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निर्णय लेने की हिम्मत
Sun, 17 Mar 2019 06:44 PM IST
Raman Singh
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह
Published by: Raman Singh
Updated Sun, 17 Mar 2019 06:44 PM IST
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तवलीन सिंह
इन दिनों मैं जहां भी जाती हूं, लोग मुझसे एक ही सवाल करते हैं। नरेंद्र मोदी फिर से चुनाव जीतेंगे क्या? जवाब देने के बदले जब मैं यही सवाल उनसे पूछती हूं, तब अक्सर उत्तर होता है, ‘मोदी जरूर जीतेंगे।’ जवाब देनेवाला भले ही कोई छोटा कारोबारी हो या बड़ा उद्योगपति या दिल्ली, मुंबई में कोई मामूली मुलाजिम। यही सवाल कुछ महीने पहले पूछा जाता, तो ज्यादातर जवाब होता था कि नरेंद्र मोदी का दोबारा प्रधानमंत्री बनना कठिन है, क्योंकि 2014 में जिस किस्म का परिवर्तन और विकास लाने का वायदा उन्होंने किया था, उसे वह पूरा नहीं कर पाए हैं।
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प्रियंका गांधी ने सक्रिय राजनीति में आने के बाद पिछले सप्ताह अपने पहले भाषण में मोदी के टूटे वायदों की याद यह कहते हुए दिलाई, कहां हैं वे पंद्रह लाख रुपये, जो आपके बैंक खातों में डालने का वायदा था? कहां हैं वे दो करोड़ नए रोजगार, जिनका वायदा था? उनके बड़े भैया राहुल गांधी भी अपने हर भाषण में खास आक्रमक अंदाज में यही बातें करते आए हैं। ऊपर से वह यह कहना भी नहीं भूलते कि ‘चौकीदार चोर है।’
दूसरी बार मोदी सरकार बनने की संभावनाएं अब क्यों बढ़ गई हैं? कारण एक ही है। वह है मोदी का पाकिस्तान के अंदर लड़ाकू विमान भेजकर हवाई हमले करवाना। राहुल गांधी ने इस हमले का श्रेय केवल वायुसेना को देने का बहुत प्रयत्न किया, लेकिन देश की जनता समझ चुकी है कि असली हिम्मत निर्णय लेने वाला दिखाता है। बदला लेने का निर्णय लेकर मोदी ने साबित कर दिया है कि वह कायर नहीं हैं। मुंबई में इस बात का असर अधिक दिखता है, क्योंकि आज भी इस महानगर के नागरिक भूले नहीं हैं कि 26/11 के बाद हमारी सरकार ने दुनिया के दरबारों में मिन्नतें करने के अलावा कुछ नहीं किया था। मुंबई के लोग भूले नहीं हैं कि बदला लेना तो बहुत दूर की बात, उनको बचाने के लिए भी दिल्ली से कमांडो इतनी देर से पहुंचे कि इस शहर में अड़तालीस घंटे से ज्यादा समय तक दहशत का माहौल बना रहा। ‘उस समय अगर नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री होते, तो ऐसा न होता,' मुंबई वाले कहते हैं।
मोदी उनकी नजरों में हीरो हैं, क्योंकि उन्होंने संकट के समय ऐसा निर्णय लेने की हिम्मत दिखाई, जो अभी तक किसी प्रधानमंत्री ने नहीं दिखाई है। अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में पाकिस्तान ने देश में दो बड़े आतंकी हमले किए थे। एक जब मौलाना मसूद अजहर और कुछ अन्य आतंकवादियों की भारत की जेलों से रिहाई के लिए आईसी, 814 को हाइजैक करके कंधार ले जाया गया था, और दूसरे, जब जैश-ए-मोहम्मद ने हमारी संसद को निशाना बनाने की कोशिश की थी। सोनिया-मनमोहन सिंह के दौर में 26/11 के अलावा और भी कई आतंकी हमले हुए थे, जिनमें पाकिस्तान का हाथ साफ-साफ दिखता था। लेकिन दस साल तक भारत ने इस डर के मारे कुछ नहीं किया कि पाकिस्तान के साथ अगर युद्ध छिड़ जाता है, तो उसमें परमाणु हथियारों का इस्तेमाल हो सकता है।
पुलवामा हमले के बाद मोदी को भी इस भय ने सताया होगा। उन्हें भी सलाहकारों ने कहा होगा कि पाकिस्तान के अंदर जाकर हमला करना खतरनाक है। उन्हें भी बार-बार याद दिलाया गया होगा कि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं, जिन्हें युद्ध में इस्तेमाल करने की धमकी पाकिस्तान की सेना कई बार दे चुकी है। इन सबके बावजूद नरेंद्र मोदी ने अगर पुलवामा का बदला लेने की हिम्मत दिखाई है, तो यह कोई छोटी बात नहीं है। सो फिलहाल वह देश के सबसे बड़े हीरो हैं।