्मीर में भी चुनाव की घोषणा शीघ्र हो सकती है। मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि परिसीमन के पहले चुनाव नहीं होगा और परिसीमन के बाद चुनाव में देर नहीं की जाएगी। 



सरकार ने परिसीमन आयोग का कार्यकाल बढ़ाने से इन्कार कर दिया है। इसका अर्थ है कि मार्च के पहले आयोग की रिपोर्ट आ सकती है। 20 दिसंबर को आयोग ने राजनीतिक दलों की बैठक दिल्ली में बुलाई है। देखना है, उसमें कौन राजनीतिक दल शामिल होते हैं और कौन नहीं। 18 फरवरी को आयोग की बैठक में नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी आदि दल शामिल नहीं हुए थे।


पर सभी पार्टियां जम्मू-कश्मीर में लगातार रैलियां कर रही हैं। पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने अवश्य कहा है कि अनुच्छेद 370 और 35ए की बहाली के बगैर चुनाव में भाग नहीं लेंगी, पर उन्हें एवं जम्मू-कश्मीर केंद्रित दूसरी पार्टियों को भी पता है कि यह मांग व्यावहारिक नहीं है। पंचायत चुनाव में इन्होंने भाग नहीं लिया। 

जिला विकास परिषद के चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने भाग लिया, क्योंकि उनके सामने मुख्यधारा से बाहर हो जाने का खतरा था। सबको पता है कि जो पार्टी विधानसभा चुनाव में भाग नहीं लेगी, वह राजनीतिक प्रक्रिया से काफी समय के लिए बाहर हो जाएगी। वैसे भी गुपकार गठबंधन सीट समझौता कर भाग लेगा, तो पीडीपी स्वयं को हाशिये में धकेलना नहीं चाहेगी।

सबसे ज्यादा सभाएं भाजपा ने की हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस भी बहुत पीछे नहीं हैं। कांग्रेस केंद्रीय नेतृत्व भले ही वहां सक्रिय न हो, पर वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद लगातार रैलियां कर रहे हैं। नेशनल कांफ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला 370 की बात कर रहे हैं। 

फारुख अब्दुल्ला ने कहा कि जिस तरह किसान अपनी मांगें मनवाने के लिए शहीद हुए, उसी तरह हमें भी होना पड़ेगा। पहली बार 370 हटने के माहौल में चुनाव होगा, तो यह चुनावी मुद्दा अवश्य बना रहेगा। वास्तव में नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी और गुपकार गठबंधन की पार्टियां चुनाव में अनुच्छेद 370 और 35 ए की बहाली को मुद्दा बनाएंगी। 

इसी मांग के लिए गुपकार बना ही था। लंबे समय बाद घाटी में मंदिरों के खुलने, वहां पूजा पाठ, उनकी मरम्मत तथा अनेक हिंदू उत्सवों के मनाए जाने को भाजपा स्वाभाविक ही महिमामंडित कर रही है। गृहमंत्री अमित शाह ने अपने प्रवास के दौरान खीर भवानी मंदिर में विधि-विधान से पूजा की, जिसका संदेश बिल्कुल साफ था।

लद्दाख की चार सीटें निकलने के बाद जम्मू-कश्मीर में इस समय 83 विधानसभा सीटें हैं, जो परिसीमन के बाद 90 हो जाएंगी। इनमें जम्मू और कश्मीर के बीच संतुलन तो होगा ही, अनुसूचित जाति के लिए आठ प्रतिशत एवं अनुसूचित जनजाति के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का मतलब यह हुआ कि नौ सीटें आरक्षित हो जाएंगी।

चूंकि आज तक कांग्रेस एवं जम्मू-कश्मीर की अन्य पार्टियों ने उन्हें नजरंदाज किया है, इसलिए भाजपा इनका समर्थन पाने की उम्मीद कर रही है। जिला विकास परिषद चुनाव में वह अकेले सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। नेशनल कॉन्फ्रेंस फिर भी अपनी प्रतिष्ठा बचा सकी, पर पीडीपी धूल-धुसरित हो गई। 

पीडीपी से अलग होकर अल्ताफ बुखारी ने अपनी पार्टी बनाई और वह मैदान में हैं। उनके साथ सज्जाद लोन ने अपनी पार्टी का समझौता किया है। सज्जाद लोन का प्रभाव बारामूला और कुपवाड़ा जिले में है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद नए राजनीतिक वर्णक्रम में भीम सिंह की पैंथर्स पार्टी के लिए जगह लगभग नहीं है। वैसे बसपा भी वहां थोड़ी सक्रिय है। 

पहली बार वाल्मीकि समुदाय को मतदान का अधिकार मिला है, जिसका वह लाभ उठाना चाहती है। जाहिर है, जम्मू-कश्मीर का चुनाव कई दृष्टियों से रोचक तो होगा ही, दूरगामी महत्व वाला भी होगा। इस चुनाव के परिणाम न केवल घाटी की राजनीति की दिशा दशा तय करेंगे, बल्कि पूर्ण राज्य सहित कई नियति भी निर्धारित होगी।

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