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बात निकली है तो दूर तक जाएगी
एम के वेणु
Updated Wed, 16 Apr 2014 06:50 PM IST
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डॉ मनमोहन सिंह की बेटी उपिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू के इस खुलासे को अपने पिता का भरोसा तोड़ने जैसा बताया है, जिसमें बताया गया है कि कांग्रेस यानी सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को अपने राजनीतिक अधिकार का उपयोग नहीं करने दिया। उनका कहना है कि बारू की किताब शरारती और अनैतिक कवायद का नमूना है।
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ऐसा लगता है कि उपिंदर सिंह ने यह प्रतिक्रिया कांग्रेस अध्यक्ष को राहत पहुंचाने के लिए दी है। गौरतलब है कि विवादित किताब में प्रधानमंत्री के प्राधिकार में कटौती करने के लिए परोक्ष रूप से सोनिया गांधी को दोषी ठहराया गया है। अगर यही किताब लोकसभा चुनाव के बाद आती, तो प्रधानमंत्री की बेटी शायद इतनी तीखी प्रतिक्रिया नहीं देती। अब नरेंद्र मोदी अपने चुनावी भाषणों में बारू की किताब का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि यूपीए सरकार का रिमोट कंट्रोल सोनिया गांधी के हाथ में है।
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साफ है कि विवाद किताब के तथ्यों पर नहीं, बल्कि इसके प्रकाशित होने के समय पर है। उपिंदर सिंह के अनुसार बारू ने उन्हें संकेत दिया था कि किताब चुनाव के बाद जारी होगी। शायद इसलिए वह निश्चिंत थीं। लेकिन यहां एक दार्शनिक सवाल उठता है कि किताब की नैतिकता उसके तथ्यों के आधार पर तय होनी चाहिए या उसे जारी करने के समय पर। क्या यह संभव है कि जो सच आज अनैतिक हो, वह किसी और समय नैतिक साबित हो! सच यह है कि बारू की किताब बाद में प्रकाशित होने पर अपना महत्व खो देती।
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इस किताब में जो कुछ लिखा गया है, वह लोगों को कमोबेश पहले से ही पता है। बारू इस किताब के तथ्यतः सही होने के पक्ष में अखबारों की सैकड़ों कतरनें पेश कर सकते हैं। हालांकि उन्होंने कुछ अतिरिक्त जानकारी भी जोड़ी है, जिसे सरकार खारिज कर रही है। मगर बारू की किताब के व्यापक निहितार्थ की अनदेखी नहीं की जा सकती। हकीकत यह है कि अगर यह किताब चुनाव के बाद जारी की जाती, तो खुद कांग्रेस इसे तवज्जो नहीं देती।
प्रधानमंत्री की बेटी बारू पर आरोप लगाते हुए कुछ ज्यादा ही आक्रामक दिख रही हैं। उनका दावा है कि बारू की प्रधानमंत्री तक विशिष्ट पहुंच नहीं थी। जबकि बारू का प्रधानमंत्री से रोज का मिलना था। मनमोहन सिंह के साथ उनके घनिष्ठ व्यक्तिगत रिश्ते किसी से छिपे नहीं थे। जब्ा बारू प्रधानमंत्री कार्यालय छोड़ सिंगापुर में कोई अकादमिक जिम्मेदारी संभालने जा रहे थे, तब प्रधानमंत्री और उनके परिवार ने उन्हें खाने पर आमंत्रित किया था। मनमोहन सिंह की ज्यादातर अधिकारियों के साथ ऐसी अंतरंगता नहीं है। आसपास के लोगों पर भरोसा न करने वाले प्रधानमंत्री ने कई मौकों पर बारू पर विश्वास जताया।
अपने इस पूर्व मीडिया सलाहकार के साथ मनमोहन सिंह के संबंध बहुत पुराने हैं। बारू के पिता बी पी आर विट्ठल (आईएएस) आंध्र प्रदेश में वित्त और नियोजन विभाग में प्रमुख सचिव थे और मनमोहन सिंह के पुराने मित्र थे। दरअसल बारू आधिकारिक रूप से तो मीडिया सलाहकार थे, पर वह नाजुक मसलों पर प्रधानमंत्री को अनौपचारिक सूचनाएं भी देते थे। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को प्रधानमंत्री ने सबसे बड़ी उपलब्धि बताया था। तब इस समझौते के पक्ष में देश और बाहर, जिस समूह ने माहौल बनाया था, उसमें अमेरिका में भारत के मौजूदा राजदूत जयशंकर के अलावा संजय बारू भी थे। लिहाजा बारू के लेखन को व्यापक नजरिये से देखना चाहिए।
बारू ने जो लिखा, वह कुछ हद तक एनडीए के समय के प्रधानमंत्री कार्यालय के बारे में भी सच है। तथ्य यह है कि कई बार सरकार के उन संगठनों से रिश्ते होते हैं, जिनके सदस्य राष्ट्रपति के सामने शपथ नहीं लेते। एनडीए सरकार के समय अटल बिहारी वाजपेयी का पाला भी ऐसी मुश्किलों से पड़ा था।
सच तो यह है कि भारत के प्रधानमंत्री का पद राजनीति से अछूता नहीं होता। राजनीति के तमाम दबावों के बीच ही उसे काम करना होता है। अगर अटल बिहारी वाजपेयी को उन कसौटियों पर परखा जाए, जो बारू ने मनमोहन के लिए निर्धारित की हैं, तो नतीजे शायद ज्यादा अलग नहीं होंगे। अंतर सिर्फ इतना होगा कि 10 जनपथ की जगह नागपुर का संघ मुख्यालय ले लेगा। 1999 में प्रधानमंत्री पद संभालते ही वाजपेयी ने जसवंत सिंह को वित्त मंत्री बनाया। लेकिन संघ की कड़ी आपत्ति के चलते बाद में उनकी जगह यशवंत सिन्हा ने ली। वाजपेयी के राजनीतिक अधिकार को तो सत्ता संभालने के पहले दिन से ही चुनौती दी जाने लगी थी। गठबंधन सहयोगी शिव सेना ने वाजपेयी पर सुरेश प्रभु को पद से हटाने का दबाव डाला था, जबकि वह अच्छा काम कर रहे थे। दरअसल प्रभु का बढ़ता कद बाल ठाकरे को नागवार गुजर रहा था। बतौर प्रधानमंत्री वाजपेयी तब भी कुछ नहीं कर पाए थे।
वाजपेयी तब भी असहाय दिखे, जब वह 2002 के गुजरात दंगों के बाद वह नरेंद्र मोदी को पद से हटाना चाहते थे, लेकिन संघ समर्थित आडवाणी ने ऐसा होने नहीं दिया। उस एक गलत राजनीतिक फैसले को 2004 में भाजपा को मिली शिकस्त की वजह माना जाता है। समझने वाली बात है कि यह गलती इसलिए हुई, क्योंकि प्रधानमंत्री की राजनीतिक सत्ता के साथ समझौता किया गया। वाजपेयी सरकार के तमाम आर्थिक फैसलों की बागडोर स्वदेशी जागरण मंच के जरिये संघ के हाथों में थी। चाहे वाजपेयी हों या मनमोहन, दोनों की सत्ता को उस राजनीतिक तंत्र ने सीमित किया, जिसके भीतर वह काम कर रहे थे। तो बहस इस व्यापक व्यवस्थागत कमी पर होनी चाहिए। और बारू की किताब इसमें मददगार साबित हो सकती है।