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डिजिटल कर भारत का संप्रभु अधिकार

Sat, 06 Jun 2020 04:13 AM IST
Jayantilal Bhandari जयंतीलाल भंडारी
Updated Sat, 06 Jun 2020 04:13 AM IST
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Digital tax sovereign right of India
Digital India
कोविड-19 के बीच ई-कॉमर्स और डिजिटल अर्थव्यवस्था के छलांगें लगाकर बढ़ने से डिजिटल कारोबार पर लगाया गया डिजिटल टैक्स मौजूदा तंग हालात में भारत की आमदनी का नया स्रोत बन सकता है। डिजिटल सर्विस टैक्स (डीएसटी) पर अमेजॉन, फेसबुक और गूगल जैसी अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने आपत्ति लेते हुए अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) कार्यालय से शिकायत की है।

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इसके बाद यूएसटीआर कार्यालय ने भारत में ई-कॉमर्स कंपनियों पर दो फीसदी डीएसटी लगाने के मामले की न्यायसंगतता पर जांच शुरू की है। उल्लेखनीय है कि यूएसटीआर ने भारत के अलावा अन्य नौ देशों के खिलाफ भी ऐसी ही जांच शुरू की है।

भारत में दो करोड़ रुपये से अधिक का वार्षिक कारोबार करने वाली विदेशी डिजिटल कंपनियों के द्वारा किए जाने वाले व्यापार एवं सेवाओं पर दो फीसदी डिजिटल कर लगाने के लिए वित्त विधेयक 2020-21 में संशोधित करके इसे एक अप्रैल, 2020 से कानून बना दिया गया है।

वस्तुतः डिजिटल कर विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा भारत में अर्जित आय पर लगाया गया है। इस कर के दायरे में भारत में काम करने वाली दुनिया के सभी देशों की ई-कॉमर्स करने वाली कंपनियां शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष 2019 में आठ एवं नौ जून को जापान के शहर फुकुओका में आयोजित जी-20 देशों के वित्त मंत्रियों और दुनिया के शीर्ष वित्तीय नीति-निर्माताओं की शिखर बैठक में डिजिटल वैश्विक उद्योग-कारोबार पर डिजिटल टैक्स लगाने को लेकर आम सहमति बनी थी।

फिर 28 एवं 29 जून को जापान के ओसाका में जी-20 सम्मेलन के दौरान डेटा लोकलाइजेशन और डिजिटल कर पर भारत का रुख रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि डेटा एक ऐसी संपत्ति है, जिस पर विकासशील देशों के हितों का ध्यान रखा जाना जरूरी है। स्थिति यह है कि पिछले एक वर्ष से दुनिया के अधिकांश देश डिजिटल कारोबार करने वाले उद्यमों पर डिजिटल टैक्स लगाने का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका सहित दुनिया के कुछ विकसित देशों की प्रमुख डिजिटल कंपनियां इस नए डिजिटल टैक्स के खिलाफ हैं।

कोविड-19 के बाद ई-कॉमर्स छलांगें लगाकर किस तरह बढ़ेगा, इसका अनुमान हाल ही में विश्व प्रसिद्ध ग्लोबल डेटा एजेंसी स्टेटिस्टा के द्वारा लॉकडाउन और कोविड-19 के बाद जिंदगी में आने वाले बदलाव के बारे में जारी की गई वैश्विक अध्ययन रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 46 प्रतिशत लोगों का मानना है कि वे अब भीड़भाड़ में नहीं जाएंगे। ऐसे में दुनिया में उपभोक्ताओं की आदत और व्यवहार में भारी बदलाव के मद्देनजर ऑनलाइन खरीदारी में तेज वृद्धि तय है।

स्थिति यह है कि कोविड-19 के बीच भारत में खुदरा कारोबार (रिटेल ट्रेड) के ई-कॉमर्स बाजार की चमकीली संभावनाओं को मुठ्ठियों में करने के लिए दुनिया भर की बड़ी-बड़ी ऑनलाइन कंपनियों के साथ-साथ भारत के व्यापारिक संगठनों के द्वारा भी स्थानीय किराना दुकानों व कारोबारियों को ऑनलाइन जोड़ने के प्रयास की नई रणनीति बनाई जा रही है। विगत 22 अप्रैल को लॉकडाउन के बीच रिलायंस जियो और फेसबुक में ई रिटेल शॉपिंग में उतरने को बड़ी डील हुई है।

फेसबुक ने जियो प्लेटफॉर्म्स में 5.7 अरब डॉलर लगाकर 9.9 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने की घोषणा की है। अब रिलायंस का जियोमार्ट और फेसबुक का वाट्सएप प्लेटफॉर्म मिलकर भारत के करीब तीन करोड़ खुदरा कारोबारियों और किराना दुकानदारों को पड़ोस के ग्राहकों के साथ जोड़ने का काम करेंगे। इनके लेन-देन डिजिटल होने से पड़ोस की दुकानों से ग्राहकों को सामान जल्द मिलेगा और छोटे दुकानदारों का कारोबार भी बढ़ेगा। भारत में व्हाट्सएप के करीब 40 करोड़ यूजर्स हैं, जबकि जियो के 38 करोड़ ग्राहक हैं।

निस्संदेह ई-कॉमर्स ने देश में खुदरा कारोबार में क्रांति ला दी है। देश में इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं की संख्या इस समय करीब 62 करोड़ से भी अधिक होने के कारण देश में ई-कॉमर्स की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है। डेलॉय इंडिया और रिटेल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत का ई-कॉमर्स बाजार वर्ष 2021 तक 84 अरब डॉलर का हो जाएगा, जोकि 2017 में महज 24 अरब डॉलर था। लेकिन अब कोविड-19 के बीच अनुमान किया गया है कि वर्ष 2027-28 तक यह कारोबार 200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।

यह बात महत्वपूर्ण है कि देश में खुदरा कारोबार में जैसे-जैसे विदेशी निवेश बढ़ा, वैसे-वैसे ई-कॉमर्स की रफ्तार बढ़ती गई। ऐसे में अब एक ओर ई-कॉमर्स नीति में जरूरी बदलाव करने होंगे, दूसरी ओर डिजिटल कर की व्यवस्था को दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ाना होगा।

वैसे नई ई-कॉमर्स नीति का मसौदा विभिन्न पक्षों के विचार-मंथन के लिए जारी किया जा चुका है। कोविड-19 के मद्देनजर नई ई-कॉमर्स नीति के तहत ई-कॉमर्स बाजार में उपभोक्ताओं के हितों और उत्पादों की गुणवत्ता संबंधी शिकायतों के संतोषजनक समाधान के लिए नियामक भी सुनिश्चित किया जाना है।

ऐसी बहुराष्ट्रीय ई-कॉमर्स कंपनियों पर उपयुक्त नियंत्रण करना होगा, जिन्होंने भारत को अपने उत्पादों का डंपिंग ग्राउंड बना दिया है। कई बड़ी विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियां टैक्स की चोरी करते हुए देश में अपने उत्पाद बड़े पैमाने पर भेज रही हैं। ये कंपनियां इन उत्पादों पर गिफ्ट या सैंपल का लेबल लगाकर भारत में भेज देती हैं।

नई ई-कॉमर्स नीति में अनुमति मूल्य, भारी छूट और घाटे के वित्तपोषण पर लगाम लगाने की व्यवस्था करनी होगी, जिससे सबको काम करने का समान अवसर मिल सके। इससे तो कोई इनकार ही नहीं कर सकता कि भारत अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय और विश्व व्यापार संगठन के समक्ष न्यायसंगतता के साथ दृढ़तापूर्वक अपना पक्ष प्रस्तुत करेगा और किसी दबाव में नहीं आएगा।

कोविड-19 के बाद नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के तहत भविष्य में डेटा की वही अहमियत होगी, जो आज सोने की है। डिजिटल कर लगाने का कदम भारत का संप्रभु अधिकार है और यह भविष्य में भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
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