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सजा माफी पर खतरनाक राजनीति
सुधांशु रंजन
Updated Tue, 25 Feb 2014 07:22 PM IST
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राजीव गांधी की हत्या के मामले में तीन दोषियों- वी श्रीहरण उर्फ मुरुगन, टी सुथेंद्रराजा उर्फ संथन तथा एजी पेरारिवेलन उर्फ अरिंवु- की मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदलने का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय किसी भी रूप में हैरान करने वाला नहीं हैं। हैरतअंगेज है, इसके बाद की राजनीति।
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तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता ने फैसले के अगले दिन ही घोषणा कर दी कि राजीव गांधी हत्या मामले में इन तीनों के साथ ही आजीवन कारावास भुगत रहे अन्य चार कैदियों को तीन दिनों के अंदर जेल से रिहा कर दिया जाएगा। फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी। यह हैरतअंगेज इस मामले में है कि जयललिता हमेशा लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) का विरोध करती रही हैं और ये सभी अभियुक्त उस संगठन के सदस्य हैं।
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अब वह तमिल भावना की लहर पर सवार होकर कांग्रेस एवं द्रमुक को राजनीतिक शिकस्त देने में जुट गई हैं। आनन-फानन में उन्होंने स्थापित प्रक्रिया का भी ख्याल नहीं रखा। अपराध प्रक्रिया विधान की धारा 435 के तहत क्षमा देने के लिए अनुशंसा सलाहकार बोर्ड को करनी होती है। तमिलनाडु में इसके सदस्य हैं, जेल के अतिरिक्त महानिदेशक, मुख्य परिवीक्षा (प्रोबेशन) अधीक्षक एवं उस जेल के अधीक्षक, जहां संबद्ध दोषी कैद हैं। सलाहकार बोर्ड अपनी अनुशंसा राज्य सरकार को भेजता है, जिसे मानने को वह बाध्य नहीं है। यदि राज्य सरकार उसे स्वीकार करती है, तो वह अनुशंसा केंद्र के पास भेजती है। केंद्रीय गृह मंत्रालय इस पर निर्णय लेकर राज्य को जवाब देता है। केंद्र का निर्णय मानने को राज्य सरकार बाध्य नहीं है।
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अपराध की घटनाओं में, खासकर आतंकवादी घटनाओं में, राजनीति का यदि प्रवेश होगा, तो अपराध नियंत्रण असंभव हो जाएगा। मृत्युदंड की वैधता पर मानवाधिकार कार्यकर्ता लगातार सवाल खड़े करते रहे हैं और इसे खत्म करने की मांग करते हैं। मृत्युदंड पर भारतीय सर्वोच्च न्यायालय लगातार अपनी व्याख्या दे रहा है। उसके हस्तक्षेप से सत्ता के विभाजन का मुद्दा भी खड़ा होता है। गत 21 जनवरी को शत्रुघ्न चौहान मामले में न्यायालय ने 15 अभियुक्तों की मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदलते हुए दया याचिका के निष्पादन के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश दिए थे। केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में अदालत में बहस की गई थी कि राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत क्षमा याचिका पर निर्णय लेते हैं और यदि राष्ट्रपति द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद न्यायालय उसकी समीक्षा करता है, तो यह कार्यपालिका की शक्ति का न्यायपालिका द्वारा अनाधिकार माना जाएगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में उसकी शक्ति बड़ी सीमित है और वह राष्ट्रपति की शक्ति पर सवाल नहीं उठा रही है। उसने व्यवस्था दी कि यह तय करने का अधिकार अदालत को है कि मौलिक अधिकार क्या है और उसकी रक्षा कैसे हो। इसी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मृत्युदंड की सजा पाए दोषियों को भी संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत व्यक्तिगत आजादी एवं जीवन का अधिकार प्राप्त है और फांसी में विलंब से इस अधिकार का उल्लंघन होता है।
सर्वोच्च अदालत ने एक और महत्वपूर्ण व्यवस्था दी कि विलंब के बारे में निर्णय लेते वक्त अपराध की प्रकृति पर विचार करना प्रासंगिक नहीं है। उसने अप्रैल, 2013 में देविंदरपाल सिंह भुल्लर मामले में अपने ही उस फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें यह कहा गया था कि आतंक-विरोधी कानूनों के तहत जिन दोषियों को मौत की सजा दी जाती है, वे देरी के आधार पर क्षमा याचना नहीं कर सकते।
उम्मीद की जानी चाहिए कि इन दो निर्णयों से अब क्षमा याचिकाओं का निष्पादन त्वरित गति से होगा। 1983 में ही उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि ऐसी हर याचिका पर निर्णय तीन महीने के अंदर हो जाना चाहिए। यदि कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार में राजीव गांधी की हत्या के दोषियों की क्षमा याचिकाएं 11 वर्ष तक गृह मंत्रालय में पड़ी रहती हैं, तो अन्य मामलों में क्या होगा? आतंकवाद एवं अपराध की घटनाओं पर राजनीति राष्ट्रीय जुर्म है।