Delhi: कूड़े के पहाड़ से निपटने की चुनौती
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विस्तार
दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप नेता अरविंद केजरीवाल ने एलान किया था कि इस बार एमसीडी चुनाव कूड़े के मुददे पर ही लड़ा जाएगा। तब उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि पहले तीन नगर निगमों में बंटी दिल्ली में सत्तधारियों ने 15 सालों में तीन कचरे के पहाड़ खड़े कर पूरे महानगर को कूड़े-कचरे से भर दिया है। उन्होंने कहा कि अगले पांच वर्षों के लिए यदि जनता आम आदमी पार्टी को को महानगर निगम में जिताएगी, तो उनकी पार्टी इसे साफ कर देगी। और उनके वादे पर भरोसा करके दिल्ली की जनता ने एमसीडी चुनाव में उनकी पार्टी को जिता भी दिया। विगत नवंबर में उपग्रहीय तस्वीरों में भारत के लैंडफिल्स के ऊपर मीथेन गैस का बहुतायत में होना दिखा है। इसी वर्ष अप्रैल में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने भी अपने बयान में कहा था कि दिल्ली व अन्य शहरों में कूड़े के ढेर, जहां से मीथेन गैस का निरंतर रिसाव होता है, टाइम बम हैं। इन्हें गंभीरता से लिए जाने की आवश्यकता है। मीथेन गैस से वायुमंडल तापक्रम में बढ़ोतरी होती है और धरा के बढ़ते वायुमंडलीय तापक्रम पर लगाम लगाने में बाधा आती है।
चुनावी गहमा-गहमी में राजनीतिक दल भले ही यह कह दे कि वह दसियों वर्षों के लाखों टन के कूड़े के पहाड़ों को तीन या पांच साल में हटा देगा, किंतु लाखों टन कूड़े को हटाने, छानने व जैविक-अजैविक कचरों को अलग-अलग कर आगे की कार्रवाई करने या नई जगह पर स्थानांतरित करने में हर महानगर को सैकड़ों करोड़ों रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी। दूर स्थित डंपिंग साइटों तक कूड़ा पहुंचाने का खर्चा व कचरा ढुलाई से प्रदूषण भी बढ़ता है। बढ़ती जनसंख्या के साथ कचरे की मात्रा तो बढ़ेगी ही। डंपिंग के लिए नई जमीन मिलती नहीं, क्योंकि लोग अपने आसपास कचरे का ढेर नहीं चाहते हैं, इसलिए वे ऐसी परियोजना का विरोध करते हैं। नतीजतन कूड़े के ढेर पहाड़ बनने लगते हैं। कूड़ा डंपिंग ग्राउंड से भूजल व सतही जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, वायु प्रदूषण, ग्रीनहाऊस गैस उत्सर्जन, आग लगने की घटनाएं, ढलावों में अस्थिरता, मच्छर, मक्खी, चूहों की बाढ़ आदि की समस्याएं भी जुड़ी हुई हैं। कूड़े के ढेरों से निकलती घातक गैसें मानव स्वास्थ्य के अलावा घरों के सामान को भी नुकसान पहुंचाती हैं।
दिल्ली में लैंडफिलों में कचरा तीन करोड़ टन के करीब पहुंचने वाला है। अतः फिलहाल उपलब्ध लैंडफिल्स व डंपिंग ग्राउंडों में आग पकड़ने के जोखिमों को कम करने की कोशिश करनी चाहिए एवं वहां नए कूड़े का जमावड़ा कम करना चाहिए। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि बायेडिग्रेडेबल जैविक कूड़ा और नन-बायोडिग्रेडेबल कचरा एक साथ न जमा हों, क्योंकि ज्वलनशील गैसें मुख्यतः जैविक कूड़े के सड़न व विघटन से पैदा होती हैं। प्लास्टिक को तो लैंडफिलों में जाने ही नहीं देना चाहिए। कूड़ों के ढेरों की निरंतर निगरानी भी आवश्यक है । यदि मीथेन जैसी ज्वलनशील गैसें कूड़ों के ढेरों से सोखकर बाहर कर ली जाएं, तो अचानक की आगों को रोका जा सकता है। मुंबई में ऐसे प्रयोग हुए हैं, दिल्ली में भी इसे अपनाया जा सकता है। विगत मई में दिल्ली के उपराज्यपाल वी के सक्सेना ने गाजीपुर लैंडफिल का दौरा करने के बाद दिल्ली नगर निगम को तीन दिनों के भीतर गाजीपुर, भलस्वा व ओखला के कूड़े के पहाड़ों को तुरंत हटाने की कार्ययोजना प्रस्तुत करने के लिए कहा था। उन्होंने और भी कई निर्देश दिए थे।
केजरीवाल के समक्ष नए कूड़े के पहाड़ न बनने देने की भी चुनौती होगी। हैरानी नहीं कि लैंडफिल्स पर राजनीतिक संघर्ष कभी भी शुरू हो जाए। गाजीपुर, भलस्वा और ओखला लैंडफिल्स में करीब 270 लाख मीट्रिक टन कचरा है, जिनमें रोजाना कुछ हजार मीट्रिक टन कचरा और जुड़ता है। अलग-अलग प्रकार के कचरों का वर्गीकरण और शोधन के स्तर पर उनका उपयोग सड़क निर्माण, बिजली उत्पादन और गड्ढ़ों को भरने में किया जा सकता है। परंतु कूड़ों को अलग-अलग करने की प्रक्रिया और परिवहन आदि का खर्च भी करोड़ों रुपये में होगा।