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रोटी के साथ गुलाब की भी मांग का दिन

Thu, 06 Mar 2014 06:22 PM IST
सुभाषिनी अली
सुभाषिनी अली Updated Thu, 06 Mar 2014 06:22 PM IST
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Demand rose with the roti of the day

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) के इतिहास को दोहराने की जरूरत महसूस की जा रही है, क्योंकि तमाम दिवसों की तरह बाजार इसका भी अपहरण करने की कोशिश कर रहा है। इस दिवस को एसी कमरों में बंद करने की साजिश यथास्थितिवादियों द्वारा रची जा रही है। अधिकारों के लिए, व्यवस्था के खिलाफ लड़ने वाली कामकाजी और गरीब औरतों से आठ मार्च के झंडे को छीनकर उसे सत्ता के गलियारों में सरकारी मंचों की सजावट का सामान बनाने के प्रयास शासक वर्गों की तरफ से जारी हैं।

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आठ मार्च का जन्म अमेरिका और यूरोप के महिला मजदूरों के जबर्दस्त संघर्षों की भट्ठी में हुआ था। 1909-10 में अमेरिका के न्यूयॉर्क और शिकागो की महिला कपड़ा मजदूरों ने काम के घंटे कम करने के लिए, काम की शर्तों और अपने वेतन को बेहतर बनाने के लिए हड़तालें की थीं। सड़कों पर हजारों औरतें जुलूस में नारा लगाती थीं-हमें रोटी के साथ गुलाब के फूल भी चाहिए। कितना विचित्र और कितना खूबसूरत नारा था। रोजी-रोटी के लिए लड़े जाने वाले अपने तीखे संघर्ष के बीच वे इस बात का ऐलान कर रही थीं कि वे ऐसा जीवन जीना चाहती थीं, जिसमें खुशी और रंगीन पल भी हों। कला, साहित्य और प्रकृति का सौंदर्य-इन सबके लिए वे कठिन, थकाऊ, बीमार और यातनाओं से भरे अभावग्रस्त जीवन में प्रवेश मांग रही थीं।
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अपनी जिंदगी में रोटी और गुलाब के फूल की मांग का नारा लगाती मजदूर औरतों पर घुड़सवार पुलिस ने लाठियां बरसाईं। गुंडों ने उन पर हमला किए, पर 1909 में और फिर 1910 में इन वीरांगनाओं ने सिर झुकाने से इन्कार कर दिया। उनका समर्थन केवल इन शहरों और अमेरिका के अन्य इलाकों की महिलाओं ने ही नहीं, बल्कि यूरोप के साम्यवादी तहरीक और मजदूर आंदोलनों से जुड़ी औरतों ने भी किया। इस समर्थन ने हड़ताली औरतों की हिम्मत और मजबूत की, और उनकी कई मांगें मानी गईं। उनकी यूनियन अमेरिका की सबसे बड़ी और मजबूत यूनियनों में से एक बनी।
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वर्ष 1911 में कई देशों के समाजवादी कार्यकर्ताओं का एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया। समाजवादी महिला कार्यकर्ताओं ने भी इस दौरान सम्मेलन संपन्न कर तय किया कि आठ मार्च को पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय कामकाजी महिला दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इसके कुछ वर्षों बाद इस फैसले में संशोधन कर तमाम महिलाओं की असमानता, साधनहीनता और उत्पीड़न के मद्देनजर इस दिवस का नाम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस रख दिया गया, और यह महिलाओं के संघर्ष का प्रतीक बना।

हमारे देश में इस दिवस को मनाने की लंबी परंपरा है। शहरों, कस्बों और गांवों में महिलाएं इसे एक त्योहार के रूप में मनाती हैं; लेकिन एक ऐसा त्योहार, जो उन्हें लड़ने की प्रेरणा और ऊर्जा, दोनों प्रदान करता है। आज के दौर में जब देश के शासकों ने विकास का ऐसा रास्ता चुना है, जो रोजगार पैदा करने के बजाय उसे लगातार समाप्त करता जा रहा है, जो स्थायी नौकरियों के बजाय ठेकेदारी की प्रथा के अंतर्गत हर तरह के कर्मचारियों और मजदूरों को शामिल कर रहा है, जो औरत के वेतन को लगातार घटा रहा है और उनके काम के घंटों को बढ़ा रहा है, जो उनकी असुरक्षा के एहसास को घर के अंदर और बाहर व्यापक बना रहा है और उन पर होने वाली हिंसा को रोजमर्रा का अनुभव बना रहा है।


ऐसी हालत में जब हमारे देश की महिलाओं से बहुत कुछ छिन रहा है, उनके लिए आठ मार्च का इतिहास और उसके क्रांतिकारी सार को बचाए रखना आवश्यक है। उन तमाम संघर्षों को जीतने के लिए, जिनसे मुंह नहीं चुराया जा सकता है, आठ मार्च एक मूल्यवान हथियार है। और उसके जन्म के साथ संबंधित नारा-हमें रोटी नहीं, गुलाब के फूल भी चाहिए-सपने देखने और उन्हें साकार करने, दोनों की ताकत पैदा करता है।

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