न अस्पृश्यता दूर हुई, न ही निरक्षरता
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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पिछले दिनों अंबेडकर स्मृति व्याख्यान देते हुए अस्पृश्यता की समस्या पर गंभीर चिंता प्रकट की। उनका कहना था कि संविधान निर्माता की एक बात तो हम मानें और सभी स्तरों पर छुआछूत को समाप्त करें। अस्पृश्यता किसी भी विकसित देश की समाज व्यवस्था का हिस्सा नहीं है। हमारे संविधान ने तो अस्पृश्यता को निषिद्ध कर दिया है, पर व्यावहारिकता में हम अब भी इसे खत्म नहीं कर पाए हैं। प्रधानमंत्री ने भी उसी दौरान छात्रों के लिए अपने संबोधन में जापान यात्रा के हवाले से बताया कि वहां स्वच्छता को कितना महत्व दिया जाता है।
यहां इस तथ्य की अनदेखी कर दी जाती है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में शारीरिक श्रम को जगह ही नहीं दी गई है। जो शारीरिक श्रम करते हैं, उन्हें शिक्षा से दूर रहना पड़ता है। दूसरी ओर, जो पढ़ाई-लिखाई और मानसिक काम करते हैं, वे शारीरिक श्रम नहीं करते। लंबे समय से इस अभ्यास ने दोनों में दूरी बना दी है। सम्मान और अपमान का प्रश्न भी इससे जोड़ दिया गया है।
यह सब जानते हैं कि स्कूलों में जब भी सफाई अभियान चलाया जाता है, तो दलित बच्चों को चुन-चुनकर इस काम में लगाया जाता है। अनेक दलित लेखकों की आत्मकथाओं में इसका उल्लेख मिलता है। सत्यमेव जयते में आमिर खान ने ईसाई दलित मिशनरियों को पेश कर आंखें खोलीं थीं। उसी शो में वाल्मीकि समाज की एक संस्कृत शिक्षिका ने बताया था कि शिक्षिकाएं भी स्कूल के शौचालय दलित बच्चियों से ही साफ कराती थीं। गांव में मुर्दा मवेशी चाहे घरों में पड़ी सड़ जाएं, पर उच्च जातियां अपने घरों से उन्हें नहीं उठातीं। आज भी हजारों दलित परिवार मैला उठाते हैं।
सभी जातियों के छात्र-शिक्षक मिलकर स्कूल की सफाई करें, तो यह श्रमदान का अच्छा उदाहरण होगा। महात्मा गांधी, विनोबा भावे और बाबा साहब श्रम संतुलन के पक्ष में थे। हम अगर स्वच्छता के मामले में जापान जैसे विकसित देशों से कुछ सीखना चाहते हैं, तो हमें सफाई के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा।
पिछले दिनों हमने विश्व साक्षरता दिवस मनाया। शहरी भारत में एक से बढ़कर एक, सुविधा-संपन्न, वातानुकूलित स्कूल खुल रहे हैं। खेत-खलिहानों की धूप-गर्मी क्या होती है, अभाव और गरीबी क्या है, इस बारे में हम जानना भी नहीं चाहते। कभी हमारे देश की कुल आबादी जितनी थी, लगभग उतनी जनसंख्या आज निरक्षर बच्चों की है। सर्व शिक्षा अभियान का खूब प्रचार किया गया। मगर अब भी स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या कम नहीं है। हमारे राजनेताओं की अदूरदर्शिता से असंख्य लोग पहले निरक्षर रह गए। अगर पहली पंचवर्षीय योजना में ही हमारे नीति-नियंताओं ने देश के हर बालक को अपना बालक समझकर पढ़ाया होता, तो वह आज 65 साल का पढ़ा-लिखा आत्मनिर्भर भारतीय नागरिक होता।
आज पहले की तुलना में स्कूलों की संख्या बढ़ी है। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के वेतन बढ़े हैं। निजी उच्च शिक्षण संस्थाएं लाखों की कैपीटेशन फी लेती हैं। फिर भी शिक्षा में गुणवत्ता क्यों नहीं आई? अच्छे दिनों के सपने देखने वाली आंखों को इस चौंधिया देने वाले उजाले से बचाना होगा।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं)