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विकास सॉफ्ट हिंदुत्व हो गया है
यशवंत व्यास
Updated Tue, 19 Dec 2017 11:36 AM IST
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भाजपा की जीत
अगर कोई महाशय मोदी से सिर्फ नफरत करते हैं और बगैर किसी व्याख्या में जाए कामना करते हैं कि उनकी पार्टी येन-केन प्रकारेण धूल-धूसरित हो जाए, तो गुजरात के नतीजे अब भी उनके लिए उम्मीद की किरण हो सकते हैं। यह उम्मीद वक्त-ब-वक्त अलग-अलग तरह से उपयोगी औजार में बदलती रही है।
एक किस्म के मनभावन तरीके से जातियों के समूहों की आकांक्षाएं भड़काकर संख्याबल के आधार पर बहुसंख्यक वोटों का बंटवारा और अल्पसंख्यक वोटों का भयाक्रांत एकजाई वोट बैंक उनका काम्य रहा है। इससे धर्मनिरपेक्षता के नए-नए पोस्टर की प्रादेशिक डिजाइनों के संस्करण तैयार होते रहे हैं।
जरात ने इसमें नया तत्व जोड़ दिया है। गुजरात चुनाव ने वोट बैंक की तिजारत का गणित ही बदल दिया। राहुल गांधी शिवभक्ति का पोस्टर लेकर चलने लगे। जिग्नेश के दलित, अल्पेश के पिछड़े और हार्दिक के पटेल के डिब्बे जोड़कर जो ट्रेन बनी, उसके पायदान पर विकास के पागल होने के नारे लगाने वाले झूम रहे थे और कॉरपोरेट, नव उदारवाद, बाजार आदि-इत्यादि मुद्दे टिकट की लाइन में खड़े थे।
हम शिव भक्त हैं, पर हम नफरत फैलाने वाले नहीं हैं, यह निश्छल भक्ति पहले गायब थी और गोया दो भक्तों में खेल था।
दोहरी मार यह हुई कि कुछ वोट बैंकरों ने कहना ही शुरू कर दिया कि इनके भरोसे मत रहो, अपनी ताकत बनाओ, नया आउटफिट बनाओ और सीधे सौदे की स्थिति में आओ। अगर हिंदू एक होकर वोट डालेंगे, कांग्रेस मंदिर-मंदिर घूमने लगेगी, तो पार्टी की डुप्लीकेट पार्टी का मामला बन जाएगा।
आज यह डर, वोट बैंकों के नफे-नुकसान पर गंभीर विचार में तब्दील होता जा रहा है। अखलाक से लेकर टीपू सुल्तान तक, जेएनयू से नोटबंदी-जीएसटी तक, लगातार जो बौद्धिक विमर्श बनाया गया, वह नवउदारवादी शक्तियों के विरुद्ध रणनीतिक न होकर सांप्रदायिकता की बैंकिंग पर ही जा गिरा।
अब गुजरात में जीएसटी का भूचाल-केंद्र सूरत और हार्दिक का पटेल-तूफान केंद्र मेहसाणा, दोनों के नतीजे उन्हें स्तब्ध किए हुए हैं। उत्तर प्रदेश में नोटबंदी का पत्ता भी डाल से टूटकर ऐसे ही गिरा था।
जिन्हें मणिशंकर अय्यर और कपिल सिब्बल या पाकिस्तानी इलाके से आने वाले बयानों में खुद के लिए अफसोस मिश्रित दबी हुई प्रसन्नता महसूस होती थी, वे भी जानते रहे हैं कि जनता के मन में इस बात को लेकर कोई संशय नहीं रहा है कि मोदी की हार के लिए बेकरार लोग किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। यही वह बात है, जो चिंतित करती है। जब यह स्थापित धारणा बन जाए, तो सही आरोप भी निष्फल तीर साबित होने लगते हैं।
एक होती है धारणा, दूसरी होती है साख। गुजरात से अगर कोई सबक सीखा जा सकता है, तो वह यह है कि धारणाएं मुश्किल से बनती हैं और बन गईं, तो सेंत-मेंत में ध्वस्त नहीं की जा सकतीं। हां, दृढ़ प्रयासों से क्षत-विक्षत जरूर की जा सकती हैं। लेकिन, साख एक भिन्न चीज है।
राहुल गांधी के सार्वजनिक व्यवहार में लोगों ने कुछ बदलाव देखा, तो उनके प्रेमी किलक उठे। लेकिन नरेंद्र मोदी के जोखिम लेने के साहस और लगातार जीत के जुनून की काट के लिए वस्तुतः जमीनी स्तर पर वास्तविक रणनीति की जरूरत है। ढाई दशक तक लगातार एक पार्टी गुजरात में शासन करती रही और सिर्फ दंगों की तस्वीरों से प्रतिरोध का मौखिक युद्ध लड़ा जाता रहा।
दुष्यंत के जो शेर कांग्रेस के विरुद्ध बोले जाते थे, वे शेर प्रतिपक्ष की कांग्रेस बोलकर करिश्मा नहीं कर सकती। क्योंकि, यह अंतर्विरोध, जमावड़ों में छिप जाता है, खरी मुद्राओं में नहीं। किसानों के नाम पर भी जाति, गरीबों के नाम पर भी जाति या दबे-कुचलों के नाम पर संप्रदाय के खेल से भ्रष्टाचार, कुशासन और चालाकियां निरस्त करने जैसा बड़ा कार्यभार लेना, दूसरे पक्ष को मजबूत करने जैसा ही है।
नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक परिघटना को जन्म दिया है।
इसमें सैद्धांतिक, व्यावहारिक, मुद्रागत तथा लक्ष्यगत स्पष्टता शामिल है। भाषा से, विरोधियों के अंतर्विरोधों से तथा हैरान करने वाली प्रविधि से अपने व्यक्तित्व को तैयार किया है। इसके विपरीत प्रतिपक्ष हक्का-बक्का या झुंझलाया हुआ दिखने लगता है। वह राहुल गांधी के भविष्य में चतुर हो जाने की कामना से ही आंदोलित होता रहता है।
मोदी के उदय और निरंतर विजय में, बहस को नव-उदारवाद से अलग कर सांप्रदायिकता पर केंद्रित करने की विपक्ष की ऐसी जिद का बड़ा हाथ है, जो अनचाहे ही समूचे विमर्श को विपरीत कर देती है। यदि मोदी-निंदक, मोदी-भक्तों का पाटिया साफ करने की कामना, बिना संकल्प के करते हैं या यह कहते हुए करना चाहते हैं कि जो कुछ पिछले दो दशक में हो गया, उसमें उनके इस उपक्रम की कोई भूमिका नहीं है, तो फिर भक्तों की मुराद पूरी होती रहेगी।
सोशल मीडिया की लड़ाई में नारा चलाया गया था, ‘विकास पागल हो गया है’, नतीजा आया, ‘सॉफ्ट हिंदुत्व का विकास हो गया है।’
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एक किस्म के मनभावन तरीके से जातियों के समूहों की आकांक्षाएं भड़काकर संख्याबल के आधार पर बहुसंख्यक वोटों का बंटवारा और अल्पसंख्यक वोटों का भयाक्रांत एकजाई वोट बैंक उनका काम्य रहा है। इससे धर्मनिरपेक्षता के नए-नए पोस्टर की प्रादेशिक डिजाइनों के संस्करण तैयार होते रहे हैं।
जरात ने इसमें नया तत्व जोड़ दिया है। गुजरात चुनाव ने वोट बैंक की तिजारत का गणित ही बदल दिया। राहुल गांधी शिवभक्ति का पोस्टर लेकर चलने लगे। जिग्नेश के दलित, अल्पेश के पिछड़े और हार्दिक के पटेल के डिब्बे जोड़कर जो ट्रेन बनी, उसके पायदान पर विकास के पागल होने के नारे लगाने वाले झूम रहे थे और कॉरपोरेट, नव उदारवाद, बाजार आदि-इत्यादि मुद्दे टिकट की लाइन में खड़े थे।
हम शिव भक्त हैं, पर हम नफरत फैलाने वाले नहीं हैं, यह निश्छल भक्ति पहले गायब थी और गोया दो भक्तों में खेल था।
दोहरी मार यह हुई कि कुछ वोट बैंकरों ने कहना ही शुरू कर दिया कि इनके भरोसे मत रहो, अपनी ताकत बनाओ, नया आउटफिट बनाओ और सीधे सौदे की स्थिति में आओ। अगर हिंदू एक होकर वोट डालेंगे, कांग्रेस मंदिर-मंदिर घूमने लगेगी, तो पार्टी की डुप्लीकेट पार्टी का मामला बन जाएगा।
आज यह डर, वोट बैंकों के नफे-नुकसान पर गंभीर विचार में तब्दील होता जा रहा है। अखलाक से लेकर टीपू सुल्तान तक, जेएनयू से नोटबंदी-जीएसटी तक, लगातार जो बौद्धिक विमर्श बनाया गया, वह नवउदारवादी शक्तियों के विरुद्ध रणनीतिक न होकर सांप्रदायिकता की बैंकिंग पर ही जा गिरा।
अब गुजरात में जीएसटी का भूचाल-केंद्र सूरत और हार्दिक का पटेल-तूफान केंद्र मेहसाणा, दोनों के नतीजे उन्हें स्तब्ध किए हुए हैं। उत्तर प्रदेश में नोटबंदी का पत्ता भी डाल से टूटकर ऐसे ही गिरा था।
जिन्हें मणिशंकर अय्यर और कपिल सिब्बल या पाकिस्तानी इलाके से आने वाले बयानों में खुद के लिए अफसोस मिश्रित दबी हुई प्रसन्नता महसूस होती थी, वे भी जानते रहे हैं कि जनता के मन में इस बात को लेकर कोई संशय नहीं रहा है कि मोदी की हार के लिए बेकरार लोग किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। यही वह बात है, जो चिंतित करती है। जब यह स्थापित धारणा बन जाए, तो सही आरोप भी निष्फल तीर साबित होने लगते हैं।
एक होती है धारणा, दूसरी होती है साख। गुजरात से अगर कोई सबक सीखा जा सकता है, तो वह यह है कि धारणाएं मुश्किल से बनती हैं और बन गईं, तो सेंत-मेंत में ध्वस्त नहीं की जा सकतीं। हां, दृढ़ प्रयासों से क्षत-विक्षत जरूर की जा सकती हैं। लेकिन, साख एक भिन्न चीज है।
राहुल गांधी के सार्वजनिक व्यवहार में लोगों ने कुछ बदलाव देखा, तो उनके प्रेमी किलक उठे। लेकिन नरेंद्र मोदी के जोखिम लेने के साहस और लगातार जीत के जुनून की काट के लिए वस्तुतः जमीनी स्तर पर वास्तविक रणनीति की जरूरत है। ढाई दशक तक लगातार एक पार्टी गुजरात में शासन करती रही और सिर्फ दंगों की तस्वीरों से प्रतिरोध का मौखिक युद्ध लड़ा जाता रहा।
दुष्यंत के जो शेर कांग्रेस के विरुद्ध बोले जाते थे, वे शेर प्रतिपक्ष की कांग्रेस बोलकर करिश्मा नहीं कर सकती। क्योंकि, यह अंतर्विरोध, जमावड़ों में छिप जाता है, खरी मुद्राओं में नहीं। किसानों के नाम पर भी जाति, गरीबों के नाम पर भी जाति या दबे-कुचलों के नाम पर संप्रदाय के खेल से भ्रष्टाचार, कुशासन और चालाकियां निरस्त करने जैसा बड़ा कार्यभार लेना, दूसरे पक्ष को मजबूत करने जैसा ही है।
नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक परिघटना को जन्म दिया है।
इसमें सैद्धांतिक, व्यावहारिक, मुद्रागत तथा लक्ष्यगत स्पष्टता शामिल है। भाषा से, विरोधियों के अंतर्विरोधों से तथा हैरान करने वाली प्रविधि से अपने व्यक्तित्व को तैयार किया है। इसके विपरीत प्रतिपक्ष हक्का-बक्का या झुंझलाया हुआ दिखने लगता है। वह राहुल गांधी के भविष्य में चतुर हो जाने की कामना से ही आंदोलित होता रहता है।
मोदी के उदय और निरंतर विजय में, बहस को नव-उदारवाद से अलग कर सांप्रदायिकता पर केंद्रित करने की विपक्ष की ऐसी जिद का बड़ा हाथ है, जो अनचाहे ही समूचे विमर्श को विपरीत कर देती है। यदि मोदी-निंदक, मोदी-भक्तों का पाटिया साफ करने की कामना, बिना संकल्प के करते हैं या यह कहते हुए करना चाहते हैं कि जो कुछ पिछले दो दशक में हो गया, उसमें उनके इस उपक्रम की कोई भूमिका नहीं है, तो फिर भक्तों की मुराद पूरी होती रहेगी।
सोशल मीडिया की लड़ाई में नारा चलाया गया था, ‘विकास पागल हो गया है’, नतीजा आया, ‘सॉफ्ट हिंदुत्व का विकास हो गया है।’
क्या धर्मनिरपेक्षता के योद्धा यही चाहते हैं?