सांस्कृतिक बहुलता ही हमारी शक्ति

विश्वनाथ त्रिपाठी Updated Fri, 25 Jan 2013 11:42 PM IST
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cultural diversity is our strength

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आज हमारा देश 64वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। पड़ोसी देशों के बरक्स अगर हम अपने देश की गणतांत्रिक विकास यात्रा पर नजर डालें, तो गर्व का एहसास होता है। हमारे यहां नियमित रूप से चुनाव हो रहे हैं और जनप्रतिनिधियों के निर्वाचन के आधार पर सरकारें बनती और काम करती हैं।
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हमारे देश में संविधान के अनुसार शासन के सभी अंग काम करते हैं और सांविधानिक मूल्यों का संरक्षण किया जाता है। हमारे देश की सेना सरहद पर बहादुरी से सीमाओं की रक्षा करती है, लेकिन उसने कभी शासन के कामकाज में हस्तक्षेप करने की कोशिश नहीं की।


जहां तक आर्थिक समृद्धि और विकास की बात है, तो बेशक अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है और सबको तमाम बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना बाकी है, पर कमोबेश लोगों का जीवन-स्तर ऊंचा उठा है। आजादी से कुछ समय पहले का दौर देख चुके मेरी पीढ़ी के लोग इस बात की तस्दीक करेंगे।

मैंने स्वयं लोगों को जूठन लूटकर पेट की आग बुझाते देखा है। सवा अरब की आबादी वाले हमारे इस विशाल देश में आज अमूमन वैसे हालात नहीं दिखते। लोगों के रहन-सहन, पहनावे, शिक्षा आदि में क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं। आज समाज में दलित चेतना, नारी चेतना का जो विकास हुआ है, वह देश की बदली हुई परिस्थितियों का सुबूत है।

लेकिन इन सबके बावजूद दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हमारी आर्थिक एवं भौतिक समृद्धि के चलते ही हमारे देश एवं समाज में कई तरह की समस्याएं भी पैदा हुई हैं। भौतिक सुख-साधन जुटाने के प्रति लोग इतने अंधे हो गए हैं कि अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं नैतिक चेतना भी भूल गए हैं।

समाज का बुद्धिजीवी वर्ग, जिसमें संपन्न लोग, उद्योगपति, व्यवसायी एवं राजनेता भी शामिल हैं, सामंती एवं पूंजीवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हुआ है। वह सिर्फ संपन्न वर्ग की तरफ ही देखता है और उसी के हित की बात करता है।

हाशिये के लोगों का दुख-दर्द उसकी चिंता का विषय नहीं है। आज देख लीजिए कि जितने भी कानून बन रहे हैं, वे समृद्ध वर्ग के हित में ही हैं। इसका कारण है कि सामान्य हैसियत वाले लोग, जो आम लोगों की पीड़ा को समझ सकते हैं, संसद में नहीं पहुंच पा रहे हैं।

किसी भी समाज या राष्ट्र के विकास में शिक्षा की अहम भूमिका होती है। लेकिन देखिए कि आज हमारे देश में विकेंद्रीकरण के नाम पर शैक्षणिक ढांचे को कुछ इस तरह बना दिया गया है कि शिक्षा महंगी हो गई है। एक तरह से शिक्षा बेची जाने लगी है। नतीजतन उच्च शिक्षा का लाभ गरीब के बच्चों को नहीं, बल्कि संपन्न वर्ग के बच्चों को ही मिल पा रहा है। अपनी प्रतिभा के बल पर कुछ गरीब परिवारों के बच्चे भी आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन यह अपवादस्वरूप ही है।

शीर्ष से लेकर निचले स्तर तक पसरा भ्रष्टाचार हमारे गणतंत्र के लिए कलंक है। समृद्ध तबकों को ही लाभ पहुंचाने की राजनीतिक मंशा का प्रतिफल है कि कानून का सही ढंग से पालन नहीं हो रहा। कानून तोड़ने वाले लोग निर्भीक हो गए हैं। अब तो आपराधिक छवि के लोग भी संसद के उच्च सदन में पहुंचने लगे हैं। जबकि उच्च सदन की परिकल्पना समाज के सभी क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुभवों का लाभ पहुंचाने के लिए की गई थी। यही वजह है कि आज सांविधानिक प्रतिष्ठानों की अवमानना होने लगी है। ऐसे में बार-बार न्यायपालिका को मजबूरन हस्तक्षेप करना पड़ता है।

फिर भी निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हमारा देश असीम संभावनाओं वाला देश है। सांस्कृतिक बहुलता इसकी शक्ति है। इसकी जड़ें गहरी हैं, जो हमें स्वतंत्रता आंदोलन में भी देखने को मिली थी। हाल के महीनों में भ्रष्टाचार के खिलाफ और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जो आंदोलन देखने को मिले, वे हमें आश्वस्त करते हैं कि राजनीतिक वर्ग की वैचारिक जड़ता एक दिन जरूर टूटेगी। राजनीतिक एवं प्रशासनिक विफलता पर युवा वर्ग जिस तरह प्रतिरोध कर रहा है, वह हमारे गणतंत्र के सुखद भविष्य का संकेत है।

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