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किताब के लिए बेताब!

Thu, 06 Jun 2013 10:46 PM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Thu, 06 Jun 2013 10:46 PM IST
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desperate to book

मुझे किताब खरीदनी है...पैसे चाहिए। मेरे बेटे ने जब सुबह-सुबह मुझसे यह कहा, तो मेरे मन में मंदिर की घंटियां बजने लगीं। बेकार ही बदनाम करते हैं नई पीढ़ी को कि वह किताबों से दूर होती जा रही है। फैशन और जंक-फूड में बर्बाद हो रही है। और भी न जाने क्या-क्या। जेब से दो सौ रुपये निकाल कर उसे देते हुए कहा, मुझे तुम पर गर्व है कि तुम आज भी किताब खरीदते हो।

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मगर आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं। दो सौ रुपल्ली में कुछ नहीं आने वाला। वह झल्ला गया।
अभी एक-दो किताबें खरीद लो। बाद में और खरीद लेना। महीने का आखिरी हफ्ता क्या होता है, उसे क्या पता।
मैं एक ही किताब खरीद रहा हूं और मुझे पूरे एक हजार रुपये चाहिए। बेटे ने बताया।

क्या किसी की ग्रंथावली खरीद रहे हो? परसाई और मंटो की तो है अपने घर में। मैंने याद दिलाया।
मुझे हैरी पॉटर खरीदना है। और वह एक किताब है, ग्रंथावली नहीं। बेटे ने बताया।
फिल्म तो देख आए हो, किताब क्यों पढ़ रहे हो? मैंने पूछा।

आपने देवदास सात बार पढ़ी और बीस बार देखी थी। यह किताब का आखिरी संस्करण है। बेटे की जानकारी जानलेवा थी।
पिछली किताब भी तो खरीदी थी तुमने। उसमें क्या था, जरा बताओ मुझे। मैंने जानना चाहा।
पढ़ने का टाइम ही कहां मिला। पढ़ लूंगा, तो बता दूंगा। बेटे ने जवाब पकड़ाया।

यानी तुमने पहले वाली हैरी पॉटर पढ़ी नहीं है और नई पर फिर हजार रुपये उड़ाने वाले हो? मुझे गुस्सा आ गया।
हैरी पॉटर पढ़ने के लिए नहीं, देखने और दिखाने के लिए खरीदी जाती है। जिसके हाथ में हैरी पॉटर न हो, उसे गरीब और जाहिल-गंवार समझा जाता है।

यदि हजार रुपये खर्च कर आप पढ़े-लिखे और संपन्न मान लिए जाते हैं, तो मुझे नहीं लगता कि यह सौदा बुरा है। और हो सकता है कि यह रिटायरमेंट के बाद आपके ही पढ़ने के काम आए। क्योंकि आप ही तो कहते हैं न कि बूढ़े और बच्चे एक जैसे होते हैं। चलिए, जल्दी से निकालिए, वर्ना खत्म हो जाएगी।
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रोज दस बजे सोकर उठने वाला मेरा बेटा आज सात बजे क्यों तैयार हो गया, मुझे समझ में आ गया। मगर उसका यों जल्दी जागना बहुत महंगा पड़ता है- मध्यवर्गीय बाप को।

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