गतिरोध की पुरानी स्थिति में संसद
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पिछले तीन सत्रों को देखने के बाद यह कल्पना नहीं थी कि संसद फिर से गतिरोध की पुरानी अवस्था में पहुंचेगी। पिछला बजट सत्र संसद के बेहद सफल सत्रों में से था। लोकसभा में उत्पादकता 103 प्रतिशत एवं राज्यसभा में 101 प्रतिशत थी। मोदी सरकार के पहले बजट सत्र की संसद उत्पादकता 103 प्रतिशत, जबकि मानसून सत्र की 98 प्रतिशत थी। यूपीए सरकार के समय 15वीं लोकसभा और उसके साथ की राज्यसभा का 37 प्रतिशत से ज्यादा समय गतिरोध व हंगामे में बर्बाद हुआ था। विपक्षी भाजपा सहित अन्य दलों के साथ सरकार के साथी दलों ने भी उसमें भूमिका निभाई थी। 16वीं लोकसभा ने उसके विपरीत संकेत दिया था। पर एकाएक परिदृश्य बदल गया है।
कांग्रेस ने संसद को हर हाल में न चलने देने की रणनीति अपनाई है। वह जिस तरह इस्तीफों की मांग पर अड़ी हुई है, उससे आशंका पैदा होती है कि मानसून सत्र कहीं बिना काम किए बर्बाद न हो जाए। इस सत्र में कम से कम 24 महत्वपूर्ण विधेयक संसद में बहस व पारित होने के लिए पड़े हुए हैं। इनमें जीएसटी, भूमि अधिग्रहण, लोकपाल और लोकायुक्त, वनीकरण कोष से संबंधित विधेयक, बेनामी लेन-देन निषेध संशोधन, रेलवे (संशोधन) और जलमार्ग जैसे विधेयक शमिल हैं। जुवेनाइल जस्टिस और व्हिसल ब्लोअर्स जैसे छह विधेयक ऐसे हैं, जो लोकसभा में पास हो चुके हैं और जिन्हें राज्यसभा में पारित होना है।
राहुल गांधी की मांग है कि पहले भाजपा के मंत्री-मुख्यमंत्री इस्तीफा दें, फिर बहस करेंगे। जब इस्तीफा हो जाएगा, तो बहस किस बात की? ऐसी कौन-सी व्यवस्था है, जिसमें आरोपी को अपना पक्ष रखने का मौका न दिया जाए? हालांकि राजनीति में किसी को भी पद मोह नहीं होना चाहिए। राजनीति जनसेवा के लिए है, तो पदत्याग करने में संकोच क्यों? पर उसके पीछे तार्किकता भी तो होनी चाहिए। अगर सुषमा स्वराज अपना पक्ष संसद में रख देंगी, तो उससे क्या समस्या आ जाएगी? सुषमा स्वराज द्वारा ललित मोदी को वीजा देने के लिए कहना चाहिए था या नहीं, इस पर सवाल उठ सकता है। यह औचित्य का प्रश्न तो है, पर इसमें उस तरह का भ्रष्टाचार या अपराध नहीं है।
जहां तक व्यापम का प्रश्न है, तो राज्य का विषय संसद की बहस में आना चाहिए या नहीं, इस पर एक राय नहीं है। किंतु यहां भी कांग्रेस पहले बलि चाहती है। व्यापम से संबंधित लोगों की हुई मौतें संदेह पैदा करती हैं, इसलिए उसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। पहले जबलपुर उच्च न्यायालय की देख रेख में एसटीएफ एवं एसआईटी छानबीन कर रही थी, अब जांच सीबीआई के हाथों हैं। अगर सीबीआई शिवराज सिंह चौहान पर उंगली उठाती है, तो उन्हें कोई बचा भी नहीं सकता। ललित मोदी प्रकरण पर तो कांग्रेस खुद घिरी है। उसने ललित मोदी को बाहर क्यों जाने दिया? इसलिए अगर इस पर बहस होती है, तो छींटे कांग्रेस पर भी पड़ेंगे। विपक्ष ने यहां सही रणनीति नहीं अपनाई, इसलिए ऐसा लग रहा है कि सरकार बहस के लिए तैयार है और विपक्ष उससे भाग रहा है। पर इस समय लोकसभा का अंकगणित ऐसा नहीं है कि गतिरोध लंबा चले। राज्यसभा में समस्या है, पर वहां भी विपक्ष की पूर्ण एकता नहीं है। इसलिए संभव है, आने वाले समय में विरोध और हंगामों के साथ हम संसद की कार्यवाही भी देखें।