वंचितों की मां का जाना
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महत्वपूर्ण लेखिका और प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी अब हमारे बीच नहीं हैं। लंबे समय तक उम्र संबंधी बीमारियों से जूझने के बाद गुरुवार को उनका निधन हो गया। उनके जाने से बांग्ला और हिंदी जगत शोकाकुल है, क्योंकि वह हिंदी और बांग्ला के बीच की सेतु थीं। उनका निधन सिर्फ साहित्य जगत के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज के लिए भी एक बड़ी क्षति है। बेशक उन्होंने एक खास राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित होकर साहित्य लिखा, लेकिन उनके साहित्य में मानवतावाद का पक्ष सबसे प्रबल था। उन्होंने आदिवासियों, महिला अधिकारों, बंधुआ मजदूरों को न सिर्फ अपने लेखन का विषय बनाया, बल्कि उनके कल्याण के लिए निरंतर सक्रिय रहीं।
मुझे उनसे मिलने-जुलने का सौभाग्य कई बार प्राप्त हुआ। बांग्ला की लेखिका होने के बावजूद हिंदी के प्रति उनके मन में काफी सम्मान था और हिंदी के लेखकों के साथ उनके बहुत अच्छे संबंध थे। हम लोग हिंदी मेला लगाते हैं, यह बात उन्हें याद थी। एक बार जब मैं उनसे मिलने गया, तो औपचारिक कुशल-क्षेम पूछने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा, और हिंदी मेला चल रहा है न? आप समझ सकते हैं कि हिंदी के प्रति उनके मन में कितनी चिंता थी। जबकि आम तौर पर बांग्ला के लेखक हिंदी लेखकों को अपने से कमतर समझते हैं, लेकिन महाश्वेता जी इस मामले में अपवाद थीं। हिंदी के बहुत से लेखकों, यहां तक कि नई पीढ़ी के लेखकों के साथ भी उनका संपर्क था। उनकी लगभग तमाम रचनाओं का हिंदी में अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। हिंदी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं और विदेशी भाषाओं में भी उनकी रचना के अनुवाद प्रकाशित हुए हैं।
कहीं उन्होंने लिखा है कि 'एक लंबे अरसे से मेरे भीतर जनजातीय समाज के लिए पीड़ा की जो ज्वाला धधक रही है, वह मेरी चिता के साथ ही शांत होगी।' उनकी यह बात अक्षरशः सही साबित हुई। उन्होंने अपना पूरा जीवन और साहित्य समाज की मुख्यधारा से कटकर जीने वाले आदिवासी समाज को समर्पित कर दिया। जीवन के शुरुआती दिनों में ही वह आदिवासी समाज के जीवन को बेहतर बनाने में गंभीरता से जुट गई थीं। शबर जाति को अंग्रेजों ने आपराधिक जाति घोषित कर दिया, जो कि वास्तव में आपराधिक नहीं थी। उस जनजाति के कल्याण के लिए उन्होंने काफी काम किया, जिसके कारण उन्हें 'शबर की मां' भी कहा जाने लगा। उनके शब्दों और कर्म में कोई अंतर नहीं था। जैसा वह अपने साहित्य में लिखती थीं, वैसा ही जीवन वह जीती भी थीं। एक बार मैं उनके पास बैठा बात कर रहा था, तभी आदिवासी समाज का ही कोई व्यक्ति उनसे मिलने आया। आते ही वह वहीं जमीन पर बैठने लगा, तो महाश्वेता जी ने उन्हें मना करते हुए हम लोगों के साथ कुर्सी पर बैठने के लिए कहा। वह व्यक्ति सकुचा रहा था, लेकिन हम लोगों के जोर देने पर वह कुर्सी पर बैठने के लिए तैयार हुआ। तो मेरे कहने का मतलब यह है कि उनके लिखने और जीने में कोई द्वैध नहीं था, जैसा कि अक्सर बहुत से साहित्यकारों के साथ देखा जाता है।
अविभाजित भारत में ढाका में जन्मी महाश्वेता देवी का परिवार देश विभाजन के समय पश्चिम बंगाल आकर बस गया। महाश्वेता देवी ने कोलकाता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। उनके पिता भी उपन्यासकार थे और माता लेखिका होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता थीं। इस तरह से लेखन और सामाजिक कार्य, दोनों महाश्वेता जी को विरासत में मिले। संभवतः यही वजह रही कि उन्होंने कम उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया। उनकी पहली रचना 'झांसी की रानी' है, जिसे लिखने के लिए उन्होंने घर-परिवार छोड़कर बुंदेलखंड का चप्पा-चप्पा छान मारा और लक्ष्मीबाई को एक क्रांतिकारी के रूप में चित्रित किया। हालांकि बहुत से रचनाकार उस समय लक्ष्मीबाई को सामंती पृष्ठभूमि से जोड़कर भी देख रहे थे। लेकिन महाश्वेता देवी ने पूरी लेखकीय ईमानदारी से न केवल लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व के साथ न्याय किया, बल्कि उनकी सहयोगी नायिकाओं के अवदान को भी रेखांकित किया।
उनके लगभग बीस कहानी संग्रह और तकरीबन सौ उपन्यास प्रकाशित हैं। अपने लेखन के जरिये उन्होंने सामाजिक विषमता, अन्याय, भेदभाव और खासकर आदिवासी समाज में गरीबी के खिलाफ लोगों को जागृत किया। उनके लेखन में हमें दमन एवं अन्याय के खिलाफ क्रांतिकारी आवाज सुनाई देती है। उनका साहित्य हमें भारतीय समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग के दुख-दर्द शोषण की आह और कराह से तो रूबरू कराता ही है, क्रांतिकारी प्रतिरोध का भी साक्षी बनाता है। उनका मानना था कि धधकते वर्ग संघर्ष को अनदेखा करके और इतिहास के इस संधिकाल में शोषितों का पक्ष न लेने वाले लेखकों को इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। इसलिए हैरानी नहीं कि बटाईदारी-अधिया जैसी घृणित प्रथा के खिलाफ उन्होंने अग्निगर्भ जैसा उपन्यास लिखा, जिसमें वर्ग-संघर्ष को रेखांकित किया गया है। 'हजार चौरासी की मां' उनकी उल्लेखनीय कृति है, जिसमें उन्होंने नक्सलवादी कैदियों के साथ की जाने वाली बर्बरतापूर्ण कार्रवाई और मां की ममता को बेहद संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। इसी तरह समाज की उपेक्षित महिलाओं के ऊपर उन्होंने रुदाली नामक कहानी लिखी, जो काफी प्रशंसित हुई। इन दोनों रचनाओं पर बनी फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। लेखन के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी, ज्ञानपीठ पुरस्कार मिल चुके हैं, तो उनके सामाजिक कार्यों के लिए रैमन मैगसायसाय पुरस्कार भी मिल चुका है। यही नहीं उन्हें पद्म सम्मान भी दिया गया। उनके जाने से हमने एक ऐसी अभिभावक को खो दिया है, जो समाज के सबसे पिछड़े और उपेक्षित वर्ग के पक्ष में हमेशा खड़ी रहती थी और उनके लिए आवाज उठाती थी।
-हिंदी के चर्चित आलोचक