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पाकिस्तान में लोकतंत्र की सिमटती जगह : पीएम इमरान खान को सत्ता संभाले एक साल पूरे हो गए हैं

Fri, 02 Aug 2019 12:07 AM IST
मरिआना बाबर मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Published by: मरिआना बाबर Updated Fri, 02 Aug 2019 12:07 AM IST
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Democratic space shrinking in Pakistan
इमरान खान - फोटो : a

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को सत्ता संभाले एक साल पूरे हो गए हैं और उनका रिपोर्ट कार्ड मिला-जुला है। मेरे लिए उनकी कुछ सबसे सफल उपलब्धियां विदेश नीति और घरेलू मुद्दों से संबंधित हैं।


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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को सत्ता संभाले एक साल पूरे हो गए हैं और उनका रिपोर्ट कार्ड मिला-जुला है। मेरे लिए उनकी कुछ सबसे सफल उपलब्धियां विदेश नीति और घरेलू मुद्दों से संबंधित हैं।

लेकिन आप इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकते कि एक वर्ष पूरा होने पर देश राजनीतिक रूप से ज्यादा ध्रुवीकृत और अस्थिर है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कटौती की वजह से लोकतांत्रिक जगह सिकुड़ गई है। इमरान खान सुरक्षा प्रतिष्ठान और खुफिया एजेंसियों पर अत्यधिक निर्भर हैं।

शुरू में उन्होंने पूरे देश में उन गरीबों के लिए पनाहगाह स्थापित की, जिन्हें रहने के लिए घर नहीं हैं और जो सड़कों पर सोते हैं। उन्हें बिस्तर और सुबह काम पर निकलने से पहले नाश्ता उपलब्ध कराया जाता है। इनमें सभी बेघरों को समायोजित नहीं किया जा सका है, लेकिन इससे भी लोगों को मदद मिली है।

उन्होंने अगला कदम बेघरों को कम लागत पर घर उपलब्ध कराने के लिए उठाया है, हालांकि इसके लिए अभी योजना ही बन रही है और इसका खर्च सरकार ही उठाएगी, जो अभी भारी आर्थिक संकट में है।

अपने अल्पसंख्यक नागरिकों के साथ पाकिस्तान का रवैया हमेशा चिंताजनक रहा है और हर सरकार को लेकर यह शिकायत रही है। लेकिन हाल में राष्ट्रपति निवास में अल्पसंख्यकों के लिए एक विशेष आयोजन हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति, दोनों की मौजूदगी असाधारण थी।

नेशनल एसेंबली में मानवाधिकार के संसदीय सचिव लाल चंद माल्ही ने हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हुए आयोजन में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की मौजूदगी पर संतोष जताते हुए कहा कि यह कायदे-आजम के दृष्टिकोण का पाकिस्तान बनाने के प्रति गंभीरता को दर्शाता है।

इन अल्पसंख्यकों में पारसी, ईसाई, हिंदू, सिख, बहाई और कलश समुदाय शामिल थे। सबसे महत्वपूर्ण घोषणा प्रधानमंत्री इमरान खान की थी, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से धार्मिक अल्पसंख्यकों के जबरन धर्मांतरण की ओर इशारा करते हुए कहा कि इसे रोकने की जरूरत है, क्योंकि यह इस्लामी मूल्यों और संविधान का घोर उल्लंघन है।

वर्षों से सिंध में हिंदू लड़कियों का अपहरण कर विवाह से पहले उनका जबरन धर्मांतरण किया जाता रहा है। प्रधानमंत्री ने सभी अल्पसंख्यकों को समान अधिकार सुनिश्चित करने पर जोर दिया। अल्पसंख्यक समुदायों को आश्वस्त करते हुए उन्होंने कहा कि हम सभी धर्मों के प्रार्थना स्थलों की रक्षा करेंगे और इस्लामिक दिशा-निर्देशों के अनुरूप लोगों की मानसिकता को बदलेंगे।

पिछले एक साल में दूसरी सबसे बड़ी घटना गुरु नानक देव जी की 550वी जयंती मनाने के लिए करतारपुर कॉरिडोर खोलने का इमरान खान का फैसला है। इस हफ्ते वाघा सीमा से 500 सिख तीर्थयात्री करतारपुर पहुंचे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे वक्त में, जब दोनों देशों के बीच रिश्ते बहुत खराब हैं, करतारपुर कॉरिडोर का काम रुका नहीं है और दोनों देशों के बीच इस पर निरंतर बातचीत जारी है।

इमरान खान के पक्ष में एक और अच्छी बात यह है कि हाल ही में उन्होंने वाशिंगटन की यात्रा की, जहां उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत की और इसे उनकी एक बेहद सफल यात्रा माना जा रहा है। पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से कश्मीर का मुद्दा उठाया, लेकिन क्या यह किसी भी तरह से पाकिस्तान और भारत को बातचीत की मेज पर लाने में मदद करेगा?

ऐसा होने की संभावना नहीं है। हालांकि इमरान सरकार का नकारात्मक पक्ष यह है उसने इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया को निशाना बनाया है। राजनीतिक विश्लेषक जाहिद हुसैन कहते हैं कि 'मीडिया ने अपनी स्वतंत्रता खो दी है। सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध ने संसद को पूरी तरह से अप्रभावी बना दिया है।' वह विपक्षी दलों के राजनीतिक उत्पीड़न की ओर भी इशारा करते हैं।

अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के लिए संयुक्त विपक्ष ने पूरे देश में विरोध रैली की, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ब्लैकआउट करके उसे अप्रभावी बना दिया। हाशिये पर आ चुके विपक्षी दलों ने अब राजधानी में आंदोलन की धमकी दी है और सरकार को बैकफुट पर लाने की कसम खाई है, जिससे राजनीतिक टकराव बढ़ेगा। एक पूर्व प्रधानमंत्री समेत कई शीर्ष विपक्षी नेता सलाखों के पीछे हैं। दूसरे पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व राष्ट्रपति हिरासत में हैं।

अन्य नेताओं को भी घेरा जा रहा है। लोकलुभावनवाद अब अधिनायकवाद में बदल गया है। तथाकथित 'मीडिया कोर्ट' के गठन जैसा कदम पाकिस्तानी मीडिया के लिए सबसे चिंता की बात है, जो सरकार के मीडिया विरोधी अभियान का हिस्सा है। सरकार सोशल मीडिया पर भी अंकुश लगाने की कोशिश कर रही है। सरकार का कहना है कि मीडिया उद्योग से संबंधित मुद्दों को मीडिया कोर्ट तेजी से हल करेगा।

प्रस्तावित विशेष अदालतें विशेष रूप से मीडिया उद्योग द्वारा सरकार के साथ-साथ पाकिस्तानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नियामक प्राधिकरण (पीईएमआरए) और मीडिया के खिलाफ शिकायतों की सुनवाई करेंगी। मीडियाकर्मी वेतन का भुगतान नहीं किए जाने और इसी तरह रोजगार से संबंधित मुद्दों पर मीडिया प्रतिष्ठानों के मालिकों को अदालत में ले जा सकेंगे।

इस नए 'कोर्ट' का प्रारूप निश्चित रूप से पहले प्रस्तावित एकल बेरहम 'नियामक निकाय' के प्रारूप की तुलना में अधिक खुला है। खास उद्योगों में विशेष अदालतें आम बात हैं और आमतौर पर उद्योग संबंधी मुद्दों को कारगर बनाने के लिए एक प्रभावी उपाय माना जाता है। हालांकि इन नए न्यायालयों को चलाने के लिए कौन से कानून लागू होते हैं, इससे भी बड़ा फर्क पड़ेगा।

अगर ये अदालतें बिना भेदभाव के प्रशिक्षित मध्यस्थों के साथ अपना फैसला सुनाने के लिए मानहानि, बोलने की आजादी या श्रम कानूनों पर भरोसा करती हैं, तो कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर ये फैसला सुनाने के लिए पीईएमआरए जैसे नियामकों के निरंतर बदलते कानूनों का उपयोग करती हैं, तो ये अदालतें भी बेरहम नियामक निकायों में तब्दील हो जाएंगी। यह निर्विवाद है कि मीडिया उद्योग के समक्ष कानूनी संकट मंडरा रहा है।
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